गुआहाटी हाईकोर्ट के गत आठ नवंबर के एक फैसले से भ्रष्टाचार या अन्य संगीन आपराधिक मामलों में फंसे लोगों, नेताओं व नौकरशाहों की ‘बांछें’ (वे शरीर में जहां भी होती हों) खिल गयी हैं. इसलिए कि हाईकोर्ट की एक दो सदस्यीय बेंच ने देश की सबसे प्रमुख और एकमात्र जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेटिंग या केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को असंवैधानिक करार दे दिया है!
– श्रीनिवास –
प्रसंग: सीबीआई एक असंवैधानिक संस्था!
गुआहाटी हाईकोर्ट के गत आठ नवंबर के एक फैसले से भ्रष्टाचार या अन्य संगीन आपराधिक मामलों में फंसे लोगों, नेताओं व नौकरशाहों की ‘बांछें’ (वे शरीर में जहां भी होती हों) खिल गयी हैं. इसलिए कि हाईकोर्ट की एक दो सदस्यीय बेंच ने देश की सबसे प्रमुख और एकमात्र जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेटिंग या केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को असंवैधानिक करार दे दिया है! फैसला आते ही 2-जी घोटाले में फंसे पूर्व मंत्री ए राजा और 1984 के सिख विरोधी दंगों में गंभीर आरोप झेल रहे कांग्रेस नेता सज्जन कुमार ने अपने खिलाफ सीबीआई जांच पर आधारित अदालत में जारी सुनवाई को तत्काल बंद करने की मांग की है. सीबीआई के शिकंजे में फंसे अन्य अभियुक्तों को भी इस फैसले से थोड़ी राहत मिली होगी. श्री राजा ने तो यहां तक कहा है कि उनके खिलाफ सुनवाई बंद न करना अदालत की अवमानना होगी. फैसले के आलोक में राजा की मांग को निराधार भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसी हाईकोर्ट की नजर में असंवैधानिक करार दी जा चुकी सीबीआई कोई जांच कैसे कर सकती है और उसकी जांच के आधार पर कोई अदालत मामले की सुनवाई कैसे कर सकती है? विधि विशेषज्ञ भी इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर इस फैसले कर आधार क्या हो सकता है. साथ ही, एक गंभीर व्यावहारिक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि अभी जितने मामलों की जांच सीबीआई कर रही है, या उसकी जांच के आधार पर अदालतों में जिन मामलों की सुनवाई चल रही है, उनका क्या होगा. इस सवाल का जवाब हर कोई अपने तरीके से दे रहा है और उनमें मतैक्य नहीं है.
जानकारों के मुताबिक सीबीआई का गठन अंगरेजी शासन काल में दूसरे विश्व युद्ध के समय 1941 में हुआ था. आजादी के बाद 1963 में एक राजकीय आदेश से दिल्ली पुलिस एक्ट के तहत इसे केंद्र सरकार की जांच एजेंसी के रूप में मान्य व लागू किया गया. इसका दायरा भी देशव्यापी कर दिया गया. हां, इसकी जांच के दायरे में केंद्र सरकार के सहत आनेवाले विभागों व अर्द्धसरकारी संस्थाओं के मामले ही आते थे. ऐसे मामलों में वह स्वत: भी मामला दर्ज कर जांच कर सकती है. राज्य स्तर के मामलों में वह राज्य सरकार के अनुरोध पर ही किसी मामले की जांच कर सकती है.
बेशक सीबीआई कोई संवैधानिक संस्था नहीं है. इसे संसद से पारित किसी विधेयक और राष्ट्रपति के हस्ताक्षरित आदेश से मान्य नहीं किया गया है. इस तरह वह चुनाव आयोग या कैग की तरह संवैधानिक संस्था तो नहीं है, मगर सिर्फ इस अधार पर उसके वजूद और किसी मामले में उसकी जांच को गलत करार देना या निरस्त कर देना, समझ से परे है. ध्यान रहे कि सीबीआई जांच के आधार पर किसी मामले में किसी भी कोर्ट का प्रत्येक फैसला अंतत: अपील के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहुचता ही है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ‘तोता’ बताते हुए उसे उसके ‘मालिक’ यानी सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की बात कही थी, जिस पर विपक्ष और मीडिया में खूब तालियां बजी थीं. कमाल है कि तब और आज तक सुप्रीम कोर्ट के किसी माननीय न्यायमार्ति को सीबीआई के असंवैधानिक होने का एहसास नहीं हुआ, न ही अब तक किसी अपराधी या अभियुक्त के काबिल वकील को यह दलील नहीं सूझी.
केंद्र सरकार ने, स्वाभाविक ही इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है. और उम्मीद की जाती है कि सर्वोच्च अदालत गुआहाटी हाईकोर्ट के इस फैसले से उत्पन्न असमंजस व भ्रम की स्थिति को दुरुस्त कर देगी. वैसे भी, अभी सीबीआई जितने मामलों की जांच कर रही है, उनमें से अनेक विभिन्न उच्च नयायालयों के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सौंपे गये हैं. हालांकि अदालतों द्वारा किसी मामले में सीबीआई जांच के आदेश देना अपने आप में विवादास्पद है. यह अलग बात है कि पिछले कुछ वर्षों या दशकों से तमाम उच्च न्यायालय इस तरह के आदेश देते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायमूर्ति संभवत: इस मामले को इसलिए भी प्राथमिकता देंगे कि खुद सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ सीबीआई जांच के आदेश देता रहा है, बल्कि अनेक मामलों की जांच की वह निगरानी- मॉनीटरिंग भी करता रहा है. हालांकि संविधान के जानकार अगम प्रकाश (‘सामयिकी’ शीर्षक से छपे संग्रह में संकलित और प्रभात खबर में 14. 5. 1997 को प्रकाशित लेख ‘यह मॉनीटरिंग क्या होता है?’) के मुताबिक ऐसा करना भी जांच एजेंसी के काम में गैरजरूरी हस्तक्षेप ही है. प्रसंगवश, पश्चिम बंगाल की पिछली वाम सरकार ने अदालतों के ऐसे अधिकार (किसी मामले की जांच सीबीआई को सौंपने) को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी, जिस पर सुनवाई करने और फैसला देने का सुप्रीम कोर्ट को या तो वक्त नहीं मिला; या फिर न्यायमूर्तियों को वह याचिका महत्वपूर्ण ही नहीं लगी. जो भी हो, गुआहाटी हाईकोर्ट का यह फैसला क्या प्रकारांतर से सुप्रीम कोर्ट के भी तमाम संबद्ध तमाम फैसलों को गैरकानूनी करार नहीं देता है? इस फैसले के सही या गलत होने का अंतिम निर्णय तो सुप्रीम कोर्ट करेगा, लेकिन पहली नजर में यह बेतुका लगता है. इससे देश की न्याय व्यवस्था में जारी एक किस्म की अराजकता का पता भी चलता है. सुधी पाठकों को शायद याद हो कि एचडी देवगौड़ा, दिवंगत श्री गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने को भी विभिन्न उच्च न्यायलयों में चुनौती दी गयी थी. गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सभी याचिकाओं की सुनवाई की और स्वाभाविक ही सबों को निरस्त कर दिया था. लेकिन अब तक केंद्रीय व्यवस्था से संबद्ध मामलों में हाईकोर्ट में याचिका दायर करने, अदालतों द्वारा उन्हें स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति व परंपरा पर रोक लगाने की कोई पहल नहीं हुई है.
अपने देश में न्यायिक प्रक्रिया की सुस्त चाल या लेटलतीफी के किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है. लेकिन इस पर बोलने का अमूमन कोई साहस नहीं करता. हां, किसी खास मामले में या किसी रसूखदार व्यक्ति के खिलाफ फैसला सुनाये जाते ही उसे ‘ऐतिहासिक’ बताने और ‘हमारे न्याय तंत्र में देर भले हो जाये, पर न्याय अवश्य होता है’ जैसे रटे रटाये जुमलों से उसका स्वागत करने की होड़ लग जाती है. इसलिए कि आज जनता की नजर में विधायिका व कार्यपालिका की साख गिरी हुई है और न्यायपालिका से ही वह सारी समस्याओं के निदान की उम्मीद पालने लगी है. किसी मामले का फैसला होने में 20 से 30 वर्ष क्यों लग जाता है, यह पूछने की जरूरत कोई महसूस नहीं करता. न ही यह कि आठ से दस साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद रहने के बाद रिहा करने पर भी संबद्ध निर्दोष के साथ हुए अन्याय के लिए सिर्फ सरकार या पुलिस जिम्मेवर क्यों है, अदालत या कोई जज भी क्यों नहीं? इस प्रकार विधायिका व कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है. अब तो सुप्रीम कोर्ट संसद को कोई कानून बनाने का ‘निर्देश’ भी देने लगा है, जो सरासर उसके क्षेत्राधिकार के बाहर है. गुआहाटी उच्च न्यायालय का संबद्ध फैसला भी न्यायपालिका की गैरजरूरी व अतिवादी सक्रियता और खुद को सर्वशक्तिमान मान लेने की बढ़ती प्रवृत्ति का एक और उदाहरण है.




