भोपाल, 22 जनवरी | मध्य प्रदेश में 80 फीसदी किशोरियां एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं। राज्य के अपर मुख्य सचिव ओ.पी. रावत ने यह स्वीकार किया है। ऐसे में सुरक्षित मातृत्व व स्वस्थ बचपन की कल्पना नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं, प्रदेश सरकार और प्रशासन को बच्चों के कुपोषण से मुक्ति का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है।
‘बच्चों के भोजन के अधिकार’ विषय पर दूसरे राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन सत्र में रविवार को रावत ने कहा, “हमने बहुत विचार कर लिया, लेकिन कुपोषण से मुक्ति का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।” उन्होंने कहा कि जिस समाज में 80 प्रतिशत किशोरियां खून की कमी की शिकार हैं वहां सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ बचपन कैसे संभव है।
रावत ने कहा, “आंगनवाड़ी चला देने भर से भी कुछ नहीं होगा, जरूरत व्यवहार परिवर्तन की भी है। हम हर समस्या को पैकेज से हल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अकेले पैकेज से कुछ हासिल नहीं हो सकता।”
मध्य प्रदेश बाल अधिकार आयोग के सदस्य विभांशु जोशी ने प्रदेश में बच्चों की मौतों पर चिंता जताई और कहा कि विभागीय कार्यप्रणाली चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि बच्चों की मौत होने पर महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग एक दूसरे को दोषी ठहराते हैं, लेकिन इसमें किसी न किसी को तो जवाबदेही तय करनी पड़ेगी।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह दोनों विभागों में समन्वय बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि प्रदेश में बच्चों की स्थिति में सुधार हो सके। जोशी ने कहा कि वह प्रदेश में बच्चों पर चल रहे ‘ड्रग टायल’ और ‘पैक्ड रेडी टू इट’ पोषण आहार जैसी व्यवस्थाओं से असहमत हैं।
इस अधिवेशन में मांग उठी कि राज्य में बच्चों के पोषण आहार व मध्याह्न् भोजन को महंगाई सूचकांक से जोड़ा जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आंगनवाड़ी की सुविधा से कोई भी बच्चा वंचित न रहे। अधिवेशन में तीन दिन के विमर्श के बाद पच्चीस बिंदुओं पर एक घोषणापत्र (चार्टर) भी जारी किया गया।
समापन सत्र में भोजन के अधिकार अभियान की कविता श्रीवास्तव ने कहा कि सरकारों ने तमाम कानूनों के जरिए जनसमुदाय से जल, जंगल, जमीन पर से हक छीने हैं, उसी का परिणाम है कि आज कुपोषण की समस्या वैश्विक हो चुकी है।
कविता ने कहा, “हमारे प्रधानमंत्री कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताते हैं, लेकिन इतने सालों में क्या किया गया, यह नहीं बताते। पहले अकाल में भी लोगों की मौत नहीं होती थी, लेकिन अब बिना अकाल के ही लोग मर रहे हैं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनियों के लिए तो खूब खर्च किए जाते हैं, लेकिन किसी भी राज्य ने बच्चों के पोषण के लिए प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। इस अधिवेशन में 21 राज्यों के लगभग 950 प्रतिनिधि शामिल हुए। (आईएएनएस)




