|| श्रीनिवास ||
भारत में ऐसा कहा और माना जाता रहा है कि बंगाल जो आज सोचता है, देश बाद में उसका अनुसरण करता है। हालांकि अब यह धारणा कहावत के रूप में ही रह गयी है। मगर पिछले कुछ दिनों से सुदूर बंगाल, यानी बांग्लादेश, से उक्त धारणा के अनुरूप सकारात्मक खबरें मिल रही हैं, जो धार्मिक जुनून और असहिष्णुता के इस दौर में विरल ही होती जा रही हैं।
उदारता और कट्टरता/असहिष्णुता के बीच हमेशा से सभी समाजों में जंग चलती रही है, आज भी चल रही है; और बांग्लादेश की अधिसंख्य आबादी आज मुट्ठी भर धर्मोन्मादियों के विरुद्ध लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और मानवीय मूल्यों को बचाने की लड़़ाई लड़ रही है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान बांग्लादेश में जिस तरह मजहबी चरमपंथ का उभार दिखता रहा है, उसे देखते हुए यह लड़ाई और भी सकारात्मक हो गयी है। करीब पांच लाख युवा, बुजुर्ग, महिलाएं पूरी तरह शांतिमय तरीके से अपनी मांग पर डटे हुए हैं। हालांकि उनके विरोधी लगातार हिंसा कर रहे हैं। पुलिस और कट्टरपंथियों के बीच झड़प में लगभग सौ लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन आंदोलनकरियों की ओर से हिंसा किये जाने की कोई सूचना नहीं है।
जैसा कि हम जानते हैं, बांग्लादेश नामक इस देश का जन्म ही द्विराष्ट्र सिद्धांत (‘टू नेशन थ्योरी’) के तहत बने पाकिस्तान के हुक्मरानों की ज्यादतियों और जिद के कारण हुआ था। दरअसल उक्त गलत धारणा के तहत बने पाकिस्तान का गठन भौगोलिक लिहाज से भी पूर्णतया अव्यावहारिक था। इसलिए कि इसके दो हिस्से भारत के पूरब और पश्चिम में एक दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर थे। सांस्कृतिक और भाषाई अलगाव तो था ही। प्रारंभ से ही पाकिस्तान पर पंजाबी और संकीर्ण मजहबी कट्टरपंथियों का दबदबा बना रहा। मगर जल्द ही वहां फौज ने सत्ता पर नियंत्रण कर लिया और थोड़े अरसे को छोड़ पाकिस्तान पर फौजी तानाशाही ही चलती रही, जो धार्मिक जुनून को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक मूल्यों व संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयास में लगा रहा। इस बीच पश्चिम, मूलत: पंजाब के वर्चस्व के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में विरोध की सुगबुगाट बढ़ती रही।
वर्ष 1971 के आम चुनाव में, पूर्वी पाकिस्तान के लोकप्रिय नेता मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल कर लिया, लेकिन तत्कालीन फौजी शासक याह्या खान ने जुल्फिकार अली भुट्टो के दबाव में उस चुनावी फैैसले के तहत अवामी लीग को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया। इस जिद के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में व्यापक विद्रोह की स्थिति बनने लगी, जिसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपने ही देशवासियों के खिलाफ जो दमनचक्र चलाया, हालिया विश्व इतिहास में उसकी मिसाल मुश्किल से मिलेगी। मुजीब सहित उनके हजारों साथी गिरफ्तार कर लिये गये। लाखों लोगों का कत्लेआम किया गया और लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। मगर विद्रोह और लोगों का संकल्प अंतत: दमन पर भारी पड़ा। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में भाारत ने भी सहयोग किया। नतीजतन पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने का आत्मघाती कदम उठाया। नतीजा, उसके करीब एक लाख सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया और आखिरकार बांग्लादेश नामक नये देश का अविर्भाव हुआ, जिससे भाारत विभाजन का मूल तर्क और सिद्धांत ही ध्वस्त हो गया। मगर उस संघर्ष के दौरान भी बांग्लादेश के कुछ इसलामी चरमपंथियों ने देश की आजादी का विरोध करते हुए पाकिस्तानी आतताइयों का साथ दिया। जमायते इसलामी जैसे संगठनों के लोगों ने अपने ही हमवतनों पर जुल्मो सितम ढाहने में शर्मनाक भूमिका निभायी। दुखद यह हुआ कि बहुत जल्द वहां बांग्लादेश की मुक्ति में निहित मूल्य और संकल्प तिरोहित होने लगे। चार साल बाद 1975 में बंगबंधु राष्ट्रपति मुजीब की उनके परिवार के कई सदस्यों सहित हत्या कर दी गयी। देश पर फौजी तानाशाही और फौजी शासकों के समर्थक दल हावी हो गये। इसके साथ ही बहुसंख्यक, यानी मुसलिम सांप्रदायिकता भी बढ़ने लगी। इसके खिलाफ आवाज उठानेवाली चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ उसी दौर में मौत का फतवा जारी हुआ; और तभी से वे विदेशों में भटक रही हैं। ऐसा लगने लगा था कि बांग्लादेश भी मजहबी जुनून और असहिष्णुता की आंधी में बह गया है। लेकिन ऐसा मानना गलत आज साबित हो गया है, क्योंकि आज वहां उसी जुनून व कट्टरता को अस्वीकार करने की जिद दिखायी पड़ रही है।
बंगबंधु की बेटी शेख हसीना वाजेद की सत्ता में वापसी के साथ ही न सिर्फ लोकतंत्र की वापसी और बहाली हुई, बल्कि 1971 के युद्ध अपराधियों (जिन लोगों ने उस दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ मिल कर आम लोगों पर अत्याचार किये थे और जो अब तक राजनीतिक संरक्षण के कारण मजे से फल फूल रहे थे) के खिलाफ लंबित मामालों की सुनवाई भी शुरू हुई। इसके लिए एक इंटरनेश्नल ट्राइबुनल भी गठित हुआ, जिसने जमायत के दो बड़े नेताओं को हत्या का दोषी पाकर आजीवन कारावास की सजा दी है। जमायत के लोग उस सजा को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता कर उपद्रव कर रहे हैं, जबकि राजधानी ढाका के शाहबाग चौक पर डटे लोग उक्त अपराधियों को फांसी दिये जाने की मांग कर रहे हैं।
कुछ राजनीतिक समीक्षक शाहबाग आंदोलन के नाम से जारी इस आंदोलन की तुलना अरब देशों-ट्यूनिशिया, मिस्र या लीबिया आदि- में बीते वर्ष तानाशाही के खिलाफ या लोकतंत्र की बहाली के लिए उभरे जनांदोलन से कर रहे हैं। मगर ऐसी तुलना सही नहीं है। इसलिए कि अरब का विद्रोह तानाशाही के खिलाफ था, जबकि शाहबाग आंदोलन पूरी तरह धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता के खिलाफ है। वैसे भी अरब देशों में हालिया विद्रोह के बाद तानाशाही शासन का अंत तो हुआ, पर अधिकतर देशों में धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें ही सत्तासीन हो गयी हैं; और इसे बहुत सकारात्मक नहीं कहा जा सकता।
खास बात यह भी है कि इस आंदोलन में ऐसे युवा बड़ी संख्या में शामिल हैं, जिनका जन्म 1971 के बाद, यानी बांग्लादेश की आजादी के बाद हुआ है। इससे पता चलता है कि इस देश में बहुलतावादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हैं। यह भी कि संकीर्ण जमातों के तमाम प्रयासों का असर देश की युवा पीढ़ी पर नहीं पड़ा है और वह बंगाल की बौद्धिक व सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध और सक्षम है। आश्चर्य कि पश्चिम की सरकारें और मानवाधिकार संगठन इस आंदोलन के पक्ष में खुल कर आगे नहीं आ रहे हैं। शायद इसलिए कि इस आंदोलन की प्रमुख मांग युद्ध आपराधियों को फांसी देने की है। इस मांग को अनुचित माना जा सकता है, लेकिन गौरतलब है कि अब तक आंदोलनकारियों की ओर से हिंसा की कोई सूचना नहीं है, जबकि धर्मोन्मादी तत्व लगातार उपद्रव और हिंसा कर रहे हैं और इस क्रम में अब तक सौ से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। निश्चय ही यह आंदोलन बांग्लादेश के भविषय की दिशा तय करेगा। ऐसे में महज फांसी की मांग के आधार पर इस आंदोलन के व्यापक सकारात्मक उद्देश्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती; और विश्व भर के लोकतंत्र और सहिष्णुता के हिमायतियों को इसके पक्ष में खड़ा होना ही चाहिए।




