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रांचीः ‘गौरी लंकेश अमर रहे’ नारे के साथ निकला प्रतिवाद मार्च

राजधानी में जुटे सैकड़ों लेखक, पत्रकार, सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी व संस्कृतिकर्मी

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Ranchi, 07 September : बेंगलुरू की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ गुरूवार को राजधानी के अल्बर्ट एक्का चौक पर प्रवाद मार्च निकाला गया. जलेस, प्रलेस, जसम, अवामी इंसाफ़ मंच, इप्टा, साझा कदम और शहर के सैकड़ों लेखक, पत्रकार, सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ता बुद्धिजीवी ने प्रतिवाद मार्च में भाग लेकर केन्द्र सरकार के खिलाफ नारे-बाजी करते हुए प्रदर्शन किया. इस मौके पर अल्बर्ट एक्का चौक पर तीन बजे दिन से ही लोगों इकट्ठा होने लगे थे. अल्बर्ट एक्का चौक से विवि गेट तक प्रदर्शनकारियों ने पैदल मार्च किया. प्रतिवाद मार्च में केन्द्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए प्रदर्शनकारियों ने गौरी लंकेश के हत्यारे को फांसी देने की मांग की.

आरपार की लड़ाई समय की मांग 

प्रतिवाद मार्च के बाद अल्बर्ट एक्का चौक पर एक नुक्कड़ सभा का आयोजन किया गया. नुक्कर सभा में दर्जनों वक्ताओं ने केन्द्र सरकार की फासीवादी नीतियों की आलोचना की. इस मौके पर बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार रविभूषण ने कहा कि देश में कर्फ्यू जैसी स्थिति है. सच बोलनेवाले को खुलेआम सीने में गोली मार दी जा रही है. यह राष्ट्रवाद का विकृत चेहरा है. इसके खिलाफ आरपार की लड़ाई समय की मांग है. सच की आवाज को दबाया जा रहा है इस मौके पर बोलते हुए जलेस के एमजेड खान ने कहा कि देश में अघोषित रूप से आपातकाल की स्थिति है. केन्द्र सरकार भय की राजनीति का विस्तार करने में लगी हुई है. यही कारण है कि सच की आवाज को दबाया जा रहा है. नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए प्रलेस के मिथिलेश सिंह ने कहा कि सच लिखने-बोलने वालों के सामने चुनौतियां खड़ी हैं. भाजपा, आरएसएस और गुंडों के गठजोड़ से जन पक्षधरता की पत्रकारिता को दबाने की साजिश की जा रही है. यह सब केन्द्र सरकार के इशारे पर हो रहा है.

सांप्रदायिक राजनीति को किसान, मजदूर, लेखक, पत्रकार ही खत्म कर सकते हैं

इस मौके पर जसम के रूपक राग ने कहा कि सांप्रदायिक राजनीति को किसान, मजदूर, लेखक, पत्रकार ही खत्म कर सकते हैं. अब वह समय आ गया है कि एकताबद्ध होकर फासीवादी ताकतों को अलगाव में डालकर जनता की राजनीति को स्थापित की जाए. एक्टिविस्ट पत्रकार संजय झा ने कहा कि यह कर्फ्यू केंद्र के फासीवादी चेहरे को बेनकाब करती है, सच्चाई का दमन गोली से नहीं किया जा सकता है.

ये थे शामिल

प्रतिवाद मार्च में साहित्यकार-पत्रकार व लेखक रविभूषण, महादेव टोप्पो, पंकज मित्रा, प्रो. मिथिलेश, मधुकर, श्रीनिवास, संजय झा, जेब अख्तर, सुरेन्द्र सोरेन, एमजेड खान, रेणु प्रकाश, प्रो. जमशेद कमर, ओमप्रकाश वर्णवाल, प्रवीण परिमल, जसिंता केरकेट्टा, ज्योति लकड़ा, आलोका कुजूर, संतोष किड़ो, उमेश नजीर, डॉ एसएम अब्बास, डॉ आगा जफर, श्यामल मल्लिक, फिल्मकार श्रीप्रकाश, मेघनाथ, बीजू टोप्पो के साथ सोशल एक्टिविस्ट फादर स्टेन स्वामी, नदीम खान, एडवोकेट एके रसीदी, अजब लाल, केडी सिंह अंजुमन इस्लामिया के सदर इबरार अहमद, सामाजिक कार्यकर्ता प्रो विनोद कुमार, जेरॉम जिरॉल्ड कुजूर, रजनी, ललित कुमार, मंटू पासवान, अजय सिंह, विस्थापन विरोधी नेता दामोदर तुरी, अरूण प्रधान, जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उपेन्द्र सिंह, मजदूर नेता जर्नादन प्रसाद, सुभेन्दु सेन, भुवनेश्वर केवट, रजनी नैयर मल्होत्रा, ज्योति लकड़ा, जेसिंता केरकेटा, वीरेन्द्र यादव, प्रवीर पीटर, एहसान, केडी सिंह, प्रवीण पीटर, परवेज कुरैशी, जमील अख़्तर, तनवीर उज़्ज़मा खान, दानिश रहमानी, नाहिद तबरेज़, उमर साज़िद सहित शहर के कई नामचीन बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार, संस्कृतिकर्मी, फिल्मकार, प्रोफेसर व महिला एक्टिविस्ट शामिल हुए. आदिवासी एकता परिषद के महासिचव गुजरात निवासी अशोक चौधरी, कर्नाटक की रहनेवाली आदिवासी रिसर्चर अल्मा ग्रेस बारला भी शामिल हुईं.

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