
New Delhi: राफेल डील को लेकर केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है. केंद्र सरकार ने राफेल डील से संबंधित कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है. इसके पीछे दो तर्क दिये गये हैं. पहली यह कि यह गोपनीयता का मामला है. सरकार गोपनीयता की शर्तों का उल्लंघन नहीं कर सकती. और दूसरी यह कि यूपीए सरकार भी एेसा ही करती थी. यूपीए सरकार के वक्त भी रक्षा सौदों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक नहीं किया जाता था. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल डील को लेकर आरोप लगाए हैं. राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राफेल की खरीद में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ है. इसे लेकर बुधवार को भी उन्होंने कई ट्विट किए. जिसमें कहा कि गोपनीयता का मतलब घोटाला होता है. केंद्र सरकार ने राफेल डील से जुड़े राहुल गांधी के सभी आरोपों को बेबुनियद बताया है.
जितनी जानकारी देनी जरुरी है, उतनी दी जा चुकी है
सरकार ने कहा है कि राफेल विमान की मोटे तौर की लागत की जानकारी संसद को दी जा चुकी है. आइटम के लिहाज से लागत और अन्य सूचनाएं बताने पर वे सूचनाएं भी आम हो जाएंगी, जिनके तहत इन विमानों का कस्टमाइजेशन और वेपन सिस्टम से लैस किया जाएगा. यह काम विशेष तौर पर मारक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. अगर इनका खुलासा हुआ तो सैन्य तैयारियों पर असर पड़ेगा. वर्ष 2008 में साइन किए गए सिक्यॉरिटी एग्रीमेंट के दायरे में भी आएंगे. कॉन्ट्रैक्ट के ब्योरे को आइटम के हिसाब से आम न करके सरकार भारत और फ्रांस के बीच हुए उस समझौते का पालन भर कर रही है, जिस पर पिछली सरकार ने साइन किए थे.
क्षमता, कीमत, उपकरण, डिलिवरी, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग
दावा किया गया है कि राफेल के लिए सरकार ने जो डील की है, वह क्षमता, कीमत, उपकरण, डिलिवरी, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग आदि के मामले में 10 साल तक बातचीत में सौदा फाइनल न कर पाने वाली सरकार से बेहतर है. मौजूदा सरकार ने सौदे पर महज एक साल में बातचीत पूरी कर ली. इस बात को एक बार फिर दोहराया जा रहा है कि 36 राफेल विमानों की खरीदारी फ्रांस की सरकार के साथ समझौते के जरिये हुई है, ताकि रक्षा खरीदारी की प्रक्रियाओं के मुताबिक भारतीय वायुसेना की फौरी जरूरतों को पूरा किया जा सके.




