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झामुमो, आजसू, राजद जैसी पार्टियां कांग्रेस-भाजपा की पिछलग्गू हैं! : बाबूलाल मरांडी

रांचीः लोकसभा चुनाव सर पर है। जाहिर है हर दल तैयारियों में जुटा है साथ ही साथ जुबानी जंग भी जारी है। झाविमो (झारखंड विकास मोर्चा) भी पीछे नहीं। झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी कहते हैं, कांग्रेस बीजेपी की नीतियां एक ही है। वे झारखंड में मोहरों के जरिये सरकार चलाती हैं और अपनी झोली भरती हैं। मरांडी की नजर में झामुमो, आजसू, राजद जैसी स्थानीय पार्टियां उन दोनों राष्ट्रीय दलों की पिछलग्गू मात्र हैं। झारखंड की आवाज कोई बन सकता है तो बस उनकी पार्टी झाविमो। बाबूलाल न्यूज विंग से खास बातचीत में बोल रहे थे। आजसू के साथ उनकी पार्टी की बढ़ती (?) नजदीकियों के सवाल पर वह खुलकर कुछ बोले। जबकि, झारखंड की हेमन्त सरकार को खूब कोसा। राज्यसभा चुनावों के दौरान गड़बड़ियों पर उन्होंने दुहराया कि ईमानदारी से जांच हो जाए तो डेढ़ दर्जन विधायक जेल चले जाएंगे। मरांडी ने 2014 के हालिया राज्यसभा चुनाव में भी लेन देन का आरोप लगाया।

आनेवाले चुनाव में बीजेपी के दावे को मरांडी खोखला बताते हुए कहते हैं, बीजेपी के हुंकार में कोई दम नहीं, अगर ऐसा होता तो छोटे छोटे दलों को जोड़ने के लिये वह पसीना क्यों बहाती! पढ़िये झाविमो सुप्रीमो बाबुलाल मरांडी से न्यूज विंग संपादक किसलय की खास बातचीतः

अभी अभी 11 दलों का एक तीसरा मोर्चा बना है। आपकी पार्टी भी उसमें शामिल है। क्या चल रहा है इस तीसरे मोर्चे को लेकर?
तीसरे मोर्चे की कोशिश हो रही है कि गैरकांग्रेस गैरबीजेपी वोटों का बिखराव न हो।

और यह बिहार में, इतनी राजनीतिक उथल पुथल का क्या कारण मानते हैं आप?
बिहार की राजनीति में सबकुछ ठीक ठाक चल रहा है, ऐसा नहीं है। पिछले दिनों जितनी बड़ी तादाद में राजद के विधायक टूटे और विधानसभा में अलग से बैठने की व्यवस्था के लिए स्पीकर को लिखा, इसी से पता चल रहा है कि उनमें भी कहीं न कहीं.. ठीक ठाक नहीं चल रहा है.. यह अलग विषय है कि उनमें से नौ विधायक वापस राजद में लौट गए, चार वहीं हैं.. बावजूद इसके इससे यह तो समझ में आता है कि वहां (राजद में) ठीक ठाक नहीं है। लोग अपना भविष्य सुनिश्‍चित करने की सोच रहे हैं। अभी लोकसभा चुनाव सामने, फिर विधानसभा चुनाव भी आयेगा।

बीजेपी जितना चाहे हुंकार भरे, अंदर से डरी सहमी हुई है

और यह, रामविलास पासवान का एनडीए में जाना..?
रामविलास जी के बारे में अखबारों में जो कुछ मैंने पढ़ा उससे एक बात जो मेरी समझ में आ रही है.. पिछले दिनों कई सर्वेक्षणों में दिखाया गया कि एनडीए को बहुत सारी सीटें मिल रही हैं.. बिहार, उत्तरप्रदेश या झारखंड में.. एक सर्वे में तो बताया गया कि झारखंड में बीजेपी को 11 सीटें मिल रही हैं!.. लेकिन, बिहार में बीजेपी ने जो छोटे छोटे ग्रूप को जोड़ने की कवायद शुरू की है इससे लगता है कि असलियत कुछ और है! वरना, रामविलास पासवान.. तो कोई कुशवाहा.. उधर यूपी में उदित राज, महाराष्ट्र में अठवाले को राज्यसभा भेजा और गठबंधन का हिस्सा बना लिया.. ये सब छोटे छोटे ग्रूप हैं.. इसी से लगता है, कि बीजेपी जिस तरह से हुंकार भर रही है कि ‘हम इतनी सीटें लाएंगे, गवर्नमेंट बना लेंगे..‘ ..लेकिन वास्तविकता यह है कि वे अंदर से डरे सहमे हुए हैं।

बीजेपी हो या कांग्रेस, सत्ता के लिए सारी सीमाएं तोड़ रही हैं दोनों

लेकिन, रामविलास का एनडीए में अचानक जाना.. क्या, उनपर सीबीआई जांच शुरू हुई, यह कारण है?
देखिये, कांग्रेस और बीजेपी में कोई अंतर नहीं है.. जब रामविलास यूपीए में स्टील मिनिस्टर हुआ करते थे तो उन्होंने बहाली में.. जिस प्रकार से घपला हुए, हमलोगों ने उसी समय डिमान्ड किया था कि इसकी सीबीआई जांच हो। लेकिन उस समय कांग्रेस ने जांच नहीं करायी। अब जब जांच हो रही है तो सबकुछ पता चल रहा है। आपने देखा होगा कि यहां के पूर्व गवर्नर (सिब्ते रजी) का बेटा.. एक पूर्व जस्टिस का रिश्तेदार.. और भी.. जांच अभी चल रही है.. लेकिन, अब बीजेपी कह रही है कि उनको (रामविलास को) फंसाया जा रहा है। मेरे कहना है कि जब कांग्रेस के पास थे तो रामविलास उनके लिए ठीक थे, उस समय बीजेपी के लिए बुरे थे। आज जब रामविलास बीजेपी की ओर हो गए तो कांग्रेस की इस जांच को गलत बता रही है बीजेपी!.. लेकिन, कुल मिलाकर देखिये कि गड़बड़ी तो है.. और दोनों ही पार्टियां (कांग्रेस व बीजेपी) सत्ता तक पहुंचने के लिए कोई भी सीमी रेखा को तोड़ दे रही हैं।

क्या जेवीएम और आजसू नजदीक आ रहे हैं?

इधर झारखंड में भी तो राजनीतिक फेर बदल दिख रहा है.. आपकी ही पार्टी के बारे में कहा जा रहा है कि ‘जेवीएम’ और आजसू के बीच कुछ नया जोड़ तोड़ शुरू हुआ है, खासकर, अभी जो विशेष राज्य के दर्जे के लिए बंद का आव्हान हुआ, उस दौरान.. क्या कहेंगे आप?
नहीं.. आपने देखा होगा कि झारखंड विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर 02 तरीख (मार्च 2014) को हमलोगों ने ‘बंद’ का कॉल किया है। आजसू भी विशेष राज्य के लिये आंदोलन कर रही है। ..तो, हमने अपने प्रदीप जी (झाविमो महासचिव डा प्रदीप यादव) से कहा कि ‘वे लोग’ (आजसू) भी कुछ न कुछ कार्यक्रम कर रहे होंगे.. एक दल एक दिन, दूसरा दल दूसरे दिन बंद का कॉल करेगा, एक ही इश्यु को लेकर, तो पब्लिक को बहुत परेशानी होगी। मैंने प्रदीप जी से कहा कि एक बार उनसे बात करके तिथि फायनल कीजिए कि बंद एक ही दिन हो। मुझे लगता है दोनों ने कहीं न कहीं संवाद किया होगा और एक तिथि तय हुई। देखिये इश्यु एक ही है, और मैं नहीं चाहता कि एक इश्यु को लेकर.. धरना प्रदर्शन तक तो चल जाता है, लेकिन ‘बंदी’ जैसे कार्यक्रम एक ही दिन हो तो अच्छा है.. और संयोग से उधर बिहार में भी इसी मुद्दे पर दो तारीख को बंद का आव्हान किया गया है। ..और बिहार से झारखंड आना जाना भी तो लोगों का लगा ही रहता है। हमें लगता है कि इसलिए एक ही दिन, दो तारीख को बंद बुलाया तीनों ने।

क्या इससे आगे की भी कोई संभावना (आजसू से नजदीकी की) दिख रही?
अभी तो इतनी ही बात हुई है उनसे।

थोड़ा और स्पष्ट कीजिए.. क्या आजसू के साथ आपकी पार्टी आगे भी कोई संभावना देख रही है?
नहीं.. मैंने कहा अबतक जो बात हुई है.. वैसे, मैं बार बार कह रहा हूं कि हमारी पार्टी झारखंड में सभी चौदह सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.. तो उससे अतिरिक्त.. कोई विकल्प (थोड़ा ठहरकर).. उससे बाद तो कुछ बचता ही नहीं है।

केवल ‘कमाई’ के लिए चलायी जा रही है हेमन्त सरकार

हेमन्त सरकार कैसी चल रही है?
मुख्यमंत्री हेमन्त खुद ही कह रहे हैं.. ‘सरकार लंगड़ी है.. सरकार लुल्ही है’। वे खुद ही कह रहे हैं कि कोई काम नहीं करता है, कोई किसी की बात नहीं सुनता है!.. इसीपर मेरा कहना है कि कोई सरकार लंगड़ी लुल्ही है, कोई किसी की सुनता नहीं, फिर ऐसी सरकार चलाने का कोई मतलब नहीं!.. इसके बाद भी सरकार चला रहे हैं तो मैं यही कहूंगा कि काम करने के लिए नहीं, बल्कि कमाने के लिए सरकार को चला रहे हैं। ..ऐसी हालत में तो मुख्यमंत्री को कुर्सी छोड़ देनी चाहिए और उन्हें अपनी खेती बारी में लग जाना चाहिए।

कांग्रेस बीजेपी को तो बस इस राज्य में मोहरा चाहिए!

अभी चंद रोज पहले विपक्षी दलों ने कहा कि कांग्रेस जिस तरह मधु कोड़ा को मोहरा बनाकर शासन करती रही उसी तरह हेमन्त सोरेन को भी.. आप किस नजरिये से देखते हैं इस बयान को?
देखिये, मैं बार बार कहा करता हूं कि दिल्ली में कांगे्रस और बीजेपी, दोनों पार्टियों ने गुप्त समझौता किया हुआ है। दोनों की नीतियां एक ही हैं। चूंकि दोनों को पता है कि झारखंड में उनको कभी बहुमत नहीं मिल सकता, इसलिए किसी न किसी दल के साथ मिलकर सरकार बनाती हैं, किसी न किसी स्थानीय को मुख्यमंत्री बना देती हैं। इसलिए, कभी बीजेपी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाती है, कभी शिबु सोरेन को। कभी कांग्रेस पार्टी शिबु सोरेन को बनाती है, कभी मधु कोड़ा को, कभी हेमन्त सोरेन को बनाती है। बीजेपी और कांग्रेस पार्टी का मकसद इतना ही है कि इस राज्य में सरकार बनाकर यहां के खनिज, खदान और संसाधनों को पैसे लेकर बांट देना। यहां से निकाल ले जाना। इसका ताजा उदाहरण यह है कि यहां जितने कोल ब्लॉक थे, सभी को आबंटित कर दिया गया। चाहे वह मुंडा की सरकार रही हो, चाहे मधु कोड़ा की, चाहे शिबु सोरेन की.. और जो बचा खुचा था, नदी का बालू, उसे भी हेमन्त सोरेन बांट रहे हैं, मुंबई दिल्ली की कंपनियों को बेच रहे हैं। मेरे कहने का मतलब है कि कांग्रेस और बीजेपी को इस राज्य में मोहरा चाहिए। किसी के कंधे पर बंदूक रखकर.. यहां के खनिज खदान, सब बेच डालो! ..और आश्‍चर्य होता है कि ‘ये लोग’ भी उनके शिकार हो जाते हैं।

जांच ईमानदारी से हुई तो डेढ़ दर्जन विधायक होटवार जेल जाएंगे!

अनजाने में शिकार होते हैं?
नहीं नहीं, इनको भी हिस्सा तो मिलता ही है.. और इन्हें लगता है कि ‘वे लोग’ (कांग्रेसˆबीजेपी) उन्हें बचा लेंगे। पिछले दिनों, 2012 के राज्यसभा चुनावों में क्या किया इन लोगों ने! आज भी मेरी मांग है कि 2012 के उस राज्यसभा चुनाव में जो नतीजा आया.. किस किस पार्टी के विधायकों ने किसको वोट डाला, उसकी सूची जारी की जाये। ..अगर पवन धूत को वोट डाला.. धूत तो कोई पॉलिटिशियन नहीं है, झारखंड का नहीं है.. इसी से पता चल जाएगा कि क्यों उसको वोट दिया विधायकों ने। आर के अग्रवाल को वोट डाला.. वो भी किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं है। तो जिन लोगों ने वोट डाला.. चाहे पवन धूत को या फिर आर के अग्रवाल को वोट डाला हो, तो सीधी सी बात है कि पैसा लेकर वोट डाला! ..और उसी का नतीजा हुआ कि अब सीता सोरेन जेल गई.. और ईमानदारी से जांच हो जाए तो और डेढ़ दर्जन विधायक ‘होटवार’ (रांची सेंट्रल जेल) जेल जाएंगे।

लेकिन हद तो देखिये, 2014 के चुनाव में भी.. झारखंड की आबादी है 3 करोड़ 29 लाख.. इसमें से इन पार्टियों को दो ऐसा व्यक्ति नहीं मिला.. बीजेपी आजसू ने गुजरात से उम्मीदवार लाकर राज्यसभा भेज दिया, वह भी किसी पॉलिटिकल पार्टी के सदस्य नहीं हैं। मैं मान लेता, अगर यह होता कि ‘वे’ कोई बीजेपी के तपेˆतपाये लीडर हैं! ..तो चलो भाई, कहीं और जगह से नहीं भेजकर यहां से भेजा, आजसू ने उसका साथ दिया।

झामुमो, आजसू, राजद जैसी पार्टियां कांग्रेस भाजपा की पिछलग्गू, झाविमो ही झारखंड की आवाज बन सकता है!

आप शायद बात कर रहे हैं परिमल नथवाणी के बारे में.. लेकिन उनके बारे में तो यह कहा जाता है कि उन्होंने अपने पिछले सांसद काल में झारखंड में काफी काम किया, इसी को देखते हुए भाजपा आजसू ने उनका समर्थन किया। इसमें क्या गलत है?
काम अच्छा किया या नहीं किया.. उनकी जगह कोई भी रहता तो काम करता। लेकिन मेरा यह कहना है कि दूसरे ने जो भेजा.. कांग्रेस जेएमएम ने मिलकर हरियाणा से उम्मीदवार लाकर यहां से राज्यसभा में भेज दिया। आप ही बताइये क्या हो रहा है इस राज्य में?!.. कोई हमें कहे कि यूं ही भेज दिया इन लोगों को, पैसा नहीं लिया इनसे, यह मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता है! ..यहां कांग्रेस में बहुत सारे लीडर पड़े थे.. जेएमएम में ही रोज हंगामा हो रहा था.. किसी को भेज सकते थे। बीजेपी में यहां बहुत सारे लीडर थे.. लेकिन बीजेपीवाले तो चुप ही रह गए, विरोध में कोई कुछ बोला तक नहीं। इसलिए मैं लोगों से कहा करता हूं, भाई, 2014 का जो लोकसभा चुनाव है.. झारखंड की जनता से मैं यही उम्मीद करता हूं कि इस चुनाव में सभी 14 सीट पर हमें जिताओ, ताकि दिल्ली में हमलोग झारखंड की आवाज बन सकें। बीजेपी आवाज नहीं बन सकती है, कांग्रेस आवाज नहीं बन सकती है। जेएमएम, आजसू, राजद जैसी पार्टियां बीजेपी कांग्रेस की पिछलग्गु ही बनी रहेंगी। अभी हमने कहा न.. राज्यसभा चुनाव के दौरान बीजेपी में एक भी विरोध का स्वर नहीं उभरा, तो जिनकी जुबान ऐसे वक्त पर जुबान बंद हो जाए, इतना डर हो, तो उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं वे झारखंड का भविष्य सुधार पायेंगे!

 

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