Uncategorized

बुद्धकालीन अवशेषों से समृद्ध पलामू, दुर्भाग्यवश प्राचीन विरासतों के प्रति संजीदा नहीं सरकार

Daltonganj : सोन एवं उसकी सहायक नदी उत्तर कोयल की घाटी में पसरे पलामू जिले में विगत ढाई हजार वर्ष से लेकर  बारहवीं शताब्दी तक के भगवान बुद्ध से संबंधित अवशेष खेतों से बस्तियों तक और जंगलों से पहाड़ों तक बिखरे पड़े हैं. विडंबना है कि इन अवशेषों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. न सरकार, न जनता और न बौद्ध धर्म के अनुयायी ही इन अवशेषों को लेकर कोई अभिरुचि दिखला रहे हैं. यहां बिखरे प्राचीन अवशेषों में बौद्ध स्तूप, बुद्ध प्रतिमा, बौद्ध प्रतीक, बौद्ध मंदिर आदि आदि उल्लेखनीय हैं. मोहम्मदगंज प्रखंड में उत्तर कोयल नदी के दाहिने तट पर अवस्थित पुरातात्विक महत्व के गांव सहार बिहरा में पक्की ईंटों से निर्मित एक टीला है, जिसके गर्भ में बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्तंभ है. इसी नदी के तट पर पंसा गढ़ है, जो पुरातत्वविद डॉ. एचपी सिन्हा के अनुसार बौद्ध स्तूप है. इसके अलावा हुसैनाबाद प्रखंड के महुअरी,नील कोठी,चनकार कस्तूरी तथा झरहा टोंगरा में बौद्ध स्तूप के अवशेष  विद्यमान है. मेदिनीनगर से 25 किमी उत्तर-पूर्व पंडवा प्रखंड के छेछौरी गांव में एक विशाल बौद्ध मंदिर है,जिसकी जमीन सरकारी खतियान में बौद्ध मंदिर के नाम से प्लाट संख्या 702 में दर्ज है. अपने तल से लगभग तीस फीट ऊंचा इस मंदिर का गर्भगृह पत्थर द्वारा तथा इसकी मीनार पक्की ईंटों द्वारा निर्मित है.

इसे भी पढ़ें- गिरिडीह : संयम नहीं रख पाये जैन मुनि, उपवास के दिन गोलगप्पा व पराठा खाते पकड़े गए 

बब

बुद्धकालीन अवशेषों को संजोने के प्रति सरकारी सिस्टम लापरवाह

पलामू में बुद्ध एवं बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतिमाएं अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है. सहार बिहरा गांव के टीले में जमींदोज प्रस्तर स्तम्भ में उत्कीर्ण दो मूर्तियां हैं, जिसमें एक बुद्ध की तथा दूसरी किसी देवी की प्रतीत होती है. हैदरनगर प्रखंड के सजवन गांव में सिर खंडित बुद्ध की प्रतिमा विद्यमान है, जिसे स्थानीय लोग धावर गोरया कहकर पूजा करते हैं. वहीं, कबरा कला में बुद्ध का चित्र उकेरा हुआ एक लौह फलक मिला है, जो स्टेट म्यूजियम रांची में प्रदर्शित है. हुसैनाबाद प्रखंड के सबानो गांव में बौद्ध देवी तारा की खंडित मूर्ति एक कुएं से मिली है. पंसा गढ़ से पत्थर के एक हाथी की प्रतिमा मिली है, जो बुद्ध के जन्म का प्रतीक चिन्ह है. हुसैनाबाद प्रखंड के ऊपरी कलां गांव में प्राचीन काल का एक प्रस्तर स्तम्भ मिला है, जिसे स्थानीय लोगों ने शिव लिंग के रूप में एक मंदिर बनाकर स्थापित किया है. सच यह है कि इस प्रस्तर स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रतिमा बुद्ध की है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस जिले में गर्व की अनुभूति कराने वाली विरासतें पड़ी हों, उसे ढूंढ निकालने, उसे संजोने-सहेजने को लेकर राज्य सरकार खास दिलचस्पी नहीं रखती.

इसे भी पढ़ें- घरों में बिजली पहुंचाने के मामले को लेकर झारखंड के संदर्भ में PM को किसने दी गलत सूचना  

ीी

पलामू की धरती में आज भी दबा हैं कई विरासतें

यहां के अनेक गांवों का नाम बुद्ध से संबंधित है. मसलन- बुधुआ, सजवन (सालवन से व्युत्पन्न), हेमजा (बुद्ध का एक नाम), लूंबा (लुंबिनी से व्युत्पन्न), तारा (एक बौद्ध देवी का नाम) आदि. पलामू को बौद्ध सर्किट से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील सोन घाटी पुरातत्व परिषद  विगत दो दशकों से कला, संस्कृति, पुरातत्व और इतिहास को प्रकाश में लाने के लिए सोन घाटी की प्राचीन बस्तियों के उद्भेदन में लगा हुआ है. इसी साल आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रांची के द्वारा कबरा कला में उत्खनन कराया गया, जिसमें बुद्ध कालीन अनेक टेराकोटा के रिंग वेल मिले हैं. सोन घाटी पुरातत्व परिषद जपला के अध्यक्ष अंगद किशोर एवं सचिव तापस डे तथा रांची विश्वविद्यालय के व्याख्याता डॉ अभिषेक गुप्ता ने संयुक्त रूप से बताया कि यह क्षेत्र बुद्ध काल में आबाद था. उस समय कबरा कला एक समृद्ध शहर था. प्राप्त बुद्धकालीन पुरावशेषों को देखकर बुद्ध के यहां आने का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button