
Ranchi: महालेखाकार (झारखंड) ने झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति पर चिंता जतायी है. एजी ऑफिस में बुधवार को प्रधान महालेखाकार (लेखा परीक्षा, झारखंड) इंदू अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि राज्य के 6 जिलों में 2014-19 के बीच जिला अस्पतालों में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं को परखा गया. इसमें कई स्तरों पर विसंगतियां नजर आयीं. इससे संबंधित लेखा परीक्षणों को झारखंड विधानसभा के पटल पर 15 मार्च को रखा गया है.
जो आंकड़े और परिणाम मिले हैं, कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में निर्धारित लक्ष्यों को पाना अभी चुनौती है. रांची, रामगढ़, हजारीबाग, पलामू, देवघर और पूर्वी सिंहभूम में जिला अस्पतालों में उपलब्ध व्यवस्थाओं को गंभीरता से देखा परखा गया था. इसमें ओपीडी और इंडोर सेवाओं, पैथोलॉजी जांच और मैनपावर की उपलब्धता के लिये स्टैंडर्ड मापदंडों का अभाव दिखा था. भवन संरचना, दवाओं की उपलब्धता, आइसीयू की स्थिति पर भी चिंताजनक स्थिति नजर आयी. स्वास्थ्य विभाग से उम्मीद है कि वह प्राप्त रिपोर्टों को गंभीरता से स्टडी कर आगे की कार्रवाई करेगा.
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ओपीडी में 57 फीसदी बढ़े मरीज
रांची, हजारीबाग, रामगढ़ सहित अन्य 3 जिलों के जिला अस्पतालों में 2014-15 की तुलना में वर्ष 2018-19 तक ओपीडी पेशेंट का भार 57 फीसदी तक बढ़ा. इसमें बढ़ोत्तरी के बावजूद डॉक्टरों की संख्या नहीं बढ़ाने का फर्क पड़ा. एक डॉक्टर को औसतन पांच मिनट का समय एक पेशेंट को देना चाहिये जो नहीं हो पा रहा. रजिस्ट्रेशन के लिये अस्पताल में काउंटरों की संख्या भी नहीं बढ़ी. अस्पतालों में बैठने की और शौचालय की सुविधाओं का भी अभाव दिखा. नमूना जांचित जिला अस्पतालों में बर्न वार्ड, कान, नाक और गला, एक्सिडेंट और ट्रॉमा वार्ड के साथ साथ मनश्चिकित्सा के लिये इनडोर सर्विस में कमियां थीं. 6 जिला अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी 19 से 56 फीसदी के बीच थी. 9 से 18 फीसदी स्पेशलिस्टों की भी कमी थी. आयुष, त्वचा विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान और फोरेंसिक के स्पेशलिस्ट नहीं थे. पारा मेडिकल कर्मियों की 43 से 77 फीसदी तक कमी दिखी. स्टाफ नर्सों की कमी 11 से 87 फीसदी के बीच थी.

6 जिला अस्पतालों में किसी में भी ईएनटी और हड्डी रोग के लिये ऑपरेशन थियेटर नहीं था. पांच जिला अस्पतालों में आपातकालीन सेवाओं के लिये ओटी उपलब्ध नहीं था. ओटी में जरूरी उपकरण और दवाईयों की भी कमी दिखी. ओटी प्रक्रियाओं से संबंधित रिकॉर्ड केवल पूर्वी सिंहभूम अस्पताल में दिखे.
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राज्य के 23 जिलों अस्पतालों में जुलाई 2016 और मई 2017 के बीच केवल 9 जिला अस्पतालों में आईसीयू की स्थापना की गयी थी. इसके बाद 6 जिला अस्पतालों में आईसीयू में जरूरी उपकरणों की कमी देखी गयी. ऐसे में उच्च स्वास्थ्य सेवाओं के लिये दूसरे अस्पतालों में रेफर किये जाने की संभावना थी.
हजारीबाग के जिला अस्पताल को छोड़ रोड एक्सिडेंट और ट्रॉमा वार्ड की सुविधा बाकी 5 जिला अस्पतालों में नहीं दिखी. आईपीएचएस में निर्धारित प्रावधानों के बावजूद 6 जिला अस्पतालों में इंडोर पेशेंट को दिये जाने वाले आहार के क्वालिटी को देखने की कोई प्रणाली नहीं थी. केवल पूर्वी सिंहभूम के जिला अस्पताल में आपदा प्रबंधन योजना (डीएमपी) तैयार की गयी थी. पलामू और रामगढ़ को छोड़ बाकी 4 जिलों के जिला अस्पताल में बेड ऑक्यूपेंसी रेट (बीओआर) हासिल नहीं किया जा सका था.
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मातृत्व सेवाओं के मामले में भी 6 जिला अस्पतालों में कई विसंगितयां नजर आयीं. रजिस्टर्ड महिलाओं को जरूरी टीका, दवाईयां नहीं मिल पा रही थीं. 6 महीने तक जननी सुरक्षा योजना का लाभ लाभार्थियों को नहीं मिल पाया था. पूर्वी सिंहभूम को छोड़कर किसी जिला अस्पताल में हाउसकीपिंग के लिये एसओपी उपलब्ध नहीं था. जैव अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 का उल्लंघन करते हुए लिक्विड केमिकल अपशिष्ट को सीधे नालियों में छोड़ा जा रहा था.
दवाईयों की खरीद में गंभीरता नहीं
झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड दवाईयों की खरीद पर 100.31 करोड़ के राज्य निधि में से 87.85 करोड़ (88 फीसदी) की राशि का उपयोग नहीं कर सका. बगैर क्वालिटी टेस्ट के ही स्थानीय विक्रेताओं से दवाईयां खरीदी गयीं. 6 जिलों में जिला अस्पतालों में बिस्तरों की कमी 61 फीसदी से 86 फीसदी तक दिखी. रांची में सदर अस्पताल के निर्माण पर अगस्त 2007 से काम शुरू हुआ. पर कई कारणों से इसमें लेट हुआ. 500 बेड वाला अस्पताल 12 सालों में भी तैयार नहीं हो पाया है. जिला अस्पताल, रामगढ़ के लिये 4.89 करोड़ की लागत से एक नया 100 बिस्तरों वाला अस्पताल भवन जून 2008 में स्वीकृत किया गया था. 3 करोड़ खर्च होने के बाद और इसमें अधिकारियों पर करप्शन के आरोप के बाद इस पर काम आगे नहीं बढ़ा.
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