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फादर्स डे स्पेशल : बेटियां पापा की इतनी लाडली क्यों होती हैं!

Ranchi : एक जमाना था, जब बेटियों के जन्मा पर परिवार में मातम सा छा जाता था. पर आज स्थितियां और परिस्थितियों बदल रही हैं. बेटियों ने अपनी पहचान बदली है और न सिर्फ परिवार में बल्कि देश और दुनिया के लोगों की सोच को भी बदला है. इसके पीछे जो वजह है वो एक बाप और बेटी का इमोशनल रिलेशन है. बेटी पिता के लिए कोई बोझ या जिम्मेदारी बनकर नहीं रह गई हैं, बल्कि पिता की शान और पहचान का हिस्सा बन रही हैं. बाप-बेटी का रिश्ता गहरी दोस्ती का रूप बयां करने लगा है. जहां संवेदनाएं भी हैं और परवरिश भी.

हां मैं हूं पापा की लाडली हूं

आज समय बदल रहा है, पिता का झुकाव घर के चिराग से ज्यादा घर की रोशनी पर होने लगा है यानी बेटियों पर. उसे जीवन में बेटी का महत्व समझ में आने लगा है, इसलिए उसके पूरे जीवन को सजाने-संवारने में अपना पूरा योगदान दे रहा है. बेटियां जिन्हें कभी ये शिकायत रहती थी कि पापा तो सिर्फ भईया के ही हैं, वो तो सिर्फ उसे ही प्यार करते हैं, वहीं आज बेटियां पापा की आंखों का तारा, उनकी लाडली बन गई हैं और बेझिझक कहती हैं- हां मैं हूं पापा की लाडली हूं. सच तो यह है कि आज बेटियों के अंदर भी पापा की  ‘हिटलर’ वाली छवि धुंधली होने लगी है. पापा का खौफ दोस्ती के रिश्ते में तब्दील होने लगा है. बेटियां पापा की लाडली यूं ही नहीं बन गई हैं, इसके लिए दोनों ने एक-दूसरे को खूब समझा है, बल्कि भरपूर सहयोग भी दिया है.

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मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि भले ही पापा ने किन्हीं कारणों से बेटियों को लाडली न कहा हो लेकिन मन की अतल गहराइयों में पिता का प्रेम व रूझान बेटियों के लिए बहुत होता है. ऐसी ही बिटियां भी आम तौर पर अपने पापा की तरफ अधिक आकर्षित होती हैं. भले ही पिता-पुत्री के बीच का यह प्यारा रिश्ता आज प्रकट होने लगा हो लेकिन यह पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक है.

पहला स्पर्श और आकर्षण

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बेटी के जीवन में यदि किसी पहले पुरूष का स्पर्श या दखल होता है तो वह है उसके पापा. या यूं कहें किसी भी लड़की के जीवन में पहला पुरूष उसके पापा होते हैं. छोटे बाल, मर्दाना कपड़े, रोबीली आवाज, मजबूत हाथ, यहां तक की दाढ़ी-मूंछें भी सबसे पहले बेटी अपने पापा में देखती है. क्योंकि बच्चे मां के साथ अधिक आकर्षित होते हैं. खासतौर पर लड़कियां, क्योंकि लड़कियां मां को स्वयं के बहुत करीब पाती हैं. जैसे-जैसे बड़ी होती हैं उन्हें मां अपने जैसी ही नजर आती है. उसे मां में भी वही स्त्रैण गुण नजर आते हैं जो स्वयं में होते हैं. लेकिन पापा ठीक उसके विपरित होते हैं.

बदलती सोच, बदलता सहयोग

इतना ही नहीं मां कि केयरिंग और पापा की केयरिंग में बेटियां बहुत अंतर पाती हैं. बेटियों को पापा समझदार एवं स्पोर्टिव लगते हैं. एक समय था जब बाप बेटियों को गोद में उठाने से झिझकते थे. फिर एक समय ऐसा आया कि वह बेटियों को मेले घूमने फिरने भी ले जाने लगे. फिर स्कूल में पढ़ाना -लिखाना चालू किया तो उसके भविष्य के बारे में भी चिंता करने लगे. जहां पिता को बेटी की शादी की इतनी जल्दी होती थी कि वह बिना सोच-विचार के, बिना बेटी की मर्जी के जिस भी किसी लड़के से शादी कर देते थे. वहीं आज पिता न सिर्फ बिटिया की शादी के लिए बल्कि एक अच्छे करियर के लिए भी फिक्रमंद हैं. आज पिता बेटी का ब्याह कर सिर से बोझ नहीं उतार देना चाहता, बल्की उसे अपने पांव पर खड़ा देखना चाहता है. इसलिए उसकी पसंद और व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर ही उसके लिए करियर और जॉब चुनना चाहता है या फिर चुनने में बिटियों की मदद करता है. इतना ही नहीं विवाह से पूर्व वह बेटी कि न केवल मर्जी को तवज्जो देता है बल्कि यदि उसका कोई अफेयर है तो उसको भी मद्दे-नजर रखता है. यहां तक कि यदि बिटियां अपनी निजी संबंधों से परेशान है तो पिता उन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और मदद करता है.

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सतर्कता और आपसी सामंजस्यता

आज के पिता अपनी बेटियों के प्रति ज्यादा सतर्क हुए हैं. बदलती हवा में उन्हें अपने बेटे से ज्यादा बेटियों से अधिक उम्मीदें हैं. आज के पापा ना सिर्फ बेटियों को लोरी सुनाते हैं, बल्कि उनकी नैपी चेंज करने से भी नहीं हिचकिचाते. स्कूल के लिए तैयार करना हो या फिर स्कूल होमवर्क में उनकी मदद करनी हो, खेल, डांस, ड्राइंग-पेंटिग आदि से लेकर उनके पूरे व्यक्तित्व को बनाने में उनका सहयोग देते हैं.

पापा की लाडली बनी रहती हैं बेटियां

मनोवैज्ञानिकों का कहना है, ‘जैसे-जैसे पिता की उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे उनका बचपना वापस आने लगता है, यानी उन्हें अच्छा लगता है कि कोई उनकी परवाह करे, समझे. और जैसे-जैसे बेटियों की उम्र बढ़ती है उनके अंदर मातृत्व की, यानी समझने -समझाने की, देख-रेख आदि करने की भावना जन्म लेने लगती है. बेटियां पिताजी का खान-पान हो या रख-रखाव, सुबह की चाय हो या दवाइयां सभी का पूरा ख्याल रखने लगती है. पिता की जो बात मां को समझ नहीं आती उसे बाप-बेटी की सहायता से मां को या घर के अन्य सदस्यों को समझाने के लिए कहता है. अकेले में बेटी को बुलाकर कभी अपनी भविष्य की योजनाएं बनाता तो कभी अपने दिल का दर्द बांटता है. उसे लगता है कि बेटी उसकी बातों को ना केवल तसल्ली से सुनेगी औ समझेगी बल्कि हल ढंढने में मदद भी करेगी. यही कारण है कि बेटी को समाज या घरवाले भले ही बोझ या बुरी मानें, लेकिन शादी के वक्त बाप विदाई में फूट-फूट कर रोता है. कहीं न कहीं बाप-बेटी का रिश्ता अच्छी दोस्ती से गुजरते-गुजरते पुत्र और मां का रूप लेने लगता है, इसलिए शादी के बाद भी और मृत्यु से पहले तक पिता का पुत्री से मोह नहीं जाता, वह उसकी लाडली बनी रहती है.

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