|| श्रीनिवास ||
संसद पर हमले की साजिश में शामिल अफजल गुरू को फांसी की खबर यूं तो पुरानी हो चुकी है, मगर इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जायेगा। उल्लेखनीय है कि अफजल को दिये जाने पर देश और जम्मू-कश्मीर में दो तरह की और परस्पर विपरीत प्रतिक्रिया हुई है, मगर इससे हमारे ‘राष्ट्रभक्त’ जरा भी परेशान नहीं हैं। लेकिन इस फांसी दिये में बरती गयी जल्दबाजी और गोपनीयता से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिसका संतोषप्रद जवाब भारत सरकार और इस फांसी पर जश्न मना रहे लोगों की ओर से अब तक नहीं दिया गया है। ये सवाल कानून और राजनीति से संबद्ध हैं। मृत्युदंड से जुड़े नैतिक-मानवीय सवाल तो इतर हैं।
सबसे पहला और बड़ा सवाल तो यही है कि अफजल गुरू को फांसी दिये जाने का फैसला न्यायिक जरूरत के तहत लिया गया; या यह एक राजनीतिक फैसला था? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है कि अब तक देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री (राजीव गांधी) और एक मुख्यमंत्री (बेअंत सिंह, पंजाब) के हत्यारों, जिन्हें वर्षों पूर्व सर्वोच्च अदालत मृत्युदंड दे चुकी है, को फांसी नहीं दी गयी है। ध्यान रहे कि 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनाते हुए कहा था कि ऐसे हमलावरों को मृत्युदंड की सजा देने से ‘समाज की सामूहिक अंतष्चेतना’ (द कलेक्टिव कंसेंस ऑफ द सोसाइटी) संतुष्ट होती है। क्या किसी को मौत की सजा देने के लिए ठोस प्रमाण और असंदिग्ध रूप से उसका दोष सिद्ध होने के बजाय समाज की सामूहिक अंतश्चेतना का संतुष्ट होना ही पर्याप्त है? कहा गया कि अफजल को फांसी देकर देश ने अपने दुश्मनों को ‘कड़ा’ संदेश दे दिया है। यह भी कि अब कोई आतंकवादी देश पर वैसा हमला करने का साहस नहीं करेगा। क्या सचमुच? जो आत्मघाती हमलावर होते हैं, वे तो अपनी मौत निश्चित मान कर ही ऐसी कर्रवाई करते हैं। वे तो इस जुनून में मुब्तिला रहते हैं कि वे ऐसा करके कोई धार्मिक कर्तव्य पूरा कर रहे हैं, ‘शहीद’ होने जा रहे हैं। ऐसे लोगों को मौत और फांसी का भय भला क्या होगा।
जेल प्रशासन, यानी केंद्र सरकार ने अफजल गुरू को फांसी देने में जो तत्परता दिखायी, और फांसी दिये जाने के पहले उसके परिवार को इसकी सूचना देने में जो लापरवाही दिखायी, वह भी अपने आप में संदेह पैदा करता है। राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका भी राष्ट्रपति ने खारिज कर दी है, लेकिन यह खबर आसानी से ‘लीक’ हो गयी या कर दी गयी और उनकी ओर से तत्काल दया याचिका खारिज किये जाने और फांसी दिये जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी और अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए फांसी पर रोक भी लगा दी। वैसे यह भी अपने आप में अजीब और विचारणीय है कि जिस सुप्रीम कोर्ट के ‘अंतिम’ निर्णय के बाद राष्ट्रपति अपराधी की दया याचिका पर विचार करते और फैसला लेते हैं, वही सुप्रीम कोर्ट राश्ट्रपति के फैसले के अमल पर रोक लगा देता है! एक पूर्व प्रधानमंत्री और एक राज्य के मुख्यमंत्री के हत्यारों को सुनायी जा चुकी फांसी की सजा पर रोक लगाने के लिए दो राज्यों की निर्वाचित सरकारें और सत्तारूढ़ जमातें बाकायदा मांग करती हैं, विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराती हैं, लेकिन ‘परम’ देशभक्त भी इसे देश विरोधी कदम नहीं मानते! इसलिए कि हमारे नेताओं को तमिलों और सिख समुदायों की भावनाओं और उनके वोट की चिंता है; और कश्मीरियों (यानी कश्मीरी मुसलमानों) के वोट की नहीं? यह संदेह तो व्यक्त किया ही गया है कि दरअसल यूपीए सरकार ने यह जल्दबाजी विपक्ष/भाजपा के इस आरोप का जवाब देने के लिए दिखायी कि सरकार आतंकवाद, खास कर जेहादी (यानी मुसलिम) आतंकवाद से निबटने में कमजोर है। यदि यह सही है, तो निश्चय ही गलत है। इस तरह के फैसलों से सरकार और कांग्रेस को तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाये, हालांकि यह भी संदिग्ध है, मगर देश के दूरगामी हित के लिहाज से ये नुकसानदेह ही होते हैं।
प्रसंगवश, शायद कुछ पाठकों को वर्षों पूर्व आयी एक हिंदी फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ की याद हो। शाहरुख खान अभिनीत यह बहुत साधारण मसाला फिल्म थी, फिर भी उसमें व्यवस्था या उसके भ्रष्ट तत्वों द्वारा एक निर्दोष व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने और अदालत में उसे दोषी सिद्ध कर फांसी की सजा सुनाये जाने की जो कथा है, ऐसी अनेक घटनाओं को आप हम याद कर सकते हैं। फिल्म में एक भ्रष्ट मंत्री, एक टीवी चैनल के मालिक के सुझाव पर, अपने निजी राजनीतिक हित में उस फांसी का लाइव प्रसारण कराने का फैसला करता है और नायक, जो एक टीवी रिपोर्टर है, अत्यंत नाटकीय तरीके से जनता को उस ‘आतंकवादी’ को निर्दोष और साजिश का शिकार साबित कर जनता को फांसी के विरोध में सड़क पर उतरने को प्रेरित करता है और अंतत: उसे बचा लिया जाता है। यहां उक्त फिल्म के जिक्र का मकसद अफजल को निर्दोष साबित करना नहीं है। लेकिन अफजल को फांसी दिये जाने के बाद देश की मीडिया, खास कर टीवी चैनलों पर देशभक्ति प्रदर्शित करने की जो होड़ नजर आ रही थी और देश के कुछ तबकों में राष्ट्रवाद का जो जुनून उमड़ रहा था, उससे मुझे सहसा उस फिल्म की याद आ गयी। हालांकि दोनों में अंतर यह था कि फिल्म में जहां कोर्ट द्वारा दोषी पाये गये व्यक्ति को निर्दोष बताया गया, वहीं मौजूदा प्रकरण में अफजल को निर्दोष मानने का कोई ठोस आधार नहीं है। फिर भी देश के अनेक प्रतष्ठित विधि विशेषज्ञों ने पूरी अदालती प्रक्रिया और आनन फानन में फांसी दिये जाने पर गंभीर सवाल तो खड़े किये ही हैं। वैसे फिल्म में देशभक्ति की आड़ में फांसी को ‘बेचने’ की चैनलों की ओछी प्रवृत्ति की कुछ झलक यहां भी दिखायी पड़ी।




