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..और ये दागदार ‘माननीय’!

न्यूज विंग | विशेष रिपोर्ट
राजनीति में अपराधियों का बोलबाला कोई नई बहस नहीं। झारखंड ही नहीं पूरा देश भुक्तभोगी है। स्वयंसेवी संगठन से लेकर राजनीतिक दलों ने मुद्दे को आगे तो बढ़ाया। लेकिन, बात ‘चोर चोर मौसेरे भाई!’ तक पहुंच कर थम जाती। अंततः पहल करनी पड़ी न्यायालय को। पिछले हफ्ते सुप्रीम कोट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आपराधिक चरित्र वाले राजनीतिकों के खिलाफ जोरदार हथौड़ा चलाया है।

सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एके पटनायक और न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने निर्वाचित नेताओं को संरक्षण प्रदान करने वाली जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा आठ (4) को असंवैधानिक करार दिया। खंडपीठ ने यह फैसला अधिवक्ता लिली थॉमस और गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) लोक प्रहरी की जनहित याचिका पर 10 जुलाई 2013 को सुनाया। यह फैसला 10 जुलाई 2013 से ही लागू हो गया। इसके ठीक दूसरे दिन पटना हाईकोर्ट के एक फैसले को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरा झटका भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेल या पुलिस कस्टडी में रहने वाले शख्स चुनाव नहीं लड़ सकते। यानी उन्हें किसी भी चुनावी प्रक्रिया में वोट देने का अधिकार नहीं होगा। न्यायालय ने कहा है कि जेल और पुलिस कस्टडी में रहने वाले शख्स को वोटिंग का अधिकार नहीं है ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने का भी अधिकार नहीं है। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी.. अपना झारखंड भी तो पहले से ही राजनीतिक बदहाली में अव्वल रहा है। प्रसंगवश पेश है चुनाव सुधार में प्रयासरत दो स्वयंसेवी संगठन, ‘एडीआर’ और ‘न्यू’ द्वारा किये गए सर्वेक्षण के चौंकाने वाले नतीजे जो झारखंड के नेताओं, जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर से नकाब उतार रहे हैं।

देश भर के वर्तमान सांसदों और विधायकों का आपराधिक रिकार्ड तलाशने के लिए दो स्वयंसेवी संगठनों, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल एलेक्शन वॉच (न्यू), ने उन सारे जनप्रतिनिधियों का ऐफिडेविट खंगाला है। चुनाव आयोग के पास मौजूद ये ऐफिडेविट चुनाव लड़ते वक्त उम्मीदवारों द्वारा जमा करवाये जाते हैं। ऐफिडेविट में उम्मीदवार की शिक्षा, उसकी संपत्ति, कोर्ट में चल रहे मामले व आपराधिक रिकॉर्ड का ब्योरा होता है। एडीआर और न्यू द्वारा वर्तमान सांसदों व विधायकों के 4,807 ऐफिडेविट की समीक्षा की गई। प्रस्तुत है समीक्षा में सामने कुछ प्रमुख बिंदुओं पर एक नजरः
1. कुल वर्तमान सांसदों विधायकों के 30% यानी 4,807 एफिडेविट की समीक्षा की गई। इनमें से 1,460 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से 688 (14%) पर हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, अपहरण, जैसे गंभीर मामले लंबित हैं।
2. लोकसभा के 543 सांसदों में से 162 (30%) ने अपने एफिडेविट में स्वीकारा कि उनपर आपराधिक मामले चल रहे हैं और इनमें से 14% पर तो गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।
3. देश भर के राज्यों के विधानसभाओं में वर्तमान 4,032 विधायकों में से 1,258 के ऐफिडेविट में लंबित आपराधिक मामलों का उल्लेख है। उनमें से वर्तमान के 15% विधायकों के ऐफिडेविट में संगीन आपराधिक मामले लंबित बताये गए हैं।
4. राज्यों के विधानसभाओं में झारखंड ऐसा प्रदेश है जहां दागी विधायकों की संख्या सर्वाधिक है। झारखंड के वर्तमान विधायकों में से 74% ने अपने ऐफिडेविट में स्वीकारा है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। पिछले विधानसभा, यानी 2009 के, चुनाव में ऐफिडेविट सबमिट करते हुए 74 में से 55 विधायकों ने खुद पर चल रहे आपराधिक मामलों को स्वीकारा है। इनमें से 25 के खिलाफ तो गंभीर आपराधिक मामलों का जिक्र मिलता है।
5. हालिया चुनावों में, 2010 के विधानसभा चुनाव में बिहार में जीत दर्ज करनेवाले विधायकों में से 58% एवं यूपी के 2013 विधानसभा चुनावों में जीते विधायकों में से 47% पर आपराधिक मामले लंबित हैं।
6. मणिपुर विधानसभा इनसे अलग है। 2012 में चुने गए विधायकों में से किसी के भी ऐफिडेविट में आपराधिक मामलों का उल्लेख नहीं है
7. समीक्षा में एक और खास बात सामने आयी है। पिछले चुनावों में झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) के टिकट पर लड़कर जीतनेवाले 82% सांसदों व विधायकों ने अपने ऐफिडेविट में आपराधिक मामले लंबित होने की बात स्वीकारी है। उसी तरह है राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के टिकट पर जीते 64% और सपा (समाजवादी पार्टी) की टिकट पर जीत दर्ज कराने वाले 48% सांसदों विधायकों के ऐफिडेविट में आपराधिक मामले लंबित पाये गए हैं।
8. भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) के टिकट से जीते 31% (1,017 में से 313 सांसद विधायक) और कांग्रेस के टिकट से विजय हासिल करनेवाले 21% (1,433 में से 305) सांसदों विधायकों के ऐफिडेविट में आपराधिक मामले लंबित होने का उल्लेख मिला है।

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