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पंचायत और वार्ड प्रतिनिधि उठा रहे सवाल, विधायकों का वेतन 2.65 लाख, हमरा 1,000 क्यों

Akshay Kumar Jha

Ranchi, 21 September: बीते तीन सालों में झारखंड के विधायकों के वेतन में दो बार बेतहाशा इजाफा हुआ. वहीं, बीते सात सालों में पंचायत प्रतिनिधियों के वेतन में इजाफे की बात तो छोड़िए पूरा वेतन भी आज तक नहीं मिला. जहां एक विधायक को अब हर महीने 2.65 हजार रुपए मिलेंगे. वहीं, एक पंचायत के मुखिया को सिर्फ 1000 मानदेय के रूप में मिलने का प्रावधान है, समय पर मिलता नहीं है. जबकि सरकारी कोई भी योजना हो, बिना पंचायत प्रतिनिधियों के उसे पूरा करना पंचायती राज में संभव ही नहीं है. पंचायत प्रतिनिधि ही नहीं बल्कि शहरों में चलने वाले निगमों के वार्ड पार्षद, मेयर और डिप्टी मेयर का भी यही हाल है. अब सवाल ये उठता है कि क्या राज्य में जनप्रतिनिधियों के रूप में सिर्फ विधायक को ही देखा जाता है. मेयर, वार्ड सदस्य, नगर परिषद सदस्य, जिला परिषद सदस्य, मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, वार्ड सदस्य जिन्हें भी जनता चुनती है. उन्हें, क्या सरकार जनप्रतिनिधि नहीं मानती है. ऐसा कहीं इसलिए तो नहीं कि सरकार बनाने या बचाने में इनकी कहीं कोई भूमिका नहीं होती.

किसका कितना है मानदेय

नगर निगमः

मेयर- 10,000

डिप्टी मेयर- 9,000

वार्ड पार्षद- 7,500

नगर परिषदः

अध्यक्ष- 9,500

उपाध्यक्ष- 7,500

सदस्य- 6,000

जिला परिषदः

अध्यक्ष- 10,000

उपाध्यक्ष- 7,500

सदस्य- 1,500

पंचायतः

मुखिया-1,000

पंचायत समिति सदस्य- 750

वार्ड मेंबर- 200

पंचायत प्रतिनिधिनियों का हालत सबसे खास्ता

झारखंड में पंचायत प्रतिनिधियों की हालत सबसे खराब है. एक तो उन्हें ना के बारबर मानदेय सरकार की तरफ से स्विकृत है. लेकिन वो भी समय पर कभी नहीं मिलता. 2011 के बाद दो बार पंचायत स्तर का चुनाव हो चुका है. लेकिन पहले कार्यकाल का भी मानदेय पंचायत प्रतिनिधियों को नहीं मिला है. पहले कार्यकाल का करीब दो साल का वेतन अभी तक सरकार नहीं दे पायी है.

इस बार से मिलना शुरू हुआ है जिप सदस्यों को मानदेय

जिप सदस्यों को इससे पहले के कार्यकाल में किसी तरह का कोई मानदेय मिलता ही नहीं था. काफी हो-हंगामे के बाद इस कार्यकाल से जिप सदस्यों को मानदेय मिलना शुरू हुआ है. वो भी समय पर कभी भुगतान नहीं होता है. जिप सदस्यों को सिर्फ 1500 रुपए का भुगतान होता है.

नगर निगम और नगर परिषद सदस्यों का भी बुरा हाल

नगर निगम और नगर परिषद का हाल भी पंचायत प्रतिनिधियों जैसा ही है. वेतन के नाम पर इन्हें इतना ही मिल पाता है जितना में ये अपना कागजी काम पूरा कर सकें. ऐसा कोई नगर पार्षद और मेयर नहीं है जिनके पास आमदनी का दूसरा जरिया ना हो. शहरों में मेयर, डिप्टी मेयर और पार्षद का पद सिर्फ सिंबल स्टेटस बन कर रह गया है.

बिहार में झारखंड से बेहतर है व्यवस्था

अपने पड़ोसी राज्य बिहार की बात करें तो वहां की पंचायती राज व्यवस्था झारखंड से काफी बेहतर है. मुखिया के अधिकार से लेकर वेतनमान तक सबकुछ झारखंड से बेहतर है. ऐसे में बिहार की तुलना झारखंड से करना बेमानी है. बिहार में जिला परिषद अध्यक्षको  12000, उपाध्यक्ष को 10000, प्रमुख को  10000, उप-प्रमुख को 5000, मुखिया को 2500, उप मुखिया को 1200, सरपंच को 2500, उप सरपंच को 1200, जिला परिषद सदस्य को 2500, पंचायत समिति सदस्य को 1000, वार्ड सदस्य को 500 और पंच को 500 रुपए प्रतिमाह. इसके अलावा पंचायती राज प्रतिनिधियों के पदासीन रहते हुए मौत होने पर परिजनों को मुआवजा के रूप में पांच लाख सरकारी मदद का प्रावधान है.

आखिर कैसे सरकार केरल की तरह ग्राम पंचायत की उम्मीद करती है

पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद से ही सरकार हमेशा पंचायत प्रतिनिधियों को यह पाठ पढ़ाते रही है कि झारखंड की पंचायती व्यवस्था केरल की तरह होनी चाहिए. जबकि सुविधाओं की बात की जाए तो केरल के सामने झारखंड कहीं भी नहीं ठहरता. 2015 में झारखंड सरकार ने राज्य के छह जिला परिषद अध्यक्ष, पंचायत समितियों के प्रमुख और पांच मुखिया का एक दल यूनिसेफ और पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के साथ केरल भ्रमण पर भेजा था. दल ने ग्राम पंचायत, जिला पंचायत कार्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूलों का भ्रमण करने के साथ-साथ ग्रामीण और सहायता समूहों के सदस्यों से बातचीत भी की. बस इतने भर करने से सरकार मान बैठी की अब झारखंड में पंचायती व्यव्सथा केरल की तरह हो जाएगी. लेकिन ऐसा होना संभव ही नहीं है. यह बात दोनों राज्य के पंचायती और नगरीय जनप्रतिनिधियों के वेतनमान को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है. केरल में जिला परिषद अध्यक्ष को 15,800, उपाध्यक्ष को 13,200, प्रमुख को 9,400, जिप सदस्यों को 8,800, ब्लॉक लेवल पर प्रमुख को 14,600, उपप्रमुख को 12000, स्थायी समिति के अध्यक्ष को 8,800 और बाकी पंचायत सदस्यों को 7,600 का मानदेय मिलता है. वो भी हर महीने समय पर.

क्या कहते हैं पंचायत और निगम प्रतिनिधि

अजय सिंह (बोकारो मुखिया संघ अध्यक्ष)

पंचायत की पूरी जनता को मुखिया से उम्मीद रहती है. लेकिन, सरकार कभी यह नहीं सोचती कि आखिर एक मुखिया गरीबों का भला कैसे करेगा. 1000 मानदेय मुखिया का शायद ही किसी राज्य में होगा. सराकर पंचायत प्रतिनिधियों को जिस तरह से दरकिनार कर रही है. वो दिन देर नहीं है कि पंचायत प्रतिनिधि सड़क पर उतरेंगे.

धनंजय सिंह (मुखिया, स्वांग दक्षिणी, बोकारो)

महीने में तीन-चार बार हमें जिला मुख्यालय बुलाया जाता है. सरकार यह नहीं सोचती कि आखिर पंचायत प्रतिनिधि जाएंगे कैसे. मानदेय के नाम पर मिलने वाली राशि इतनी कम है कि उससे कुछ नहीं हो सकता. और ऊपर से हमें कमीशनखोर और ना जाने क्या-क्या बोला जाता है.

प्रमिला मेहरा (जिला परिषद सदस्य, गिरिडीह)

पिछली बार तो किसी तरह के कोई मानदेय का प्रावधान ही नहीं था. इस बार से मात्र 1500 रुपए जिला परिषद सदस्यों को दिए जा रहे हैं. 1500 रुपए में आखिर आज के दिन में क्या होता है. हम जल्द ही राज्य स्तर पर आंदोलन करने की रणनीति बना रहे हैं. क्या सरकार सिर्फ विधायकों को जनप्रतिनिधि मानती है.

कृष्ण कुमार (जिला परिषद, उपाध्यक्ष, फुसरो)

पंचायत प्रतिनिधियों जैसे ही हालात हमारे हैं. कहने को परिषद सदस्यों को 6000 रुपए मिलते हैं. अभी 14 महीने से यह राशि बाकी है. सरकार के रवैये से तो ऐसा लगता है कि विकास का ठेका सिर्फ विधायक ही लेकर बैठे हैं. क्या हम अपने क्षेत्र में कुछ कर ही नहीं रहे हैं.

 

 

        

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