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आचार संहिता उल्लंघन मामलों में पीएम मोदी को क्लीनचिट देने में चुनाव आयोग एकमत नहीं था  

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार  प्रधानमंत्री मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के तीन मामलों में चुनाव आयोग से क्लीनचिट तो  मिली,  लेकिन इनमें से दो मामलों में आयोग की राय एकमत नहीं थी

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NewDelhi : आचार संहिता उल्लंघन मामलों में पीएम मोदी को क्लीनचिट देने में चुनाव आयोग एकमत नहीं था. बता दें क‍ि आचार संहिता के उल्लंघन मामलों में प्रधानमंत्री मोदी को चुनाव आयोग (ईसी) द्वारा क्लीनचिट दी गयी है, लेकिन एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग का यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था.  जान लें कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के तीन मामलों में चुनाव आयोग से क्लीनचिट तो मिली,  लेकिन इनमें से दो मामलों में आयोग की राय एकमत नहीं थी. कहती है कि पीएम मोदी को वर्धा और लातूर में उनके भाषणों को लेकर क्लीनचिट दी गयी,  लेकिन इन मामलों में एक चुनाव आयुक्त ने मोदी का क्लीनचिट दिये जाने का विरोध किया . हालंकि बाड़मेर के मोदी के  भाषण को लेकर चुनाव आयोग की एकमत राय थी.

एक अप्रैल को  पीएम मोदी ने वर्धा में में दिये अपने भाषण में वायनाड सीट से चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आलोचना की थी और संकेत दिया था कि केरल के इस संसदीय क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं की संख्या अधिक है. इसी क्रम में नौ अप्रैल को महाराष्ट्र के लातूर में पहली बार वोट देने जा रहे मतदाताओं से अपना वोट बालाकोट हवाई हमले के नायकों और पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों को समर्पित करने की बात कही थी.  दोनों मामलों में फैसला 2-1 के बहुमत से लिया गया. मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के अलावा दो अन्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और सुशील चंद्रा ने इस संबंध में वोटिंग की थी. इनमें से एक आयुक्त की राय प्रधानमंत्री के पक्ष में नहीं थी.

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मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए

लेकिन राजस्थान के बाड़मेर में मोदी के विवादित बयान पर क्लीनचिट देने का चुनाव आयोग का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया. चुनाव आयोग का कहना है कि इस मामले में आचार संहिता का उल्लंघन नहीं  हुआ है. मोदी ने बाड़मेर में अपनी चुनावी सभा में सशस्त्र बलों का आह्वान करते हुए कहा था कि भारत के परमाणु हथियार दिवाली के लिए इस्तेमाल किये जाने के लिए नहीं रखे हैं. चुनाव आयोग अधिनियम, 1991 की धारा 10 के अनुसार जहां तक संभव हो चुनाव आयोग का कामकाज सबकी सहमति से चलना चाहिए. प्रावधान यह भी कहता है कि अगर किसी मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों में मतभेद हो तो ऐसे मामले में बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए.

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मोदी को वर्धा और लातूर मामलों में क्लीनचिट दिये जाने पर चुनाव आयोग में एकराय नहीं थी. चुनाव समिति इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मोदी के यह बयान जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123 (3ए) और 125 का उल्लंघन नहीं है. ये धाराएं  किसी भी उम्मीदवार द्वार देश में धर्म, जाति, समुदाय और भाषा के आधार पर विभिन्न वर्गों के नागरिकों के बीच दुश्मनी और घृणा की भावनाओं को बढ़ाने से संबंधित हैं. हालांकि इस कानून के लागू होने के बाद बहुमत से ऐसे फैसले बहुत कम लिये गये हैं. चुनाव आयोग में मतभेद के कुछ उदाहरणों में से एक 2009 का है, जब विभाजित आयोग ने कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी को विदेशी पुरस्कार मिलने के लिए सांसद के रूप में अयोग्य घोषित किये जाने पर अपनी राय राष्ट्रपति को भेजी थी.

उस समय एन गोपालस्वामी मुख्य चुनाव आयुक्त थे और एस वाई कुरैशी और नवीन चावला समिति में उनके सहयोगी थे. गोपालस्वामी की राय थी कि नवंबर 2006 में सोनिया गांधी को बेल्जियम के सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिये जाने की जांच की जरूरत थी, जिसे चावला और कुरैशी ने ख़ारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था कि जांच पूरी हो गयी है और इस मामले में और जांच की जरूरत नहीं है.

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