कोलकाता: भारत के लोग अपने वैज्ञानिक शोधों को ओपेन एक्सेस (ओए) जर्नल में प्रकाशित कराने पर सालाना करीब 24 लाख डॉलर खर्च करते हैं।
एक नए शोध में यह पता चला है। इसमें बताया गया है कि कई बार वैज्ञानिकों को अपना शोध प्रकाशित कराने के लिए दो महीने की तनख्वाह तक खर्च करनी पड़ती है।
भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू के डीएसटी सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के मुथू माधन का कहना है, “हमारा अनुमान है कि भारतीय सालाना पत्रिका में अपने शोध प्रकाशित करने पर 24 लाख डॉलर खर्च करते हैं। इनमें से कुछ पत्रिकाएं ऐसी हैं, जिनमें प्रकाशित कराने का शुल्क यहां के वैज्ञानिकों के दो महीने के वेतन के बराबर है।”
इसकी आलोचना करते हुए माधन ने कहा कि यह सही नहीं है, क्योंकि शोध का एक बड़ा हिस्सा (करीब 70 फीसदी) करदाताओं के पैसे से आता है।
वह कहते हैं, “और यहां शोध के लिए भी धन की कमी है। यह शोधकर्ताओं के लिए सही नहीं है कि वे अपने संसाधन का एक बड़ा हिस्सा धनी प्रकाशकों को दें, जो शोध प्रकाशित करने जैसी सेवाओं के लिए मोटी रकम बसूलते हैं और साल दर साल 30 से 40 फीसदी का मुनाफा कमाते हैं। ऐसे समय में भी उनका मुनाफा प्रभावित नहीं होता, जब अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो।”
शोधकर्ताओं को विस्तारित विज्ञान प्रशस्तिपत्र सूचकांक के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला है। इससे पता चला कि साल 2010 से 2014 के दौरान भारतीय शोधकर्ताओं ने कुल 37,078 शोधपत्रों को 881 ओपेन एक्सेस जर्नल में प्रकाशित कराया। हालांकि इस शोध का प्रकाशन भी करेंट साइंस जर्नल में हुआ है।
इस शोध के सहलेखक हैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के लाइब्रेरी विभाग के शिवशंकर किमिदी, सेंट्रल इलेक्ट्रोकेमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट कराईकुदी के नॉलेज रिसर्च सेंटर के सुबिया गुणशेखरन, डीएसटी सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सुबिया अरुणाचलम।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि अपने शोध को ओपेन एक्सेस जर्नल में प्रकाशित कराने की बजाय मुफ्त उपलब्ध इंटर-ऑपेरेबल रिपॉजिटिरी में जमा कराए, जिसका प्रचलन वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रहा है।
(रिपोर्ट : सहाना घोष)




