Uncategorized

बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने पर जावड़ेकर को कानूनी नोटिस

आगरा : पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले एक कार्यकर्ता ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एंव जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री प्रकाश जावड़ेकर को प्रस्तावित बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने के संबंध में एक कानूनी नोटिस भेजा है। पशु अधिकार कार्यकर्ता नरेश कादियन ने कहा है कि 2014 के नागरिक अपील संख्या 5387 और 5391 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के अनुसार, बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति न्यायालय के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है। इसी के आधार पर कादियन ने केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर को एक कानूनी नोटिस भेजा है।

नरेश ने मंत्री को याद दिलाया है कि केंद्र सरकार ने उनके मंत्रालय के माध्यम से 11 जुलाई, 2011 को एक अधिसूचना जारी की थी और बैलों को उन जानवरों की सूची में शामिल किया था, जिन्हें प्रदर्शन पशुओं के तौर पर प्रदर्शित या प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता।

इसके बाद, 11 जुलाई, 2011 की अधिसूचना को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 24 अगस्त, 2011 को एक अधिसूचना जारी करके राज्य में बैलगाड़ी दौड़ पर प्रतिबंध लगाया था।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अनदेखी करते हुए जावड़ेकर ने एक प्रेस सम्मेलन में कहा था कि वह बैलगाड़ी दौड़ को अनुमति देने के मामले में खुली बहस करने को तैयार हैं।

नरेश ने आईएएनएस को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद बैलगाड़ी दौड़/ जलिकत्तू से जुड़े सभी मुद्दे निर्धारित हो चुके हैं। इसमें संदेह का कोई स्थान नहीं है।

नरेश ने नोटिस में कहा है, “मीडिया को दिए गए आपके बयान से अराजकता फैली है। देश के लोग, खासतौर से महाराष्ट्र के लोगों ने आपके शब्दों को अंतिम फैसला मान लिया है और दौड़ों का आयोजन शुरू कर दिया है।”

नरेश ने मंत्री से अपील की है कि वह जनता को स्पष्ट करें कि चार दिसंबर को दिए गए उनके बयान को बैलगाड़ी दौड़ों के लिए अनुमति के तौर पर न लिया जाए और ऐसी दौड़ें प्रतिबंधित हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने सात मई, 2014 को संबंधित मामलों पर निर्णय देते हुए अपने विस्तृत फैसले में कहा था कि बैल खुद से नहीं दौड़ते, लेकिन वे बैलगाड़ी दौड़ों मे दौड़ते हैं, इसका मतलब है कि उन्हें अनावश्यक तौर पर पीड़ा दी जाती है। इसका अर्थ है कि बैलगाड़ी दौड़ बैलों के लिए क्रूर हैं, क्योंकि उन्हें पीड़ित करके प्रदर्शन के लिए बाध्य किया जाता है।

फैसले में कहा गया था कि पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम की धारा तीन और 11 के तहत पशुओं के पास क्रूरता का भाजक नहीं बनने का वैधानिक अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21 ए(जी) के अनुसार, यह मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे पशुओं को क्रूरता का भाजक न बनने दें।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि तमिलनाडु में जलिकत्तू या बैलगाड़ी दौड़ परंपरा या संस्कृति का हिस्सा नहीं है। ऐसी क्रूर, बर्बर, अमानवीय और अशिष्ट गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। आईएएनएस

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button