Mrityunjay Srivastava
Ranchi, 23 October: झारखंड में भूख से लोग मर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार राशन कार्ड तक मुहैया नहीं करा पा रही है. जिनके पास राशन कार्ड है, उनको दो महीनों से राशन नहीं दिया जा रहा है. बीपीएल परिवार का नाम राशन लिस्ट से हटा दिया गया है. राशन नहीं मिलने से गांव के कई लोग भूखमरी की कगार पर पहुंच गये हैं. यह हाल है रांची जिले के डुंगरी पंचायत के कोयनजारी गांव का. नामकुम ब्लॉक के अंतर्गत आने वाला यह गांव प्रोजेक्ट भवन से महज 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और रांची-खुंटी मार्ग के ठीक बगल में है.
99 फीसदी से ज्यादा लोग बीपीएल
लगभग 1350 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 99 फीसदी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा यानि बीपीएल की श्रेणी में हैं. इस गांव के लोग मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं. कई ऐसे वृद्ध भी इस गांव में हैं, जो पूरी तरह से सरकारी राशन पर निर्भर हैं. लेकिन इस गांव में ज्यादातर लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है.
जिस दिन काम मिलता है उस दिन घर में चूल्हा जलता है, वरना भूखे पेट ही सोते हैं.
इसी गांव की शांति एक्का के तीन बच्चे हैं, पति को जिस दिन काम मिलता है, उस दिन घर में चूल्हा जलता है. बीपीएल श्रेणी में होने के बावजूद इनका आज तक राशन कार्ड नहीं बना. आधार कार्ड भी है, ना जाने कितनी बार शांति एक्का और उसके पति ने राशन कार्ड का फॉर्म भरा है लेकिन आज तक उनका राशन कार्ड नहीं बन पाया. राशन कार्ड बनाने वालों ने शांति से पैसे की डिमांड की थी, लेकिन उनके पास घूस के पैसे नहीं थे, जिससे उनका राशन कार्ड जल्दी बन जाये. शांति एक्का बताती हैं कि उनके घर एक सांझ भी बड़ी मुश्किल से चूल्हा जलता है, शायद ही ऐसा दिन होता है, जब उनके बच्चे भूख से रोते बिलखते नहीं.
पिछले 15-20 सालों से टकटकी लगाये बैठे हैं वृद्ध अलवीस उरांव
वृद्ध अलवीस उरांव के पास काम करने की शक्ति नहीं है, इन्होंने भी 15 बार से ज्यादा बार राशन कार्ड का फॉर्म भरा लेकिन उनको भी आज तक राशन कार्ड नहीं मिल पाया है. राशन की आस में पिछले 15-20 सालों से टकटकी लगाये बैठे हैं. मंहगाई का आलम यह है कि ये बाजार से राशन खरीदकर अपने परिवार का भरण-पोषण करने में पूरी तरह से अक्षम हैं. मंहगाई के इस दौर में जीना मुश्किल हो गया है.
कई महीनों से घर में दो समय का चुल्हा नहीं जला
फुलवंती लिंडा और शोभा कच्छप ने बताया कि मंहगाई इतनी है कि पिछले कई महीनों से उनके घर में दो समय का चुल्हा नहीं जल पाया है. इनके बच्चों को भूखे सोने की आदत सी पड़ गयी है. भूखे रहना इनके परिवार की आदतों में शामिल हो गया है.
कार्ड है लेकिन राशन मिलना बंद हो गया है
कोयनजारी गांव के कुछ परिवार तो ऐसे हैं जिनके पास राशन कार्ड है, लेकिन पिछले दो माह से उनको राशन नहीं मिल रहा. सुकरो एक्का और जगना एक्का एक ऐसे वृद्ध दंपति हैं जिनके पास राशन कार्ड भी है और आधार कार्ड भी. लेकिन दो माह से उनका राशन बंद कर दिया गया है. राशन लेने जब वे डीलर के पास जाते हैं, तो जवाब मिलता है कि उनका राशन कार्ड से नाम हटा दिया गया है.
सरकारी मकान में बिना खिड़की दरवाजे के रहने वाले यह दंपत्ति कोई भी काम करने में सक्षम नहीं हैं. पूरी तरह से दूसरों के रहमो करम पर यह परिवार जिंदा है. बड़ी मुश्किल से इस परिवार को एक समय खाना मिल पाता है. यह परिवार भूखमरी की कगार पर है.
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14 वर्षीय बालक पहना एक्का अपने पिता के साथ रहता है, उसकी मां का पिछले साल देहांत हो गया है. पहले तो उसे राशन मिल जाता था, लेकिन पिछले छह माह से डीलर उसको राशन नहीं देता, पूछने पर जलील करता है और कहता है, अपनी मां को लेकर आओ फिर कहा जाता है कि तेरा अंगूठा मैच नहीं कर रहा है. अब पहना अपनी मृत मां को डीलर के पास लेकर जाये तो कैसे. डरे सहमे इस बालक से जब राशन के बारे में पूछा गया तो वह काफी इमोशनल हो गया.
गांव की अनिता टोप्पो ने बताया कि उनको राशन के नाम पर सिर्फ चावल ही मिलता है और वो भी दिन भर के इंतजार के बाद, डीलर चीनी नहीं देता है.
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पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेयी ने की थी इस गांव से सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत
पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेयी ने इस गांव से सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत की थी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने डुंगरी पंचायत के इस कोयनजारी गांव के प्राथमिक विधालय से 2002 में ऑन लाईन सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत की थी. इसके बाद से यह गांव चर्चा में आया था. यहां के लोगों को लगा कि शायद इस गांव की तकदीर और तस्वीर बदल जायेगी, उनका जीवन स्तर सुधर जायेगा. बेरोजगारों को नौकरी मिल जायेगी, लेकिन हुआ उसके उलट. सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत वाले इस गांव में अबतक ज्यादातर लोग अशिक्षित ही हैं. गांव के बच्चे भी अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पा रहे हैं.
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गांव के बच्चे कुपोषण का शिकार
इस गांव के 62 वर्षीय बिरसा उरांव और 63 वर्षीय हौंडा एक्का ने बताया कि आज तक आश्वासन के अलावा कुछ भी नहीं मिला. वृद्धावस्था पेंशन के लिए कई बार लिखकर दिया, लेकिन आज तक सरकार की योजना का लाभ नहीं मिला. गांव के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. गांव में कई बच्चे ऐसे हैं, जो समुचित भोजन के अभाव में कुपोषित हो गये हैं. उनको स्कूलों में भी मीड डे मिल नहीं मिल पा रहा है. उनका विकास प्रभावित हो रहा है. झारखंड का भविष्य कुपोषण का शिकार हो रहा है, लेकिन उनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है. गांव में देखने-सुनने वाला कोई नहीं है. जबकि यह गांव रांची-खुंटी मुख्य मार्ग पर स्थित है. फिर भी विकास से उपेक्षित है.




