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दशकों बाद भी बरकरार है चुनाव चिन्हों की अहमियत

नई दिल्ली: नारियल, तुरही, नेल कटर, छड़ी, अंगूर, कोट, प्रेसर कूकर, रोटी, टूथब्रश इत्यादि का जीवंत भारतीय लोकतंत्र में क्या काम? लेकिन ये चुनाव चिन्ह के रूप में आज भी प्रासंगिक हैं।

चुनाव आयोग का कहना है कि प्रत्याशियों और पार्टी को पहचानने के लिए ‘चुनाव चिन्ह’ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में लोग मतपत्रों और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन पर नाम नहीं पढ़ सकते।

दिल्ली में 70 सदस्यीय विधानसभा के लिए होने जा रहे चुनाव के चरम पर पहुंचने के साथ ही राष्ट्रीय राजधानी में चुनाव चिन्ह लहरा कर मतदाताओं को आकर्षित करने का काम जोरों पर है।

कांग्रेस का हाथ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कमल जाने पहचाने चिन्हों में से हैं। इसी तरह के चिन्हों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का हाथी और महज एक वर्ष पुरानी आम आदमी पार्टी (आप) का चुनाव चिन्ह झाड़ू भी लोकप्रिय हो चुका है।

लेकिन इसके अलावा और भी कई चिन्ह हैं जो रोजाना के काम में घरों में इस्तेमाल किए जाते हैं। असंख्य स्वतंत्र प्रत्याशियों, अप्रचारित राजनीतिक पार्टियों को आवंटित चुनाव चिन्हों में स्लेट, हैट, आटोरिक्शा, टेलीविजन, हैंड पंप, सिलाई मशीन, ब्लैक बोर्ड, गुब्बारा, पेन स्टैंड, पतंग आदि शामिल हैं।

राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल का चुनाव चिन्ह केतली है। लोक प्रिय समाज पार्टी बुजुर्गो की छड़ी के साथ वोट मांग रही है। समता संघर्ष पार्टी को मोमबत्ती चिन्ह मिला है।

कैमरा अखिल भारतीय हिंदू महासभा का चिन्ह है। कल्याणकारी जनतांत्रिक पार्टी का चिन्ह टेलीफोन है। और क्रिकेट के खुमार वाले देश में आदर्शवादी कांग्रेस पार्टी ने बैट्समैन को चुना है। – श्रद्धा क्षेत्री

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