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विस्थापन के 60 सालः मुआवजा और पुनर्वास के लिए आज भी लड़ रहे रैयत


Satya Sharan Mishra

Bokaro, 18 August: बोकारो स्टील प्लांट के विस्थापित 60 साल बाद आज भी अपने हक के लिए लड़ रहे हैं. मुआवजा और पुनर्वास की मांग को लेकर सालों से आंदोलन चल रहा है. विस्थापितों को उनका हक दिलाने के लिए कई नेताओं और पार्टियों ने आंदोलन के नाम पर अपनी राजनीति चमकाई. समरेश सिंह समेत कई नेताओं ने विस्थापितों के नाम पर लंबी राजनीति की. इन राजनेताओं ने आंदोलन के बहाने सत्ता के गलियारे में अपनी गोटी फिट कर विस्थापितों को उनके हाल पर ही छोड़ कर निकल लिये. गौरतलब है कि भारत को स्टील के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और तात्कालीन बिहार जैसे पिछड़े राज्य में उद्योग लगाकर इलाके का विकास करने के उद्देश्य से भारत और सोवियत संघ सरकार के बीच बोकारो स्टील प्लांट बनाने पर सहमति हुई थी. स्टील प्लांट के लिए तो भारी मात्रा में रैयतों की जमीन ले ली गयी, लेकिन एक बड़े हिस्से में आज भी प्रबंधन ने कोई काम शुरु नहीं किया है.

प्रबंधन ने पूरे नहीं किये वादे

तत्कालीन बिहार सरकार ने 1956 में बोकारो इस्पात संयंत्र को कुल 31287.24 एकड़ भूमि उपलब्ध कराया, जिसमें 26908.565 एकड़ अर्जित भूमि, 3600.215 एकड़ गैर मजरुआ भूमि एवं 778.46 एकड़ वन भूमि शामिल था. इस भूमि में 19 मौजा के करीब 30-35 गांव आते हैं. प्लांट लगाते वक्त प्रबंधन ने रैयतों को उचित मुआवजा और पुनर्वास का भरोसा दिया था, लेकिन प्रबंधन ने अपने वादे पूरे नहीं किये. इसके बाद 17 फरवरी 1968 को विस्थापित गांव के प्रमुख सभी लोगों की बैठक हुई, जिसमें बीएसएल के तत्कालीन मैनेजिंग डॉयरेक्टर केएन जार्ज ने प्लांट की नियुक्तियों में और दुकानों के आवंटन में विस्थापितों को प्राथमिकता दिये जाने का आश्वासन दिया था. मजदूर, माली, खलासी जैसे अकुशल वर्ग के पद विस्थापितों के लिए सुरक्षित रखने का भी वादा किया था. लेकिन प्रबंधन ने अपने वादे को पूरा नहीं किया.

रैयत बैठे हैं बेकार, ठेके पर रखे जा रहे मजदूर

अब हाल यह है कि वर्तमान में फोर्थ ग्रेड के पदों पर ठेके में मजदूर रखे जा रहे हैं. दुकानों में विस्थापितों की प्राथमिकता का यह हाल है कि सेक्टर-4 के 638 दुकानों में से मात्र 29 दुकान ही विस्थापितों को मिले हैं, जबकि बीएसएल प्रबंधन यह दावा कर रहा है कि सीएसआर के फंड से कारखाने के 20 किलोमीटर की परिधि में आने वाले सभी क्षेत्र में विकास के कार्य किये जा रहे हैं. जबकि हकीकत यही है कि अधिकांश गांवों में पानी के लिए चापाकल तक नहीं है, कई गांव में हाई स्कूल और अस्पताल नहीं है.

भूमि अधिग्रहण कानून भी कहता है रैयतों को वापस मिले जमीन

भूमि अधिग्रहण कानून के जानकारों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार भी विस्थापितों को उनकी जमीन वापस मिलनी चाहिए, क्योंकि 60 साल के बाद भी रैयतों की जमीन पर प्लांट का कोई काम शुरु नहीं हुआ. इस दिशा में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने 2007 में प्रयास भी किया था. तात्कालीन सचिव ने जिले के डीसी को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि जिस 7300 एकड़ जमीन पर बोकारो स्टील संयंत्र का कोई काम नहीं हो रहा है, तो उसे रैयतों को वापस दे दिया जाए. लेकिन फिर ये ठंडे बस्ते में चला गया.

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