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आदिवासी मना रहे महिषासुर शहादत दिवस, अपने राजा की हत्या पर जश्न से प्रताड़ित महसूस करते

News Wing
Ranchi/Jamshedpur, 29 September : 
देश के कई आदिवासी इलाकों में रावण दहन का विरोध एवं महिषासुर के शहादत दिवस की खबरें आ रही हैं. झारखंड में भी आज महिषासुर शहादत दिवस जमशेदपुर के चाकुलिया में मनाया गया. इस आयोजन में भूमिज, संथाल, कुर्मी और दलित समाज के लोग शामिल हुए.

आयोजकों का कहना है कि जिस तरीके से देवी दुर्गा को अस्त्रों से लैस होता हुआ एवं महिषासुर को वध करते दिखाया जाता है, वह आदिवासी और मूलवासी समाज को प्रताड़ित करने के समान है. आदिवासी और मूलवासी समाज को नीचा दिखाकर नस्लभेदी प्रवृत्ति है.

महिषासुर की छल से की गयी हत्या
झारखंड में भी सदियों से आदिवासी संथाल समाज दुर्गा पूजा के समय ही दशाय नृत्य के द्वारा समाज का दुख वयक्त करते हैं. साथ ही राजा महिषासुर की छल से की गयी हत्या को याद करते हुए दुख प्रकट करते हैं.

आज भी  देशभर में आदिवासी समाज पर इसी तरह का जुल्म होता है. दशहरे के समय संथाल समाज  के लोग अपने गीतों एवं नृत्य के माध्यम से दुख व्यक्त करते हैं. अपने राजा महिषासुर फिर लौटेंगे यह विश्वास के साथ याद करते हैं. संथाल समाज में सदियो से यह गीत गाये जाते हैं.

आदिवासी राजा की हत्या में शोक गीत

हय रे हय, हय रे हय
ओकाय नमरे हय
ओकाय नमरे हुदुड़ द़र्गी
सर हिन्दी में

संथाल समाज के लोग अपने राजा को खोजते हैं, जिसे छल से मारा गया है. वे मानते हैं उन्हें दुर्गा ने मारा है. दशाय नृत्य में इस हत्या पर शोक व्यक्त किया जाता है.

इस आयोजन में कुर्मी समाज के लोगों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. जयराम महतो ने अपने संबोधन में कहा कुड़मी समाज में भी इसी तरह की परंपरा रही है. कुर्मी समाज में काठी नृत्य के माध्यम से दशहरा के समय ही समाज के ऊपर हुए अत्याचार एवं शोषण को व्यक्त करता है.

कपुर बागी का कहना  है कि लोग दुर्गा की पूजा करें इसका हमें विरोध नहीं है लेकिन जिस तरीके से आदिवासी समाज के महिषासुर की हत्या को दिखाया जाता है वह गलत है. धर्म आपसी सद्भाव और भाईचारे का संदेश देता है. लेकिन दुर्गा पूजा में हिंसा को बढ़ावा देने वाला स्वरूप दिखता है. यह त्यौहार सिर्फ हिंसा ही नहीं बल्कि आदिवासी समाज को यह प्रताड़ित होता दिखाता है. इस  आयोजन के माध्यम से हमारे पूर्वजों पर हुए अत्यचार की निंदा करते हैं.

कार्यक्रम में  चिलुगू, चाकुलिया, कदमजोर, बकुला, कलगाड़ी आदि गांव से लोग शामिल हुए.

आदिवासी समाज अपने पूर्वजों का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा

कार्यक्रम में मुख्य तौर पर जयराम महतो, विश्वनाथ महतो, सुरेंद्र महतो, चंदन सिंह सरदार, राजेश सिंह सरदार, कपूर बागी, मिथुन मांझी, मंगल मांझी आदि ने अपने विचार रखे. साथ ही सरकार से कहा गया कि जिस तरह सदियों पुराने डायनासोर की खोज और उसकी वास्तविकता की पड़ताल के लिए शोध किया गया  है. महिषासुर की भी वास्तविकता को निष्पक्ष शोध से सामने लाना चाहिए. यह आदिवासी समाज से हैं और आदिवासी समाज अपने पूर्वजों की अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा. आयोजन में भारी संख्या में ग्रामीण भी शामिल हुए.

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