
Akshay Kr Jha/Kumar Guarav
Ranchi: बीजेपी शासित राज्यों में शिक्षा विभाग पर नीति आयोग का पूरी तरह से कब्जा है. नीति आयोग की हर योजना राज्य के विभाग आदेश की तरह मानते हैं और उस योजना का क्रियान्वयन करते हैं. नीति आयोग ने हाल ही में देश में ऐसे 101 ऐसे जिलों की सूची बनायी जो पिछड़े हैं. इन जिलों की लिस्ट में झारखंड के 19 जिले हैं. इन जिलों की सूची बनाने के लिए शिक्षा को भी एक पैमाना माना है. इस पैमाने में 30 फीसदी शिक्षा से संबंधित विकास योजनाएं हैं. झारखंड में शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए नीति आयोग की ही तरफ से ज्ञानोदय योजना के तहत विद्या वाहिनी योजना को शुरू करने का निर्देश दिया गया. निर्देश के बाद योजना को शुरु करने में जो तेजी देखी गयी, वो सिर्फ खरीद-बिक्री तक ही रही. करीब 56 करोड़ खर्च के बाद ये योजना फिर से ठंडे बस्ते में चली गयी. क्योंकि खरीदारी और उससे संबंधित सारे काम विभाग की तरफ से पूरा कर लिया गया था.
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क्या है विद्या वाहिनी योजना
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए बेहतर मूल्यांकन की जरूरत है. स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर परिणाम में सुधार को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग ने एक सूचकांक बनाया. जिसे SEQI (School Education Quality Index) कहते हैं. इस सूचकाकं को बनाने के पीछे नीति आयोग का कहना है कि सूचकांक को देखते हुए सुधार किस दिशा में करना है स्पष्ट होगा. इसी के तहत हर राज्य में विद्या वाहिनी योजना की शुरुआत की गयी. सात सिंतबर 2017 को शिक्षा विभाग की एक अहम बैठक के बाद झारखंड में विद्या वाहिनी योजना शुरु करने पर सहमति बनी. योजना के तहत छात्रों का नामांकन, उपस्थिति और विद्यालय छोड़ने, एमडीएम और शिक्षकों की उपस्थिति पर नजर रखने के लिए वास्तिविक समय आंकड़ा बनाने की जरूरत समझी गयी. ये आंकड़ा एक Software के जरिए बनाया जाना था. जिसे विद्या वाहिनी का नाम दिया गया.
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Software के लिए खरीदे 56 करोड़ के टैब, जो बेकार पड़े धूल फांक रहे हैं
ज्ञानोदय योजना की एक अंग विद्या वाहिनी को शुरू करने में जो तत्परता दिखायी गयी. टैब खरीदारी के बाद वो जुनून सुस्ती में बदल गया. विद्या वाहिनी Software को चलाने के लिए जैप आईटी की तरफ से टैब की आपूर्ति की गयी. एक टैब की कीमत 13,504 रुपए थी. 41,000 टैब की खरीदारी जैप आईटी ने की, कुल लागत करीब 56 करोड़ आया. लेकिन इससे हुआ कुछ नहीं. शिक्षा विभाग की तरफ से निर्देश देने के बाद दो महीने में ही टैब खरीदारी का काम निबटा दिया गया. राज्य से हर जिले में टैब भेज दिए गए. अब ये सारे टैब वहां के डीएसई कार्यालय में धूल फांक रहे हैं. ये किसी काम के नहीं है.
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