
Asghar Khan, Ranchi: रांची के ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. वैज्ञानिक मानते हैं कि पहाड़ी मंदिर लगभग 4500 मिलियन वर्ष पुराना है, जबकि कई जानकारों के अनुसार यह 900-1200 मिलियन वर्ष पुराना है. स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई स्वतंत्रता सेनानियों को इसी स्थान पर फांसी दी गयी थी, जिसकी वजह से इसे फांसी टुंगरी भी कहा जाता है. इसी जगह पर 23 जनवरी 2016 को विश्व का सबसे बड़ा और उंचा तिरंगा झंडा फहराया गया. भारतीय इतिहास में पहाड़ी मंदिर के संदर्भ में ऐसी ही ढेरों किस्से दर्ज हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि इस एतिहासिक पहाड़ी मंदिर के अस्तित्व पर अब संकट मंडाराने लगा है. लोगों का मानना है कि पहाड़ी मंदिर और उसके आसपास इसी तरह निर्माण कार्य होता रहा तो एक दिन पूरा पहाड़ खत्म हो जायेगा.
पहल नहीं की गई, तो में खत्म हो जायेगी पहाड़ी
पहाड़ी मंदिर रांची के सौंदर्य में चार चांद लगाता है. झारखंड में एक्का-दुक्का ही इतने पुराने पहाड़ मौजूद हैं. यहां शोधकर्ताओं से लेकर पर्यटकों की भीड़ उमड़ती है. पहाड़ और उसके चारों ओर हजारों पेड़ हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसकी खूबसूरती कम होती जा रही है. पर्यावरणविद डॉ नीतीश प्रियदर्शी का मानना है कि पहाड़ी मंदिर का स्वरुप अब पहले जैसा नहीं है. पिछले तीन साल में इस पहाड़ पर कई बड़े कंस्ट्रक्शन के कामों से पहाड़ी के चट्टानों को काफी नुकसान पहुंचा है. वहीं आस-पास के इलाकों में बने भवनों की वजह से कभी भी बड़ा भू-स्खलन हो सकता है. निर्माण कार्य के लिए पहाड़ के नीचे से काफी मात्रा में मिट्टी काटी गई है, जिसकी वजह से चट्टान खिसकने का खतरा है. प्रियदर्शी ने उत्तराखंड में हुए भू-स्खलन जैसी घटना की संभावना भी जताई है. उन्होंने कहा कि सरकार को इसे रोकने लिए कोई ठोस कदम उठाना चाहिए. अन्यथा ऐसे ही कंस्ट्रक्शन का काम होता रहा तो आने वाले समय में लाखों साल पुराना यह पहाड़ पूरी तरह से खत्म हो जायेगा.

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हिमालय से भी पुराना है रांची पहाड़ी का पत्थर
हिस्ट्रोरिकल और जियोलॉजिकल दोनों ही दृष्टिकोण से रांची पहाड़ी मंदिर कई मायनों में महत्व रखता है. पहाड़ के पत्थर को हिमालय से भी पुराना बताया जाता है. पर्यावरणविद कहते हैं कि यह स्थल 55 हजार साल से भी पुराना है. इसके चट्टान कायांतरित शैल से बने हुएं हैं, जो ध़ड़वाल काल के बताए जाते हैं. यह स्थल राषट्रीय धरोहर के लिए सभी तरह के मापदंड को पूरा करता, बावजूद इसके अभी तक इसे देश का धरोहर घोषित नहीं किया गया है. 1905 के आस-पास इस पहाड़ी के शिखर पर शिव मंदिर का निर्माण हुआ था. तब से लेकर अबतक यहां रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंचते ,हैं साथ-साथ पर्यटन का भी मजा लेते हैं।
खतरे के बावजूद पहाड़ी की चोटी पर जारी है कंस्ट्रक्शन
रांची के इस पहाड़ी पर 26 जनवरी और 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है. पहाड़ी की चोटी पर 293 फीट ऊंचे झंडे को तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 22 जनवरी 2016 को पहली बार फहराया था, जो देश का सबसे बड़ा और ऊंचा झंडा है, लेकिन झंडे के लिए जिस पोल को लगाया गया है, उसके निर्माण के क्रम में भी पहाड़ी को काफी नुकसान पहुंचा है. वहीं वर्तमान में भी पहाड़ी पर कंस्ट्रक्शन कार्य जारी है.
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पर्यावरणविदों का सुझाव
पर्यावरणविदों का मानना है कि वहां किसी भी तरह के बड़ा निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए. आसपास सड़कों का चौड़ीकरण भी नहीं हो. भारी वाहनों पर रोक लगे. पहाड़ी परिसर में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाये. पहाड़ या उसके आस-पास से मट्टी के कटाव पर पूरी तरह से रोक लगे. इसके अलावा लगातार इसकी देख-रेख सही ढंग से होती रहे तभी यह पहाड़ी और रांची की गौरव बची रहेगी.
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