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Bokaro, 28 September: (Prakash Mishra) हाय रे हाय, दसाय का झिली-मिली, देलाः गुरु हो दिशोम साधार ते, हाय रे हाय… यह संथाल गीत अभी कोयलांचल के बोकारो, धनबाद, गिरिडीह और हजारीबाग जिले में बसे संथाल गांवों में दुर्गा पूजा के अवसर पर सुनने को मिल जायेंगे. दसाय नाम से चर्चित यह पर्व संताल समाज का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. यह पर्व उत्साह का नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, अस्तित्व एवं स्वशासन प्रणाली की रक्षा के लिए चले एक लंबे संघर्ष के तौर पर मनाया जाता है. इस संघर्ष में कई लोग अपने परिजनों से बिछड गए थे. दसाय में संघर्ष एवं शहीद हुए लोगों को याद भी किया जाता है. इसलिए इस पर्व का आयोजन संताल गांवों में दुर्गा पूजा के बेलवरण के दिन से शुरु हो जाता है. जो विजयादशमी को समाप्त होता है.
दसाय पर्व में भाग लेते हैं गांव के गुरु-चेला
हर संथाल गांवों में एक परंपरा के अनुसार एक गुरु होता है, जो अपने चेलों को लेकर मांदर, नगाड़ा, करताल बजाते हुए हर गांव का भ्रमण करता है. गुरु से लेकर चेला तक धोती पहनते हैं और साथ में तोर पंख लेकर हर गांव में नृत्य करते हैं. इसलिए दसाय पर होने वाला यह नृत्य गुरु चेला नृत्य के नाम से पूरे राज्य में मशहूर है.
कई गुण और विद्या का होता है आदान-प्रदान
सामाजिक कार्यकर्ता बाबा महेश्वर सोरेन बताते हैं कि दसाय का आयोजन हर वर्ष खेती से पूर्व रोहण पड़ते ही हर गांवों में शुरु हो जाता है. जब खेती के लिए बीज खेत में डाला जाता है. उस दिन गुरु नए और पुराने चेले को लेकर गांव में गुण और विद्या सिखाते हैं. यह सिलसिला जीतिया तक चलता है, उसके बाद दशहारा में हर गुरु अपने चेलों को लेकर गांव में निकलते हैं. उनके अनुसार कई तरह की विद्या, जिसमें जड़ी-बूटी से दलाज, कई प्रकार के मंत्र आदि की जानकारी चेलों को दी जाती है. ताकि संथाल समाज अपने गांव समाज की रक्षा कर सके.
विजयादशमी को खत्म होता है पर्व
विजयादशमी को इलाके में आयोजित होने वाले मेला में गुरु अपने चेलों को लेकर पहुंचते हैं. जहां पर वे दूसरे स्थानों से आने वाले चेलों पर नजर वाण चलाते हैं, अगर उससे चेला बच जाता है, तो उसे सबसे अच्छा चेला का खिताब भी दिया जाता है. मेला से लौटने के बाद हर गांवों में अखरा में विशेष पूजा का आयोजन भी होता है, उसके बाद दसाय खत्म हो जाता है.





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