पटना : वैशाली के देसरी निवासी संदीप कुमार एयरफोर्स में ज्वाइन करने से चूक जाते, यदि उन्हें जाति व आवासीय प्रमाणपत्र समय रहते न मिला होता. लोक सेवा अधिकार कानून के तहत उन्होंने दिसंबर 2011 में ऑन लाइन आवेदन दिया. मोबाइल पर मैसेज आया और 21 वें दिन प्रखंड कार्यालय जाने पर प्रमाण पत्र मिल गया.
लेकिन, रूबी कुमारी को सरकारी दफ्तर का चक्कर लगाने के झंझट से मुकित नहीं मिली है. उन्होंने जाति प्रमाण पत्र के लिए पटना में तीन जुलाई को आवेदन जमा किया. 28 जुलाई को प्रमाणपत्र मिल जाना चाहिए था. उनका आवेदन संख्या 040718282031230737 है.
यह लोक सेवा अधिकार कानून की जमीनी हकीकत है. जिन जिलों में सेवा से जुड़े अफसरों और कर्मचारियों ने रूचि दिखायी, वहां सेवा सुधर गयी. जिन जिलों में आधारभूत संरचना कमजोर है या फिर प्रखंड-अंचल कार्यालयों को बिचौलियों के चंगुल से आजाद नहीं कराया गया है, वहां लोग परेशान हैं.
बिहार में आरटीपीएस कानून 16 अगस्त 2011 से लागू हुआ. इसके एक साल पूरे हो गये. सरकारी सेवाओं में सुधार की दिशा में यह एक तरह का क्रांतिकारी बदलाव था. लोगों को भ्रष्टाचार से कुछ हद तक आजादी मिली और आम लोगों के हाथ में एक अचूक हथियार आया. दूसरे कई राज्यों ने इसे लागू किया.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि एक साल के दौरान दो करोड़ लोगों ने इस कानून का उपयोग कर सेवा हासिल की. इसके पहले जाति, आय, आवासीय प्रमाण पत्र हासिल करना या दाखिल खारिज कराना काफी मुश्किल भरा काम था.
कभी पंचायत सेवक नहीं मिलते थे तो कभी किरानी बाबू गायब. रिपोर्ट तैयार हो गया, तो बीडीओ साहब के दस्तखत के लिए कई दिनों तक इंतजार करना होता था. सबसे बड़ी बात कि प्रमाण पत्र न देने के लिए जिम्मेवारी तय नहीं थी.
एक वर्ष के अंदर लोक सेवा का अधिकार कानून का लाभ दो करोड़ लोगों को मिला है. हर माह 15 से 16 लाख लोगों को प्रमाण पत्र दिये गये हैं. अब जाति, आय व आवासीय प्रमाण पत्रों की मांग कम हो रही है. अधिकारियों के अनुसार एक वर्ष के अंदर रिकार्ड एक करोड़ 23 लाख लोगों ने जाति, आय व आवासीय प्रमाण पत्र लिये हैं.
लेकिन, अब भी यह बड़ा सवाल है कि कानून के तहत समय सीमा के भीतर सेवा न देने वाले अफसरों या कर्मियों पर कार्रवाई की संख्या कम क्यों है. मोतिहारी और कुछ अन्य जिलों में सीओ समेत एक दर्जन अफसरों के खिलाफ कार्रवाई जरुर हुई है. लेकिन, दफ्तरों के इर्द-गिर्द मंडराने वाले दलाल नहीं पकड़े गये.
कई जिलों से यह शिकायत है कि जल्दबाजी में प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए लोग नाजायज रकम खर्च करते हैं. इसके लिए रेट पांच सौ रुपये तक है. वैशाली जिला के देसरी, सहदेई बुजुर्ग व महनार प्रखंड कार्यालय में पिछले शनिवार को तहकीकात के दौरान दिखा कि सुबह से ही वहां दलाल मंडरा रहे थे.
जो भी सेवा के लिए आवेदन लेकर गये उन्हें पहले पटाने की कोशिश किया. पहले 1000 रुपया से शुरू किया और अंत में 500 रुपया पर बात पक्की हुई. कटिहार में दलाल खूब सक्रिय हैं.
15 अगस्त, 2011 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम लागू करने की घोषणा की थी. 16 अगस्त, 2011 से यह लागू हुआ. पिछले एक साल में इस कानून का इस्तेमाल कर दो करोड़ प्रमाणपत्र हासिल किये गये. एक अदद प्रमाणपत्र के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तरों का चक्कर काटने से इस कानून ने लोगों को आजादी दिला दी. हालांकि, कई जिलों में अब भी यह सेवा अफसरशाही और दलालों के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकी है.




