रणजीत, न्यूजविंग
रांचीः झारखंड उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों के स्थानान्तरण के उपलक्ष्य में आयोजित होनेवाले काॅकटेल पार्टी के लिए छपे कार्ड में अशोक स्तम्भ के इस्तेमाल से शुरू हुआ विवाद सुलझता नहीं दिख रहा है। इसे राष्ट्र का अपमान और ‘राष्ट्रीय इम्बलम एक्ट‘ का उल्लंघन बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे चुके वरीय अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने इस मामले को आगे ले जाने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय प्रतीक का अनादर करने की घटना के बाद ही उन्होंने लड़ाई शुरू की है। हालांकि इस मसले पर सभी के अपने अपने तर्क हैं। विवाद महाधिवक्ता कार्यालय में नियुक्त किये गये तत्कालीन स्थायी सहालकार संख्या तीन अभय कुमार मिश्रा और महाधिवक्ता विनोद पोद्दार के बीच का है। संपर्क करने पर महाधिवक्ता ने इस विषय पर अधिकृत रूप से कुछ भी कहने में असमर्थता जतायी है। हालांकि आमंत्रण कार्ड के विवाद पर त्वरित कार्रवाई करते हुए नोटिस जारी कर पार्टी को स्थगित कर दिया गया था। पर बात वहीं खत्म नहीं हुई। अधिवक्ता ने न्यूज विंग से बात करते हुए कहा, ‘‘काॅकटेल डिनर का हिन्दी में शाब्दिक अर्थ होता है, मद्य पान के साथ रात्रि भोजन। इधर, हमारा संविधान कहता है कि देश में मद्यपान को रोकना है। बालीवुड हीरो हीरोईन भी इसका प्रचार नहीं कर सकते हैं। तब महाधिवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति इसे कैसे प्रचारित कर सकता है? वो कानून के सबसे बड़े पद पर बैठे हैं।‘‘ बहरहाल महाअधिवक्ता कार्यालय में तैनात एक उच्च पद पर तैनात अधिकारी ने बताया कि विवाद को तुल देने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि तत्कालीन स्थायी सलाहकार संख्या तीन अभय कुमार मिश्रा का कार्यकाल 31 दिसम्बर को समाप्त हो चुका था। उसके बाद सरकार ने उन्हें एक्सटेंशन नहीं दिया इसलिए उनके इस्तीफे का कोई मतलब नहीं रह जाता है। पर इस्तीफा दे चुके अभय मिश्रा का भी अपना तर्क है। उनका कहना है कि उनके पास इस पद पर तीन साल काम करने का अप्वाइन्टमेन्ट लेटर है जो उन्हें 2014 में दिया गया था। जिसके अनुसार वो अक्टूबर 2017 तक इस पद पर बने रह सकते थे। प्रमाण के तौर पर उन्होंने न्यूज विंग को इसकी कॉपी भी दिखायी और कहा कि वो चुप नहीं बैठेंगे।
पढि़ये इस मुद्दे पर अभय कुमार मिश्रा से हमारे वरीय संवाददाता रणजीत की हुई बातचीत के अंश:
अभय जी, इस मामले में आप विस्तार से बताना चाहेंगे कि आखिर से पूरा मसला क्या है?
देखिये, ये प्रचारित किया जा रहा है कि मेरा कार्यकाल समाप्त हो चुका था। ऐसी बात नहीं है। अगर मेरा कार्यकाल समाप्त हो गया होता तब इस्तीफा देने के बाद लोग मुझे ज्वाइन करने के लिए मनाने क्यों आते? कल ही उन लोगों ने मुझसे संपर्क किया। ऐसा क्यों कहते कि आप इतने मुखर रूप से विरोध क्यों कर रहे हैं? आपको बता दूं कि मैंने अभी लड़ाई शुरू की है। मैं पहले की सरकारों से भी भिड़ चुका हूं। विपक्ष के एक राजनीतिक दल से मेरी बात हुई है। उन्होंने विधानसभा में यह मामला उठाने का आश्वासन दिया है। मैं चुप बैठने वाला नहीं हूं। मैं तैयारी में लगा हूं। आगे देखिये क्या होता है! मैं न्याय के लिए लड़ूंगा। अशोक स्तम्भ का इस्तेमाल कैसे किया जाना है इसके लिए कानून बनाया गया है। उसी के तहत मुकदमा दायर किया जा सकता है। मैं आगे की कार्रवाई की तैयारी कर रहा हूं। आपको भी पता चल जायेगा। कुछ समय इन्तजार कीजिए!
आपका कहना है कि आपने अपने पद से इस्तीफा दिया है, लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि आपका कार्यकाल दिसम्बर 2015 में ही पूरा हो चुका था इसे बढ़ाया नहीं गया…?
देखिये, मेरे कार्यकाल को एक मुद्दा बनाया जा रहा है। इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति राष्ट्रीय प्रतीक का अनादर कर रहा है क्या उसकी चिन्ता हमें नहीं होनी चाहिए? मैं कहता हूं कि औरों को भी इसका विरोध करना चाहिए था। रही बात कि मेरा कार्यकाल समाप्त होने या नहीं होने की तो मैंने इसका जवाब भेज दिया है। ये देखिये (अपना अप्वाइन्टमेन्ट लेटर दिखाते हुए) मेरे पास तीन साल काम करने का अप्वाइन्टमेन्ट लेटर है। मेरा कार्यकाल अक्टूबर 2017 तक निर्धारित था। तीन साल पूरे नहीं हुए हैं। तब कार्यकाल समाप्त होने की बात समझ से परे है…! इससे पहले भी 2011 में तीन साल के लिए मेरी नियुक्ति की गयी थी। उस दौरान मेरे उत्कृष्ट काम को देखते हुए मुझे 2014 में फिर से नियुक्त किया गया। महाधिवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति इस तरह की बात कर रहे हैं तब आप समझ ही सकते हैं…! इसलिए मैं कह रहा हूं कि मेरे लिए ऐसी परिस्थिति में काम करना मुश्किल था। …घुटन महसूस कर रहा था…। मैं यह भी साफ करना चाहूंगा कि सरकार से मेरी कोई शिकायत नहीं है। पर मेरा मानना है कि सरकार में रहकर ज्यादा दिनों तक काम करने से आपकी क्षमता धीमा पड़ने लगती है। 14 फरवरी, 2015 को मैंने उनके हाथ में इस्तीफा सौंपा पर उन्होंने इसे लौटा दिया। तब 15 फरवरी को मैंने फैक्स से अपना इस्तीफा भेज दिया। इसके बाद 16 फरवरी को मुझे फाइल सौंपने सम्बन्धी चिट्ठी दी गयी। वो भी कनीय अधिकारी के माध्यम से। यह भी बड़ी हैरानी की बात है।
अब आपके दूसरे सवाल का जवाब भी दे दूं। …चलिये मान लिया कि कार्यकाल एक साल या दो साल में खत्म हो जाता है इस हिसाब से अक्टूबर 2015 के बाद ही मुझे अवधि विस्तार नहीं देना चाहिए था। फरवरी में यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी…? आपको यह भी बताउं कि महाधिवक्ता कार्यालय में दिसम्बर 2015 में छह लोगों का कार्यकाल पूरा हो चुका था। उन्हें एक महीने का विस्तार दिया गया है। पर मुझे ऐसी कोई चिट्ठी नहीं दी गयी। क्योंकि मेरी नियुक्ति तीन साल के लिए हुई थी। आप चाहे तो इस बारे में पता कर सकते हैं। असली मुद्दे से भटकाने के लिए ऐसी बात कही जा रही है। कानून सब के लिए बराबर होता है और इस मामले में भी होना चाहिए।
महाधिवक्ता कार्यालय के सूत्रों के अनुसार कुछ लाॅ आॅफिसर्स कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी वहां 15 सालों से काम कर रहे हैं। यहां एक बड़े अधिकारी हैं उनके सम्बन्ध में सरकार के माध्यम से लिखित रूप कहा गया है कि उनकी पुनर्नियुक्ति संभव नहीं है। लेकिन वो अब भी अपने पद ही हैं। वहीं कुछ लाॅ आॅफिसर्स दिसम्बर 2015 में कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद भी अपनी सेवा दे रहे हैं। कार्यालय सूत्रों ने इनके नाम भी उजागर किये हैं।
संक्षेप में बतायें कि ऐसी क्या बात हुई कि विवाद इतना बढ़ा और बात इस्तीफा देने तक पहुंच गयी?
देखिये, चार फरवरी को मेरे पास फेयरवेल पार्टी का निमंत्रण कार्ड आया। इसमें लिखा हुआ था कि साढ़े सात बजे रांची क्लब में फेयरवंल पार्टी होगी और इस पार्टी के आयोजक महाअधिवक्ता विनोद पोद्दार जी हैं। कार्ड में राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न अशोक स्तम्भ का भी छाप दिया गया। कार्ड के निचले हिस्से में छपा था ‘काॅकटेल डिनर‘। काॅकटेल डिनर का हिन्दी में शाब्दिक अर्थ होता है, मद्य पान के साथ रात्रि भोजन। एक तरफ हमारा संविधान कहता है कि मद्यपान को रोकना है। हीरो हीरोईन भी इसका प्रचार नहीं कर सकते हैं। महाधिवक्ता प्रचार कर रहे हैं! वो कानून के सबसे बड़े पद पर बैठे हैं। मैंने उनसे ये बात कही तो वो मुझपर गुस्सा हो गये। इसी दिन यह कार्ड सभी जगह बांटे जा रहे थे। मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा और आनन फानन में नोटिस जारी कर इस पार्टी को कैन्सिल करने की सूचना दी गयी। महाधिवक्ता यानी एजी का पद संवैधानिक होता है। संविधान के प्रावधान के अनुसार सरकार एक महाधिवक्ता नियुक्त करती है। वो उच्च न्यायालय में या पूरे राज्य सरकार का लीगल हेड भी है। जरूरत पड़ने पर कानून के मामले में महाधिवक्ता विधान सभा को भी ऐड्रेस कर सकते हैं। उन्हें कैबिनेट स्तर का दर्जा प्राप्त होता है। कानून मंत्री के सभी काम महाधिवक्ता ही करते हैं। विधि सचिव को भी अगर कुछ निर्णय लेना हो तो वो महाधिवक्ता से सलाह लेने के बाद ही कुछ निर्णय लेते हैं। और इस पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की चूक कर दे…! बहुत आश्चर्य होता है! ऐसी परिस्थिति में कैसे काम किया जा सकता है? उसपर भी देखिये कि एक अवर सचिव स्तर के अधिकारी संचिकाओं का प्रभार सौंपने के लिए चिट्ठी लिखते हैं। वो कैसे मुझे चिट्ठी लिख सकते हैं जबकि वो कंपिटेन्ट अथॉरिटी हैं ही नहीं? मेरी नियुक्ति कैबिनेट के एप्रुवल के बाद हुई है और मुझे जो एप्वाइन्टमेन्ट लेटर दिया गया है उसमें विधि विभाग के प्रधान सचिव का हस्ताक्षर है। जिस दिन मैंने अपना इस्तीफा सौंपा उस दिन तक एप्वाइन्टिग अथॉरिटी की ओर से मुझे कोई चिट्ठी नहीं मिली थी। तब एक अवर सचिव स्तर के अधिकारी मुझे ये चिट्ठी कैसे लिख सकते हैं? इसलिए मैं कह रहा हूं कि कानून सभी के लिए बराबर होना चाहिए।
उच्च न्यायायल में राज्य सरकार का पक्ष रखने के लिए बने पैनल में कितने अधिवक्ता काम कर रहे हैं? आप इस पैनल में काम कर चुके हैं कुछ अनुभव बताना चाहेंगे?
जी, बिल्कुल। सभी राज्यों के लिए इस पैनल के लिए अलग मापदंड तय किये गये हैं। लेकिन ऐसी परिपाटी रही है कि एडवोकेट जेनरल (एजी) का एक पद होता है। उनके मातहत बाकी लाॅ आफिसर्स काम करते हैं। इन अफसरों में एएजी, स्थायी सलाहकार के अलावा दूसरे आॅफिसर्स होते हैं। हमारे राज्य में जो पैनल है उसमें 28 या 30 लाॅयर्स हैं जो जरूरत से ज्यादा हैं। कुछ साल पहले उच्च न्यायालय में दायर की जानेवाली याचिकाओं की संख्या ज्यादा हुआ करती थी। अब संख्या घटी है। दो जजों के स्थानान्तरण के बाद न्यायाधीशों की संख्या भी कम हो गयी है। झारखंड उच्च न्यायालय के लिए जजों की संख्या 24 निर्धारित की गयी है। लेकिन हर समय वर्किंग स्ट्रेंथ होती है 10 या 12 की। वर्तमान में 14 जज थे जिनमें से दो का स्थानान्तरण हो गया है। नयी सरकार आने के बाद अधिवक्ताओं की संख्या भी बढ़ायी गयी है। कुल मिलाकर कहूं कि जब केस की संख्या घटी है तब अधिवक्ताओं की संख्या भी कम होनी चाहिए।
ऐसी चर्चा भी हो रही थी कि पैनल में भाजपा समर्थक अधिवक्ताओं की नियुक्ति की जायेगी? इसमें कितनी सच्चाई है?
ये बयान एक उच्च अधिकारी की है जो बहुत गलत है। मुख्यमंत्री ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है। वकील या किसी कर्मचारी की नियुक्ति दक्षता के आधार पर होती है न कि जात और पार्टी के आधार पर। कल अगर दूसरी पार्टी की सरकार बनती है तब क्या सभी अधिवक्ताओं को बदल दिया जायेगा? दूसरे राज्यों ऐसी परम्परा रही है कि जब महाधिवक्ता नियुक्त किये जाते हैं तब पैनल के सारे लोग रिजाइन कर देते हैं। अगले दिन फिर से उनकी नियुक्ति हो जाती है। सिर्फ महाधिवक्ता को छोड़कर। क्योंकि महाधिवक्ता पार्टी का ही व्यक्ति होता है। क्योंकि न्यायालय में वही सरकार का मुखिया होता है। आप उसे पार्टी का कह सकते हैं। लेकिन लाॅ आफिसर्स की नियुक्ति पार्टी लाइन पर नहीं कर सकते हैं। कोई दूसरी पार्टी के प्रति सहानुभूति रखे तब क्या आप उसको हटा देंगे?




