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Ranchi, 27 August, Satya Sharan Mishra: झारखंड संस्कृति निदेशालय में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. सिर्फ एक अधिकारी पूरे डिपार्टमेंट पर हावी है. उनके आदेश से ही सब काम होता है. अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर का भी काम वो करते हैं. यह अधिकारी हैं संस्कृति निदेशालय के डिप्टी डायरेक्टर अमिताभ कुमार. निदेशालय के अंतर्गत पुरातत्व डिपार्टमेंट के डिप्टी डायरेक्टर अमिताभ अपने डिपार्टमेंट के अलावा कल्चर डिपार्टमेंट का भी काम देखते हैं, जबकि इसके लिए विभाग के पास सहायक निदेशक हैं. अमिताभ का जलवा डिपार्टमेंट में ऐसा है कि उनकी सहमति के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिलता है. डिपार्टमेंट में उन्होंने हर जगह अपनी और अपने लोगों की सेटिंग कर रखी है. उनकी संस्थाओं को विभाग का हर काम मिलता है. हर टेंडर उनकी मर्जी से निकलता है. 21 जुलाई को लघु फिल्म निर्माण के लिए जो टेंडर निकाला गया है वह भी उनकी ही मर्जी से निकाला गया है. इस टेंडर को भरने के लिए सिर्फ 10 दिन का समय दिया गया है. टेंडर भरने वालों से 10 दिन में ही 11 विषयों (जिन पर डॉक्यूमेंट्री बनानी है) की स्क्रिप्ट मांगी गयी है. गौरतलब है कि यह टेंडर इन दिनों विवादों में है. झारखंड के फिल्ममेकर्स इसका विरोध कर रहे हैं.
झारखंड कला मंदिर के नाम क्यों मांगा गया ड्राफ्ट
चौंकाने वाली बात यह है कि फिल्म निर्माण के लिए निकाले गये टेंडर में झारखंड कला मंदिर के नाम ड्राफ्ट मांगा गया है. 2003-04 में इसका रजिस्ट्रेशन हुआ था. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इसी संस्था के नाम ही ड्राफ्ट क्यों मांगा गया है. पता करने पर मालूम हुआ कि झारखंड कला मंदिर सरकार से संपोषित है, इसलिए उसके नाम ड्राफ्ट मंगाया गया. अब यहां दूसरा सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर सरकार से संपोषित संस्था के नाम ही ड्राफ्ट मंगाना था तो दूसरी संस्थाओं के नाम से क्यों नहीं मंगाया गया. सरायकेला और सिल्ली के कला केंद्र के अलावा भी कई संस्थाएं सरकार संपोषित हैं.
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विभाग के एक्सपर्ट्स की राय के बिना निकाल दिया गया विज्ञापन
फिल्म निर्माण के लिए जो टेंडर निकाला गया है उसमें भी विभाग के अन्य अधिकारियों की राय नहीं ली गयी है. अमिताभ कुमार ने इस टेंडर की फाइल डील की है. जबकि अमिताभ का कहना है कि इस टेंडर से उनका कोई लेना देना नहीं है. उन्होंने कहा कि यह संस्कृति निदेशालय के डायरेक्टर या असिस्टेंट डायरेक्टर के कार्यक्षेत्र में है और वही इसके बारे में बेहतर बता सकेंगे, लेकिन जब संस्कृति के असिस्टेंट डायरेक्टर विजय पासवान से बात की गयी तो उन्होंने बताया कि उन्हें तो टेंडर निकलने के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. विज्ञापन निकालने से पहले उनके पास फाइल लायी ही नहीं गयी है.
अधिकारी कई बार कर चुके हैं अमिताभ घोष की शिकायत
विभाग के दूसरे अधिकारी अमिताभ के कामकाज के तरीके से काफी नाराज हैं. उनका कहना है कि निदेशालय के डायरेक्टर भी अमिताभ के प्रभाव में हैं. हर फैसले में उनकी राय लेते हैं, या यूं कहें कि अमिताभ के हर फैसले पर डॉयरेक्टर अपनी सहमति दे देते हैं. अधिकारियों का कहना है कि जिन चीजों के एक्सपर्ट विभाग में मौजूद हैं उन्हें दरकिनार कर अमिताभ उनका काम देख रहे हैं. इतना ही नहीं संस्कृति विभाग का उप-आवंटन भी सहायक निदेशक पुरातत्व के नाम दिया जा रहा है. इसे लेकर विभाग के अधिकारियों ने डायरेक्टर अशोक कुमार सिंह को पत्र भी लिखा है. अधिकारियों ने कहा कि विभाग में काफी गड़बड़ी चल रही है अगर गंभीरता से एक-एक चीज की जांच की जाये तो करोड़ों का घोटाला सामने आयेगा.
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अमिताभ ने मानी गलती, कहाः 10 दिन में नहीं जमा हो सकते 11 विषयों के स्क्रिप्ट
टेंडर के विज्ञापन को लेकर जब अमिताभ से बात की गयी तब पहले तो उन्होंने कहा कि वे इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह पायेंगे क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है, लेकिन विज्ञापन में स्क्रिप्ट के लिए दिये गये 10 दिन के सवाल पर उन्होंने भी माना है कि 10 दिन में 11 विषयों की स्क्रिप्ट जमा करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है. कम से कम 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जो शीर्ष पदाधिकारी का निर्देश होता है उसी का वे पालन करते हैं.
असिस्टेंट डायरेक्टर को टेंडर की जानकारी तक नहीं दी गयी
कल्चर निदेशालय के असिस्टेंट डायरेक्टर विजय पासवान ने कहा कि विज्ञापन के बारे में उन्हें ज्यादा कुछ मालूम नहीं है, क्योंकि उन्होंने फाइल डील नहीं की है. उन्होंने बताया कि इस विज्ञापन को लेकर कई लोगों ने विभाग में अपनी आपत्ति दर्ज करायी है. झारखंड के फिल्म निर्माताओं ने विभाग से कहा है कि इस टेंडर से झारखंड के छोटे फिल्म मेकर्स को फायदा नहीं होगा. राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियों को ही फायदा होगा.




