
Md. Asghar Khan
Ranchi : तमाम कोशिशों के बावजूद झारखंड में ट्रैफिकिंग की घटना का ग्राफ हर साल बढ़ता ही जा रहा है. पिछले दस साल में मानव तस्करों के लिए झारखंड एक बड़ा हब बना है. चाइल्ड राइट पर काम करने वाली एटीएसईसी संस्था की सर्वे के अनुसार झारखंड से हर साल तस्करी के शिकार होने वाले लड़के-लड़कियों की संख्या 50 हजार से अधिक बताई जाती है. ट्रैफिकिंग में बंगाल, आंध्रप्रदेश के बाद झारखंड का ही नंबर आता है. जबकि इस तरह के केस में पीड़ितों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में झारखंड पहले नंबर पर है. हर साल भारत में एक लाख 55 हजार के आस-पास लड़के-लड़कियों की ट्रैफिकिंग होती है, जिनमें से लगभग एक लाख लोग ही बरामद हो पाते हैं.
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तस्करी में 78 प्रतिशत आदिवासी
झारखंड में मानव तस्करी के सबसे अधिक शिकार आदिवासी समाज के लोग होते हैं. इनमें 78 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत एससी, 08 प्रतिशत ओबीसी और 02 प्रतिशत जनरल कैटेगरी के लोग शामिल हैं. यूएनओ-डीसी की रिपोर्ट कहती है कि झारखंड से होने वाले ट्रैफिकिंग में 87 प्रतिशत नाबालिग बच्चे-बच्चियां हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या 90 प्रतिशत से भी अधिक है. झारखंड में गुमला, रांची, खूंटी, लोहरदगा, सिमडेगा और चाईबासा से ट्रैफिकिंग के मामले सबसे अधिक आते हैं. झारखंड में ट्रैफिकिंग घरेलू काम और फेक मैरिज के नाम पर बहला-फुसला कर की जाती है. वहीं मजदूरी और काम दिलाने का झांसा देकर भी लड़के-लड़कियों को झांसा में लिया जाता है. चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट बैधनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड में मानव तस्करी की तस्वीर बहुत भयावह है. झारखंड में ट्रैफिकिंग का सही आंकड़ा इसलिए नहीं मिल पाता है कि इस तरह के मामले में 90 प्रतिशत परिवार थाना-पुलिस के चक्कर से बचने के लिए केस दर्ज नहीं कराते हैं. जो पुलिस रिकॉर्ड्स में होता है उसी आकड़ों को माना जाता है.
दो माह में रेस्क्यू अभियान के तहत 1163 को छुड़ाया गया
ट्रैफिकिंग पर शिकंजा कसने के लिए लिए झारखंड पुलिस, सीआईडी और कई एनजीओ साथ में काम कर रहे हैं. चाइल्ड राईट एक्टिविस्ट बैधनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड पुलिस और नेशनल क्राईम रिकॉर्ड्स ब्यूरो का आंकड़ा काफी चिंताजनक है. तस्कर गिरोह राज्य में मजबूत होते जा रहे हैं. राज्य से 2012 से 2013 अप्रैल तक 180 मानव तस्करों की गिरफ्तारी हो चुकी है. इनमें महिला तस्करों की संख्या पुरुषों से अधिक है. बैधनाथ ने कहा कि अगर सरकारी आंकड़े को ही मान लिया जाये तो 2013 से 2017 मई तक झारखंड में ट्रैफिकिंग और लापता के 2489 मामले दर्ज हुए. इनमें से 1405 को ही रेस्क्यू अभियान के तहत छुड़ाया गया. उन्होंने कहा कि एक एनजीओ ने 31 मई से 31 जुलाई 2015 तक देशभर में रेस्क्यू अभियान चलाया गया था. इन दो माह में 11 राज्यों के 35 शहरों से 1330 बच्चे-बच्चियों को छुड़ाया गया था, जिसमें 1163 लड़के-लड़कियां झारखंड के ही शामिल थे.
गरीबी के कारण होते हैं ट्रैफिकिंग के शिकार
झारखंड में चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर काम कर रही दीया सेवा संस्था की सचिव सीता स्वांसी का कहना है कि राज्य में तेजी से हो रही ट्रैफिकिंग का एक बड़ा कारण गरीबी और आर्थिक तंगी है. आदिवासियों में गरीबी और आर्थिक तंगी काफी है. तस्कर गिरोह आर्थिक तंगी को देखकर इन तक आसानी से पहुंच जाते हैं. और फिर इन्हें काम, शादी कराने के नाम पर बहला-फुसला दूसरे राज्य ले उड़ते हैं. सीआईडी रिपोर्ट के अनुसार 2017 में झारखंड से 255 नाबालिग लापता हुए, जिनमें से पुलिस अबतक 164 को ही बरामद कर पाई. इनमें 107 बच्चे और 148 बच्चियां शामिल थी.
सरकार द्वारा उठाया गया कदम कारगार नहीं
चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट बैधनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड सरकार के द्वारा राज्य में मानव तस्करी पर नकेल कसने की दिशा में उठाये जा रहे कदम कारगार नहीं हैं. 2010 तक झारखंड में लापता बच्चों का सरकार के पास कोई आंकड़ा ही नहीं था. मैंने इस बाबत हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल किया. कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने बताया कि 24 जिलों से 44 लोग लापता हैं. इनमें से गुमशुदगी के सिर्फ सात मामले ही दर्ज हुए थे. झारखंड में 2013 में 240 के साथ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया. तब पुलिस ने मात्र सात केस में ही पोस्को एक्ट के तहत कार्रवाई की. वहीं राज्य में कोर्ट के आदेश के बाद 2011 में ट्रैफिकिंग रोकने हेतु आठ जिलों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) गठन किया गया जो मात्र नाम भर ही है.
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