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ग्रामसभा से अनुमोदित वनाधिकार के तहत झारखंड में 45 प्रतिशत दावे को सरकार ने किया निरस्त

Ranchi : वनाधिकार अधिनियम, 2006 लागू होने के बाद झारखंड जैसे राज्य में वन भूमि पर अपनी आजीविका संचालन करने वाले आदिवासी परिवारों को उन जमीन पर मालिकाना हक देने की बात कही गई. कई वन क्षेत्र में रहने वाले परिवारों में उक्त कानून आने के बाद काफी उत्साह का माहौल दिखा, लेकिन कानून के लागू होने के 10 साल बाद भी वन क्षेत्र में रहने वाले परिवार को अब तक दावा प्रस्तुत करने के बाद भी वन विभाग से पट्टा नहीं मिल सका. जिन्हें पट्टा मिला भी है उसे ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद दिए गये भू-सीमा क्षेत्र में कटौती करते हुए दिया गया है. यह हालात सिर्फ झारखंड में ही नहीं बल्कि पूरे देश में ऐसी ही स्थिति है.

Pravin kumar

Ranchi : वनाधिकार अधिनियम, 2006 लागू होने के बाद झारखंड जैसे राज्य में वन भूमि पर अपनी आजीविका संचालन करने वाले आदिवासी परिवारों को उन जमीन पर मालिकाना हक देने की बात कही गई. कई वन क्षेत्र में रहने वाले परिवारों में उक्त कानून आने के बाद काफी उत्साह का माहौल दिखा, लेकिन कानून के लागू होने के 10 साल बाद भी वन क्षेत्र में रहने वाले परिवार को अब तक दावा प्रस्तुत करने के बाद भी वन विभाग से पट्टा नहीं मिल सका. जिन्हें पट्टा मिला भी है उसे ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद दिए गये भू-सीमा क्षेत्र में कटौती करते हुए दिया गया है. यह हालात सिर्फ झारखंड में ही नहीं बल्कि पूरे देश में ऐसी ही स्थिति है.

वहीं हम झारखंड की बात करें तो आदिवासियों के आर्थिक जीवन का आधार जल, जंगल और जमीन है. वहीं दशकों से आदिवासियों के पारम्परिक वनाधिकार का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया जा रहा था. कानून के रूप में 2006 को पास करते हुए केन्द्र सरकार ने कहा था कि आदिवासियों या पारम्परिक रूप से जंगलों में निवास करने वालों के प्रति किए गए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने के लिए वनाधिकार कानून को अधिनियमित किया गया तथा जंगल में निवास करने वाले प्रत्येक परिवार को चार एकड़ भूमि इस कानून के द्वारा देने का वचन दिया गया था. जबकि ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद भी अनुमंडल स्तर पर व्यक्तिगत और सममुदायिक पट्टा देने में कोतही बरती जा रही है.

28 फरवरी, 2017 तक इकट्ठा किए गए सूचना के अनुसार झारखण्ड में कुल 1,02,510 दावे प्रस्तुत किए गए, जिसमें से 56,181 दावों को मान्य किया गया और 46,328 दावों यानि 45 फीसदी लोगों के दावे को निरस्त कर दिया गया. वहीं जिन दावों को मान्य भी किया गया, उसमें जमीन के क्षेत्र में कटौती कर पट्टा दिया गया. जिससे परम्परागत रूप से जंगलों में रहते आए आबादी को उनके वनाधिकार से वंचित कर दिया गया है.

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झारखंड में वन अधिकार कानून के तहत पट्टा देने में सरकार कोतही बरत रही है. ग्रामसभा के द्वारा पास किए गये दावे में अनुमंडल और जिला स्तर पर कटौती कर दिया जाता है, जिसमें ग्रामसभा की कोई भूमिका नहीं होती है, जबकि दावे को निरस्त करने में ग्रामसभा की राय लेनी जरूरी है.

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राज्य में वनाधिकार के तहत किये गये आवेदन में जमीन की कटौती  जिस जमीन पर दावा किया गया है उसका पोजीशन उस व्यक्ति के पास न होना या दूसरी ओर जितनी जमीन पर दावा किया गया है, उससे कम जमीन पर दखल रहना, जमीन में कटौती का कारण हो सकता है. ग्राम सभा के द्वारा किए गये अनुमोदन के बाद जो दावे रिजेक्ट हुए हैं उस पर विभाग के द्वारा पुन: ग्राम सभा में जाकर रिविजीट कर आंकलन किया जाएगा साथ ही कानून के प्रचार-प्रसार का काम भी विभाग जल्द ही शुरू करेगा.

जनजातीय कार्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार किस राज्य में अब तक कितने दावे आए और कितने दावे पर पट्टा दिया गया 31 दिसंबर 2017 तक

राज्य                          दावे                         स्वीकृत दावे    

आंध्र प्रदेश                 1,74,341     87,971

असम                        1,55,011        58,802 

बिहार                         8,022        121

छत्तीसगढ़                 8,86,548   4,09,635

गोवा                          10,130         25

गुजरात                      1,90,056     84,694

हिमाचल प्रदेश             2,223      136

झारखंड                   1,02,510    56,181

कर्नाटका               3,04,536   13,049

केरल                     37,535       24,599

मध्य प्रदेश            6,16,064   2,48,016

महाराष्ट्र                3,64,358     1,12,646

उड़ीसा                 6,18,616 4   17,734

राजस्थान              74,159       37,409

तमिलनाडु            21,781       0

तेलंगाना               1,86,534     94,215

त्रिपुरा                  2,00,635     1,25,190

उत्तर प्रदेश         93,644       18,555

उत्तराखंड           182         0

पश्चिम बंगाल      1,42,081     45,130

 कुल                  41,88,966    18,34,108

इस आंकड़े को गौर करें तो वनाधिकार के तहत मिलने वाले पट्टे 43.78 प्रतिशत लोगों को ही मिल सका है. देश भर में 56 प्रतिशत से अधिक दावे को निरस्त कर दिया गया. वहीं सामुदायिक दावे की स्थिति और ही बुरी है. झारखंड में 31 दिसंबर तक 3,286 सामुदायिक वन पट्टा की मांग की गई थी, जिसमें से मात्र 1,723 किया गया.

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