Uncategorized

“चोटी” के पीछे “चोर” या पुरुषवादी “चाल” ?

नीतू कुमारी, पत्रकार:- उत्तर प्रदेश के आगरा में 65 साल की एक दलित महिला मान देवी की सरेआम पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। मामला ज़मीन-ज़ायदाद के विवाद या पारिवारिक झगड़े का नहीं था. मामला जातिगत लड़ाई या वर्ग-संघर्ष का भी नहीं था. हत्यारों को लगा कि मान देवी वही चुड़ैल है जो आधी रात में आती है और महिलाओं की चोटी काट कर गायब हो जाती है, इसलिए उसे लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार डाला. अगर आप इस घटना को हिंदी भाषी राज्यों में सदियों से व्याप्त डायन या चुड़ैल कांड जैसी अंध-विश्वासी मान्यताओं से जोड़कर अपनी आंखें मूंद लेना चाहते हैं या फिर हमारी सनातनी परंपरा में घुल-मिल गए कुछ अपवाद स्वरूप विडंबनाओं का हवाला देकर बच निकलना चाहते हैं, तो कृपया यह भूल न करें. क्योंकि इस बार का मामला हमारी आपकी तमाम समझदारियों से अलग अपनी मौलिक चुनौतियां लेकर हमारे सामने हाज़िर है. पूरा मामला समझने के लिए थोड़ा सब्र करें और बारी-बारी से हाल की इन घटनाओं पर सरसरी नज़र डालते जाइए.


दो दिन में 30 महिलाअों की चोटी काटी

पिछले दो दिनों में सिर्फ उत्तर भारत में ही पांच किशोरियों समेत कम से कम 30 महिलाओं की चोटी यानी बाल काटने का मामला सामने आ चुका है. इनमें उत्तर प्रदेश के 17, हरियाणा के 11 और दिल्ली के दो मामले शामिल हैं. राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में अब तक 75 से भी ज्यादा महिलाओं या किशोरियों की चोटी काटे जाने की घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं. इनमें 41 घटनाओं के साथ हरियाणा टॉप पर है. ध्यान दीजिएगा, सेक्स रेशियो के मामले में भी हरियाणा देश के फिसड्डी राज्यों में सबसे टॉप पर है, पर महिलाओं के बाल काटकर उन्हें ज़लील करने या हतोत्साहित करने के इस “स्वत: स्फूर्त” अभियान में देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश और सबसे बड़े रजवाड़ों के राज्य राजस्थान का योगदान सबसे ज्यादा है. चोटी काटने की घटनाएं सबसे पहले राजस्थान के बीकानेर जिले के नोखा और बेदू कला ऊनावड़ा में सामने आई थीं. राजस्थान के बाद हरियाणा के फतेहाबाद से चोटी कटने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो पलवल, मेवात और फरीदाबाद होते हुए गुरुग्राम (गुड़गांव) तक पहुंच गया. उसके बाद यूपी के मथुरा, आगरा और गाजियाबाद में भी चोटी कटने की कई घटनाएं सामने आईं. अब तो दिल्ली के कांगनहेड़ी, पालम और रणहौला गांव में भी चोटी-कटवा का आतंक छाया हुआ है.


कौन है यह चोटी कटवा ?

अब सवाल यह है कि कौन है यह चोटी कटवा ? किशोरियों और महिलाओं के बाल काटने के पीछे की साजिश और मंशा क्या है ? क्या यह महिलाओं के खिलाफ रातों-रात पैदा हो गया कोई नया स्त्री-विरोधी सामाजिक दुश्मन है. या फिर कोई ऐसा फितूर जो जान-बूझकर सिर्फ महिलाओं को निशाना बना रहा है? समाज और सामाजिक लोगों का मनोविज्ञान समझने का दावा करने वाले कहते हैं : यह सिर्फ एक किस्म का मनोविकार है, जो अकेली, गरीब और वंचित महिलाओं के मामलों में ज्यादा देखने को मिल रहा है. कम से कम हमारी मीडिया, हमारे बुद्धिजीवियों और महिला अधिकारों के हिमायतियों का तो यही मानना है कि इस तरह की तमाम घटनाएं सिवा मनोविकार और मनोवांछित भ्रांतियों के और कुछ भी नहीं. तो फिर सवाल और बड़ा हो जाता है कि आखिर ऐसी मनोरोग से जुड़ी घटनाओं की तह तक पहुंचने के बजाए हम और हमारी मीडिया ऐसी खबरों को राष्ट्रीय आपदा की तरह क्यों ले रहे हैं? आखिर हमारा प्रबुद्ध समाज क्यों नहीं ऐसी खबरों को खारिज कर महिलाओं के असल मुद्दों को चिन्हित कर रहा है? क्या ये भी एक स्वत:स्फूर्त प्रक्रिया है या फिर कोई पूर्व नियोजित साजिश? और अगर यह साजिश है तो इसका सूत्रधार कौन है और उसके निहित स्वार्थ क्या हैं?


महिलाओं का स्वतंत्र अस्तित्व ही गंवारा नहीं

अब मुद्दे पर आते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की आधी आबादी आज भी डर के साये में जीती है. घर हो, बाजार हो या फिर ऑफिस हर जगह उसे घूरती निगाहों का सामना करना पड़ता है. बाहर मनचलों की आफत और घर में मर्दों से शामत. फिर चाहे वो पति हो, भाई हो, कोई प्रेमी या दोस्त. रंग, रूप, चेहरे और रिश्तों में अलग-अलग होते हुए भी आम तौर पर महिलाओं के साथ इनका सलूक आज भी करीब-करीब एक सा ही है. कोई परंपरा के नाम पर ज्यादती करता है तो कोई जन्म सिद्ध अधिकारों का हवाला देकर. कोई पिता के रूप में पुरुष बन जाता है तो कोई पति, भाई या बेटे के रूप में. कुल मिलाकर करीब करीब पूरा मर्दाना समाज कभी याचक तो कभी मालिक बनकर स्त्री-धन पर अपना अधिकार सिद्ध करने की मानसिकता से ग्रसित नजर आता है, और इन तमाम रिश्तों से परे जिन्हें महिलाओं का स्वतंत्र अस्तित्व ही गवारा नहीं उनकी कुंठा और विकार कुछ इस तरह बाहर निकल रही है.


हर जगह दाग ही दाग है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में रोजाना सिर्फ बलात्कार के ही करीब 50 से भी ज्यादा मामले थानों में दर्ज होते हैं. यानी देवियों के देश भारत में हर घंटे दो महिलाओं का मान-सम्मान कुचल दिया जाता है. कहने का मतलब यह कि जब तक आप ये लेख पढ़कर इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति या विरोध जाहिर करें तब तक कई मजलूम ऐसे मर्दों का कलंक अपने सिर धारण कर चुकी होंगी. जिनका मेरे, आपके या हम में से किसी न किसी से कोई न कोई रिश्ता जरूर होगा. हालांकि यह आंकड़े भी पूरी सच्चाई बयां नहीं करते. बहुत सारे मामलों में तो रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती है या पीड़ित महिला समाज के भय से अपने ऊपर हुए अत्याचार के खिलाफ लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती हैं. ज्ञानी लोग कहते हैं इन सारे अपराधों की जड़ में अशिक्षा और गरीबी है. तो फिर इन आंकड़ों पर नजर डालिए. साल 2007 से 2011 तक बलात्कार के मामलों में देश की प्रबुद्ध राजधानी दिल्ली ने किसी को आगे नहीं निकलने दिया. यहां तक कि मायानगरी मुंबई की काया भी दिल्ली के दागदार दामन के आगे पनाह मांगती नजर आई. मुंबई के मुकाबले दिल्ली में बलात्कार के करीब तीन गुना ज्यादा मामले दर्ज हुए. निर्भया गैंग रेप मामले के बाद पूरा जब करीब-करीब पूरा देश महिलाओं के हक में सड़क पर उतर आया था. तब भी साल 2014 में बलात्कार के 2096 मामले पता नहीं कब और कैसे दर्ज हो गए.


कैसे सुनिश्चित हो महिलाअों की सुरक्षा

फिर कैसे सुनिश्चित हो महिलाओं की सुरक्षा? हाल ही में महिला सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए केंद्र ने शी-बॉक्स ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है. लेकिन वहां सिर्फ केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली महिला कर्मचारी ही शिकायत दर्ज करा सकती है. जबकि प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं की तादाद भी ज्यादा है और उनकी सुरक्षा की चिंता भी. वैसे केंद्र सरकार में करीब 30.87 लाख कर्मचारी हैं. जिनमें सिर्फ 10.93 फीसदी महिलाएं हैं. यानी 10 लाख से कुछ ज्यादा. अभी यह पोर्टल इन्हीं कर्मचारियों के लिए हैं. लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जाएगा. महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि शुरू में शी-बॉक्स केंद्र सरकार की कर्मचारियों के लिए है. जिसके बाद इसका विस्तार किया जाएगा. और इसमें प्राइवेट सेक्टर को भी शामिल किया जाएगा.


सिर्फ कानून बनाने से क्या होगा

अगर महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ कानून बना देने से ही सुनिश्चित हो जाती तो भारत अब तक महिलाओ के लिए दुनिया का सबसे पसंदीदा देश बन चुका होता, पर ऐसा नहीं है. सरकार ने महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए वीमेन फ्रेंडली कई कानून तो बना दिए, लेकिन इसे सही तरीके से लागू नहीं किया गया. यौन उत्पीड़न के प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रीड्रेसल एक्ट 2013 का अभी तक ठीक से पालन नहीं हो रहा है. देश में महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर करीब दर्जन भर से भी ज्यादा कानून लागू हैं. इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 इत्यादि प्रमुख हैं.


ना समाज का डर न कानून का खौफ

कानून अपनी जगह है और समाज अपनी जगह. चाल, चरित्र और चेहरे के लिए किसी को किसी की मुहर की जरूरत नहीं. इस बाबत देश के चीफ जस्टिस जे एस कोचर का हालिया बयान ध्यान देने योग्य है, उन्होंने कहा है- “अब कानून तोड़ना और न्यायालय की अवमानना करना हमारी संस्कृति में शामिल होता जा रहा है, साथ ही यह हमारे खून में आ गया है”. यानी समाज का डर तो पहले से नहीं है और अब कानून के खौफ की भी परवाह नहीं. जाहिर है ऐसे में अपराध और अपराधियों का हौसला और बढ़ेगा जिसका शिकार होगा कोई कमजोर, गरीब, दलित या कोई महिला. महिलाओं की त्रासदी इसलिए बड़ी है क्योंकि वो कमजोर, गरीब, दलित सभी वर्गों का हिस्सा है. ऐसे में हर तरह की हिंसा और ज्यादती में वो सबसे आसान शिकार साबित होती है. वरना क्या वजह है कि जिसकी चोटी कटी वो भी महिला और जो इस इल्जाम में मार दी गई वो भी महिला. सवाल है कि क्या हम चोटी कटवा जैसे काल्पनिक मनोरोगी का मुद्दा उछालकर स्त्री-विमर्श से जुड़े बुनियादी और बेहद जरूरी मसलों की जान-बूझकर या अनजाने में अनदेखी कर रहे हैं? जिस समाज में हर दूसरे मिनट कोई न कोई लड़की या महिला किसी न जुर्म या ज्यादती का शिकार होती है, वहां ऐसी मनगढ़ंत या मनोवैज्ञानिक घटनाओं को प्रमुखता देना क्या महिला जनमानस का अपमान नहीं? धर्म के नाम पर फैलते भीड़ के उन्माद को तो मॉब लिन्चिंग कहकर निकल जाएंगे पर अंधविश्वास की आड़ में फलते-फूलते इस सामाजिक विकार को क्या नाम देंगे?

नोट :- ये लेखक के निजी विचार हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button