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2014-कौन बनेगा प्रधानमंत्री? : आपकी धड़कनें शुरू होती हैं अब

|| अमलेन्दु उपाध्‍याय || 
2014 का लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर है लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से ही चुनाव की तैयारियां जारी हैं। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 'पीएम इन वेटिंग लिस्ट के अपने प्रतिद्वंदी नरेंद्र मोदी की गरिमामयी अनुपसिथति में लालकृष्ण अडवाणी ने गर्जना की कि बहुत जल्द मध्‍यावधि चुनाव होंगे। अब मध्‍यावधि चुनाव भले ही हों या न हों लेकिन देश के सियासी माहौल को देखकर लग तो यही रहा है कि चुनावी युद्ध का मैदान सज चुका है। हालांकि ऐसा माहौल बनने के लिए अकेले भाजपा ही दोषी नहीं है बलिक काफी हद तक यूपीए सरकार के अयोग्य और जनाधारविहीन मैनेजर तथा 10 जनपथ और सात रेसकोर्स के बीच बढ़ता तनातनी का माहौल भी जिम्मेदार है।

प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भले ही 2014 तक सात रेसकोर्स पर काबिज रहें लेकिन इतना तो तय है कि सरकार चाहे कांग्रेस की बने या किसी और की, 15 अगस्त 2014 को लाल किले पर तिरंगा डा मनमोहन सिंह नहीं फहराएंगे। जाहिर तौर पर 2014 का चुनाव कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी के नेतृत्व में ही लड़ेगी। लेकिन बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का बेसब्री से इंतजार कर रही प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पार्टी इस समय बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है।

याद होगा 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले जब भाजपा ने लाल कृष्ण अडवाणी को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव लड़ा था तो उसने कांग्रेस पर लगातार निशाना साधा था कि वह बताए कि उसका प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन है। भाजपा के उस आक्रामक प्रचार के जवाब में कांग्रेस को घोषणा करनी पड़ी थी कि उसके अगले प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ही होंगे और सरकार बनने पर उसने अपना वायदा निभाया भी।

कहते हैं दुनिया गोल है और इतिहास खुद को दोहराता भी है। लेकिन इतनी जल्दी दुनिया गोल हो जाएगी ऐसा तो नहीं सोचा था। यहां मुददे कैसे बदलते हैं और नायक कैसे क्षण भर में खलनायक और खलनायक नायक बन जाते हैं यह भारतीय राजनीति में ही देखा जा सकता है। अजब इत्तेफाक है कि 2009 का चुनाव कांग्रेस ने डा. मनमोहन सिंह की कथित र्इमानदारी के नाम पर ही लड़ा था लेकिन आज उनकी ईमानदारी और प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जबकि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते अपने दक्षिण विजय के पहले सेनापति येदियुरूप्पा और उत्तर में देवभूमि उत्तराखण्ड के सेनापति डा. रमेश पोखरियाल निशंक की भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते राजनीतिक बलि लेने वाली भारतीय जनता पार्टी 2014 के चुनाव की तैयारी मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की ही कर रही है। यानी योद्धा और अस्त्र वही हैं लेकिन पक्ष बदल गए हैं।

और 2009 में जो अलोकतांत्रिक सवाल भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि उसके प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन है? 2014 से पहले आज वही सवाल उसके सामने खड़ा है कि उसका प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन? भारत में संसदीय लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता से नहीं होता बलिक सत्तारूढ़ दल के सांसद अपना नेता चुनते है. इसलिए अगला प्रधानमंत्री कौन का नारा देना देश के संविधान और लोकतंत्र के साथ भददा मजाक है। फिर भी नारा दिया गया है 2014 में लड़ारई 'राहुल बनाम मोदी’ होगी। राहुल गांधी के जवाब में भाजपा के एक धड़े ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम उछाला तो 2014 में अपनी दावेदारी पक्की करने के लिए लालकृष्ण अडवाणी अपनी रथयात्रा पर निकलने वाले हैं। संभवत: यह उनके राजनैतिक जीवन की अंतिम रथ यात्रा होगी।

अब यह तो तय है कि अखाड़े में एक पहलवान राहुल तो होंगे लेकिन मोदी होंगे कि नहीं इस विषय में संशय है। गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए नरसंहार के दौरान जो पाप हुए उनका घड़ा अब भरने लगा है। सोहराबुददीन, इशरतजहां, संजीव भटट और हरेन पांडया के मामले अब मोदी के गले की फांस बनते जा रहे हैं। ऐसे में 2014 तक मोदी को दिल्ली की तरफ पैर करके सोने का ख्याल भी छोड़ देना होगा वरना 2014 से पहले सात रेसकोर्स नहीं वह कृष्ण मंदिर में होंगे। ऐसे में 2014 में लड़ार्इ कम से कम राहुल बनाम मोदी तो नहीं ही होगी और अडवाणी जी के बुढ़ापे को देखते हुए नागपुर उन्हें युवराज के सामने मैदान में उतारने से मना कर चुका है। भाजपा में, बकौल रविशंकर प्रसाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की कोर्इ कमी नहीं है लेकिन वहां भीड़ भी भारी है। तमाशा यह है कि लाल कृष्ण अडवाणी और नरेंद्र मोदी ही भाजपा में जनाधार वाले नेता हैं लेकिन नागपुर को अब इन दोनों पर ही भरोसा नहीं रह गया है जबकि सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अरूण जेटली, वैंकेया नायडू, अनंत कुमार, नितिन गडकरी जैसे लोग तो जनाधारविहीन हैं। ऐसे में संकट भाजपा के सामने ज्यादा है और कांग्रेस के सामने कम।

हो सकता है कि 2014 आते आते भाजपा और अक रक्षात्मक मुद्रा में आ जाए और इस सवाल से ही कतराने लगे कि अखाड़े में राहुल के सामने भगवा खेमे का मल्ल योद्धा कौन होगा। शिवराज सिंह और रमन सिंह के जो नाम भाजपा का एक खेमा उछाल रहा है वह भी दमदार नहीं है क्योंकि भले ही शिवराज सिंह और रमन अपने अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं लेकिन न तो राष्ट्रीय स्तर पर जनता में उनकी कोर्इ छवि है और न भाजपा के घाघ उनको प्रोजेक्ट कर मैदान में उतरना चाहेंगे।

कुल मिलाकर बात यह है कि जनता मनमोहनी अर्थव्यवस्था और प्रशासन से खासी परेशान है। महंगार्इ, भ्रष्टाचार, निजीकरण, राष्ट्रीय संपत्ति और संसाèानों की सरकार के सरंक्षण में कारपोरेटी लूट और बढ़ते अमेरिकी दखल से जनता त्रस्त है लेकिन उसके पास और विकल्प भी अभी कहां हैं? वामपंथी दल अभी बंगाल में अपनी हार का गम भी नहीं भुला पाए हैं तो समाजवादियों के एक खेमे ने राजग की चिलम भरने और एक खेमे ने यूपीए का पिछलग्गू बनने की ठान ली है। बाकी बसपा, तेदेपा और अन्य छोटी जमातों का अभी कोर्इ असर नहीं है। आर्थिक मोर्चे पर नीतियां तो भाजपा और कांग्रेस की एक ही हैं। ऐसे में कांग्रेस को बदलकर भाजपा आ भी जाए तो भी जनता का तो भला नहीं होना है। आज जो परिसिथतियां हैं उसमें 2014 का नक्शा साफ दिखार्इ दे रहा है कि कांग्रेस भले ही स्पष्ट बहुमत में न आए लेकिन सरकार तो उसके ही नेतृत्व में या उसके समर्थन से ही बनेगी। यह बात अलग है कि राहुल गांèाी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के बावजूद संभवत: अभी उनके हाथ में राजगददी की लकीरें स्पष्ट नहीं हैं।

अब यह इस देश की जनता का नसीब है कि वह जो जनादेश देती है उसका आखिरी फैसला या तो 10 जनपथ के इशारों पर होता है या नागपुर और झण्डेवालान के इशारे पर। लेकिन असलियत में जनता जो चाहती है अंत में वह होता नहीं है। अगर जनता की मर्जी चलती तो 2004 में मनमोहन सिंह प्रèाानमंत्री न बनते। खैर….

राजदरबार के खेल भी अजीबोगरीब होते हैं। जो खबरें छनकर बाहर आ रही हैं उनके मुताबिक डा. मनमोहन सिंह अब 10 जनपथ के राजदुलारे नहीं रह गए हैंै। लगता है कि 10 जनपथ और सात रेसकोर्स की तनातनी के बीच नुकसान कांग्रेस को ही हो रहा है। डा. मनमोहन सिंह ने नरसिंहाराव के साथ काम किया है। राजनीति के दांव पेंच भी उन्हीं से सीखे हैं। ऐसे में लगता यही है कि मनमोहन सिंह दूसरे नरसिंहाराव बनने की राह पर बढ़ चुके हैं। बस परिसिथतियो में थोड़ा सा अंतर है तो इतना कि राव 10 जनपथ से टकराते हुए कांग्रेस के और क्षत्रपों से भी लगातार मोर्चा लेते रहे और जब तक वे सत्तारूढ़ रहे 10 जनपथ की हिम्मत सक्रिय राजनीति में हिस्सेदारी करने की नहीं रही। मनमोहन सिंह इस मामले में थोड़े से भाग्यशाली हैं। उन्हें राव की तरह अजर्ुन सिंह, एन डी तिवारी, राजेश पायलट, सीतारम केसरी जैसे मजबूत क्षत्रपों से नहीं उलझना पड़ रहा है। और टूजी स्पैक्ट्रम से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक जो माहौल मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया है उसके चलते 10 जनपथ युवराज का राजतिलक अभी नहीं कराएगा। लिहाजा 7 रेसकोर्स में डेरा जमाए रखने के लिए मनमोहन सिंह को वे हथकण्डे नहीं अपनाने पड़े हैं जो नरसिंहाराव ने अपनाए थे।

मनमोहन सिंह निशिचंत हैं। उन्हें मालूम है कि 2014 में उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा है और मौजूदा हालात में लाख चाहने के बावजूद 10 जनपथ उन्हें बदलने से रहा। इसलिए अगर देश में अनिशिचतता और चुनावी तैयारियों का माहौल बन रहा है तो प्रèाानमंत्री को चिंता किस बात की है? चिंता करें युवराज और पीएम इन वेटिंग लिस्ट।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक एवं हस्तक्षेप डाट काम के संपादक हैं।) 

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