
Surendra Rawat
आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि उस्ताद बिस्मिला खान की शहनाई की तान है, जिसके लिए विशेष एलपी तैयार कराया गया था. एक समय था जब इस मंगल ध्वनि से ही पूरे देश की सुबह होती थी. भारत रत्न से सम्मानित किये जा चुके उस्ताद जी जीवन सादा और सरल रहा. एक बार उनकी एक शिष्या ने कहा कि उस्ताद जी, अब आपको तो भारतरत्न भी मिल चुका है और दुनियाभर के लोग आते रहते हैं आपसे मिलने के लिए. फिर भी आप फटी तहमद पहना करते हैं, अच्छा नहीं लगता. उस्ताद जी ने बड़े ही लाड़ से जबाब दिया, अरे बेटी! भारतरत्न इ लुंगिया को थोड़े ही न मिला है. लुंगिया का क्या है, आज फटी है, कल सिल जाएगी. दुआ करो कि कभी ये सुर किसी को फटी हुई ना मिले. इसी तरह का एक और वाक्या है जिसे बताते हुये मुझे गर्व महसुस होता है कि मैं उस देश में जन्म लिया हूं जहां उस्ताज जी जैसे लोग ने जन्म लिया है, एक बार एक अमेरिकन के बिस्मिल्लाह खान से अमेरिका में बस जाने के आग्रह किया. जिसपर उनका जवाब कि सुनिए हम वो आदमी हैं जो हिंदुस्तान से बाहर जाते हैं तब भी हमको हिंदुस्तान दिखाई देता है और जब हिंदुस्तान में रहते हुये मैं अगर मुंबई, कलकत्ता कही और प्रोग्राम में रहता हूं फिर भी मुझको बनारस और गंगा मैया ही दिखाई देती है.
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आइयें जानते हैं उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के जीवन के बारे में
भारतीय संगीत के इतिहास में यूं अनेकों नाम सुनहरे शब्दों में दर्ज हैं लेकिन चंद ही शख्सियतें ऐसी हैं जिनके सम्मान में सिर खुद-ब-खुद सजदा करता है. ऐसी ही एक शख्सियत का जन्म भोजपुर के डुमरांव (बिहार) में 21 मार्च साल 1916 को पिता पैगम्बर बख्श व मां मिट्ठन के यहां हुआ. नवजात का नाम रखा गया कमरूद्दीन. पर जैसे ही नवजात के दादा रसूल बख्श ने उन्हें देखा उनके होंठों से अनायास ही कुरान का बोल ‘बिस्मिल्लाह’ निकला और कमरूद्दीन का नाम ‘बिस्मिल्लाह’ हो गया.

डुमरांव रियासत के शहनाई वादक थे उस्ताद जी के पिता
उस्ताद जी के पिता पैगम्बर बख्श डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादक थे. सगे-संबंधियों का नाता भी साजों से ही था. एक नजर से देखे तो संगीत उनकी रगों में समाया हुआ था. शहनाई की तान सुनते हुए ही वो बड़ें हुए. कम उम्र उस्ताद के सर से मां का साया उठ गया और उस्ताद अपने मामू अली बख्श विलायतु के साथ बनारस आ गए. अली बख्श विलायतु की देखरेख में उस्ताद ने सुरों की साधना की. उस्ताद जी के मामू उन्हें हिदायत मिली कि व्यायाम किए बिना सांस के इस बाजे से प्रभाव नहीं पैदा किया जा सकेगा. इस पर बिस्मिल्ला खां उस्ताद की बात मानकर सुबह-सुबह गंगा के घाट पहुंच जाते और व्यायाम से अपने शरीर को गठीला बनाते.
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राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
बिस्मिल्लाह खां को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 30 के दशक में कलकत्ता में हुए एक अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में मिला. ये संगीत सम्मेलन बिहार के भूकंप पीडि़तों की सहायता के लिए आयोजित किया गया था. इस समारोह में उस्ताद जी ने शहनाई की स्वर लहरियों से ऐसा समां बांधा कि लोग दंग रह गए और उनके फन के चर्चे पूरे देश में मशहूर होने लगे. उस वक्त उस्ताद जी की उम्र महज 20 साल की थी. एक समय ऐसा आया जब बिस्मिल्लाह और शहनाई एक दूसरे में समा गए.
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सादगी से भरी थी उस्ताद की जिंदगी
उस्ताद जी गहरे तौर पर धार्मिक और इंसानियत-परस्त शख्सियत थे. जाति और मजहबों की लकीरों में बंटे समाज में पांच वक्त के नमाजी उस्ताद सुबह और शाम काशी विश्वनाथ मंदिर में भी भोलेनाथ को अपने शहनाई वादन से रिझाते रहे. भोलेनाथ की ही तरह उस्ताद की जीवन भी सादगी वाली थी. बनारस में वे अक्सर साइकिल रिक्शा से ही सफर करते नजर आते थे. खां साहब सूफी-संतों की माला के मनके जैसे थे.
कट्टरपंथियों ने जताई थी बिस्मिल्ला खां के शहनाई वादन पर आपत्ति
उस्ताद जी के लिए संगीत, सुर व नमाज एक ही चीज थे. इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह खां के लिए सारे इनाम-इकराम, सम्मान बेमानी थे. उन्होंने कहा भी था कि “सिर्फ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहजीब को एकाकार करने की ताकत रखता है.” बरसों पहले कुछ कट्टरपंथियों ने बिस्मिल्ला खां के शहनाई वादन पर आपत्ति की. उन्होंने आंखें बंद की और शहनाई से ‘अल्लाह हू’ बजाते रहे. थोड़ी देर बाद उन्होंने मौलवियों से पूछा कि ‘मैं अल्लाह को पुकार रहा हूं, मैं उसकी खोज कर रहा हूं. क्या मेरी ये जिज्ञासा हराम है. उनके इस बात से मौलाना चुप हो गए.
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कई फिल्मों में भी दिया था उस्ताद जी ने संगीत
उस्ताद जी ने कई फिल्मों में भी संगीत दिया. उन्होंने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ के लिए शहनाई की धुनें दी. आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फिल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान बिखेरीं.
क्या हम आजाद नहीं हुए?
लाल किले पर हिंदुस्तान की आजादी का जश्न बनाया जा पहा था. उस्ताद जी उस्ताद दी को वहां शहनाई बजाने के लिए बुलाया था. उस्ताद जी ने उस्ताद जी से कहा कि आप आगे-आगे शहनाई बजाते हुए चलेंगे और आपके पीछे हम यानी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री वगैरह तमाम बड़े लोग चलेंगे. इस बात पर उस्ताद जी उखड़ गए. उन्होंने कहा कि यह भी कोई बात हुई! हम खड़े होकर या चलते हुए कैसे शहनाई बजा सकते हैं? उन्होंने साफ मना कर दिया. इस बात को लेकर नेहरु को भी गुस्सा आ गया. वो उस्ताद जी से बोले बजाना तो पड़ेगा ! उस्ताद जी भी कहा कम थे उन्होंने भी उसी तैश में आकर कहा कि आजादी क्या सिर्फ आपके ही लिए आई है? क्या हम आजाद नहीं हुए हैं? यह हमारी आजादी है कि हम इस तरह बजाने से मना कर रहे हैं. उस्ताद जी की बात सुनकर जवाहर लाल ने एकदम से बात को सम्भाला और हंसते हुए बोले कि “बिस्मिल्लाह यह भी तो तुम्हारी आजादी है कि आगे-आगे तुम चलोगे और पीछे-पीछे हम सब!”
बालाजी का आशीर्वाद
उस्ताद जी के मामू घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे. जब उस्ताद जी कुछ बड़े हुए तो उन्हें भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया गया. वो भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगें. एक दिन उस्ताद जी के मामू साहब ने उन्हें अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना. यह बात उस्ताद जी को कुछ समझ में आयी तो कुछ नहीं. पर वो तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगें रहे. एक घटना का के बारे में उस्ताद जी ने बताया था कि ऐसे ही एक दिन शहनाई बजाते-बजाते काफी रात हो गई अचानक मंदिर में एक अलौकिक सुगंध से भर गयी. मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी. मेरी आंखें खुल गयीं. मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं. ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में. मैं पसीने-पसीने हो गया. उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ. मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी. फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये. डर के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था. मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना. फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी. इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा.
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और भीड़ में पसर गया सन्नाटा
सन् दो हजार की बात है. ताजमहल के पार्श्व में एक म्यूजिकल टीवी शो की रिकार्डिंग चल रही थी. एक सदी की विदाई और दूसरी सदी के स्वागत की थीम पर आधारित इस कार्यक्रम में संगीत और सिनेमा जगत की कई जानी-मानी हस्तियां शिरकत कर रही थीं. इस कार्यक्रम की शूटिंग में एक दिन शास्त्रीय संगीत के अंतर्गत गायन और वादन की प्रस्तुतियों के लिए तय कर दिया गया था. इसमें शास्त्रीय संगीत में गायन और वादन से जुड़ी तमाम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हस्तियों के साथ उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब की प्रस्तुति भी होनी थी. दर्शक दीर्घा में भीड़ कुछ उद्दंड थी. संभवत: मनमोहक नृत्य अथवा सुगम संगीत प्रस्तुतियों की उम्मीद में बैठे लोग शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियों को हजम नहीं कर पा रहे थे और कलाकारों द्वारा बार-बार तवज्जो की गुजारिश के बावजूद लगभग सभी को हूट कर रहे थे. ऐसे में उस्ताद की बारी आई. उस्ताद ने किसी से तवज्जो की भीख नहीं मांगी बल्कि मंच पर आते ही बड़ी शालीनता के साथ माइक संभाला और बोले कि मैं ज्यादा तो बोलता नहीं, शहनाई की जुबान जानता हूं, बस इतना ही कहना चाहता हूं की मेरा नाम बिस्मिल्लाह खां है, माफी चाहूंगा मैं अब शहनाई बजाने जा रहा हूं, आप चाहें तो कानों में रुई ठूंस सकते हैं.” उस्ताद के इतना कहते ही सन्नाटा पसर गया और फिर कम से कम उस्ताद की प्रस्तुति के दौरान कोई हो-हल्ला नहीं हुआ. यही नहीं कार्यक्रम के अंत में जब बेशुमार तालियां बजीं तो उस्ताद ने यही कहा कि, “मुझ से पहले भी जो कलाकार आए उनकी प्रस्तुति मुझसे भी बेहतर थी लेकिन उनकी बदनसीबी रही कि आप उन्हें तवज्जो न दे सके.”
सम्मान व पुरस्कार
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी कला में ऐसे शीर्ष पर पहुंचे थे जहां सम्मान उनके हाथों का स्पर्श पाकर सम्मानित होते थे. भारत का शायद ही ऐसा कोई शीर्ष सम्मान होगा जो उनको न अर्पित किया गया हो. 11 अप्रैल, 1956 को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हिन्दुस्तानी संगीत सम्मान अर्पित किया, राष्ट्रपति के ही हाथों 27 अप्रैल, 1961 को पद्मश्री से सम्मानित किया गया. 16 अप्रैल, 1968 को पद्म भूषण, 22 मई, 1980 को पद्म विभूषण और वर्ष 1992 में ईरान सरकार से मिला तालार मौसीकी अवॉर्ड भी शामिल है. इसके बाद 4 मई 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया.
बनारस व गंगा मैय्या से बेपनाह मोहब्बत
बनारस से उन्हें इतना प्यार था कि जिंदगी की अंतिम सांस यहां लेकर यहीं की मिट्टी में दफन हो गए. बिस्मिल्लाह सिर्फ शहनाई के ही उस्ताद नहीं थे, बल्कि हिंदू-मुस्लिम कौमी एकता की भी बड़ी मिसाल थे. बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने बने गलियारे में वे लंबे वक्त तक भोले बाबा के लिए शहनाई बजाते थे. बनारस के कई घाट उनके रियाज के गवाह बने. हमेशा कहते थे कि उन्हें बनारस और गंगा नदी से कोई जुदा नहीं कर सकता है.
अपने जाने का पूर्वाभास
उनको अपने जाने का पूर्व आभास हो गया था इसलिए अंतिम सांस लेने से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने पुत्र व शिष्य नैयर हुसैन को राग अहीर भैरवी की बारीकियां इस तरह समझाईं थीं मानो गुरु मंत्र दे रहे थे और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहांत हो गया. यह भी इत्तेफाक है कि बिस्मिल्लाह खां साहब की पैदाइश की तारीख भी 21 है और उन्होंने आंखें भी मूंदीं इसी तारीख को. महीने क्रमश: मार्च और अगस्त के थे. अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर खां साहब ने शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन खां साहब की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और वे इण्डिया गेट पर शहनाई बजाने की तमन्ना मन में लिए ही चले गए. उनके शहनाई के प्रति प्रेम को देखते हुए हुए उनके साथ शहनाई को भी सुपुर्दे खाक किया गया और भारतीय सेना द्वारा इक्कीस तोपों की सलामी दी गई.
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