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आजसू में परिवारवाद, पूंजीपतियों का है पार्टी पर कब्‍जा : ललित महतो

Ranchi :  झारखंड गठन के बाद हर बार सत्‍ता के स्‍वाद का मजा लेने वाली आजसू पर पार्टी के संस्‍थापक रहे ललित महतो ने सवाल खड़ा किया है. ललित महतो 1993 के दुमका अधिवेशन और 1995 के चाईबासा अधिवेशन के दौरान लगातार दो बार आजसू के केंद्रीय अध्‍यक्ष रह चुके हैं. वह संयुक्‍त बिहार के दौरान अलग राज्‍य के आंदोलन में छात्र आंदोलन का नेतृत्‍व किया. तब उनके साथ पार्टी में विनोद भगत, सूर्य सिंह बेसरा, मंगल सिंह बाबोरा जैसे लोग साथ होते थे. साल 2000 में झारखंड का गठन हुआ. तब आजसू पार्टी भाजपा के साथ सत्‍ता में आयी और अब तक जब-जब झारखंड में लोकतांत्रिक सरकार बनी, चाहे वह भाजपा की सरकार हो, झामुमो की सरकार या फिर कांग्रेस समर्थित मधु कोड़ा की सरकार. हर बार आजसू पार्टी सत्‍ता में रही और सुदेश महतो व चंद्रप्रकाश चौधरी सरकार के कैबिनेट में रहे. अलग राज्‍य आंदोलन से सत्‍ता तक आजसू के साथ रहे ललित महतो से न्‍यूज विंग ने खास बातचीत की.

Ranchi :  झारखंड गठन के बाद हर बार सत्‍ता के स्‍वाद का मजा लेने वाली आजसू पर पार्टी के संस्‍थापक रहे ललित महतो ने सवाल खड़ा किया है. ललित महतो 1993 के दुमका अधिवेशन और 1995 के चाईबासा अधिवेशन के दौरान लगातार दो बार आजसू के केंद्रीय अध्‍यक्ष रह चुके हैं. वह संयुक्‍त बिहार के दौरान अलग राज्‍य के आंदोलन में छात्र आंदोलन का नेतृत्‍व किया. तब उनके साथ पार्टी में विनोद भगत, सूर्य सिंह बेसरा, मंगल सिंह बोबोंगा जैसे लोग साथ होते थे. साल 2000 में झारखंड का गठन हुआ. तब आजसू पार्टी भाजपा के साथ सत्‍ता में आयी और अब तक जब-जब झारखंड में लोकतांत्रिक सरकार बनी, चाहे वह भाजपा की सरकार हो, झामुमो की सरकार या फिर कांग्रेस समर्थित मधु कोड़ा की सरकार. हर बार आजसू पार्टी सत्‍ता में रही और सुदेश महतो व चंद्रप्रकाश चौधरी सरकार के कैबिनेट में रहे. अलग राज्‍य आंदोलन से सत्‍ता तक आजसू के साथ रहे ललित महतो से न्‍यूज विंग के पत्रकार सुभाष शेखर ने खास बातचीत की.

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न्‍यूज विंग : आजसू पार्टी की स्‍थापना क्‍यों की गयी थी ?

ललित महतो : आजसू पार्टी की स्‍थापना यहां के आदिवासी पिछड़ों समेत मूलवासियों को सही कानूनी हक दिलाने और लूट खसोट को रोकने के लिए अलग राज्‍य के गठन के लिए की गयी थी. झारखंड गठन के बाद हम झारखंड राज्‍य में पांचवी अनुसूची का दर्जा दिलाने की मांग कर रहे थे. इसके लिए किसी राज्‍य आदिवासियों की संख्‍या 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए. यहां के 27 प्रतिशत कुर्मी को आदिवासी का दर्जा मिल जाये तो यहां आदिवासियों की तादात 60 प्रतिशत हो जायेगी और झारखंड को पांचवी अनुसूची क्षेत्र का दर्जा मिल जायेगा. इसके साथ ही पेशा कानून लागू हो जायेगा. जिसके बाद किसी भी बड़े निर्णय के लिए ग्राम सभा को पूरा अधिकार मिल जायेगा.

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न्‍यूज विंग : आप भी आजसू में थे. सरकार सत्‍ता में भी थे. आपने इसके लिए क्‍या किया ?

ललित महतो : हां मैंने आजसू को शुरू से देखा. अलग राज्‍य गठन के दौरान मैं जेल भी गया. कई मुकदमा चले. सुदेश महतो के नेतृत्‍व में पार्टी सरकार के साथ सत्‍ता में भी शामिल हुई. लेकिन सुदेश महतो ने पार्टी के मुद्दों और उद्देश्‍यों को सरकार में रहकर ने कभी पूरा होने नहीं दिया. इस दौरान कई बार सामाजिक और रानीतिक आंदोलन भी हुए. मेरे पार्टी छोड़ने के बाद भी मेरी लड़ाई जारी है. कुर्मी को आदिवासी में शामिल करने के लिए भेजा गया प्रस्‍ताव साल 2009 से 2011 तक सरकारी दफ्तरों में घुमती रही. आखिर में तत्‍कालीन सीएम अर्जुन मुंडा ने नामंजूर कर दिया. उस फाइल में बतौर सहमति सुदेश महतो के भी हस्‍ताक्षर थे.

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न्‍यूज विंग : आप और आपके पुराने साथियों ने आजसू पार्टी क्‍यों छोड़ा ?

ललित महतो : मैंने 23 अक्‍टूबर 2008 को पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया था. इसके पहले मैंने पार्टी में रहते हुए अलग राज्‍य के लिए संघर्ष किया और झारखंड गठन के बाद भी पार्टी के साथ रहा. अच्‍छे दिन आने के बाद आजसू पार्टी परिवारवाद से घिरता गया. पहले पार्टी में सामूहिक नेतृत्‍व से अध्‍यक्ष निर्णय लेते थे. आजसू में पार्टी सु्प्रीमो का कल्‍चर आ गया है. साल 2005 में मुझे ईचागढ़ सीट से विधानसभा चुनाव की तैयारी करने को कहा गया. ऐन मौके पर दूसरी पार्टी से पार्टी में शामिल हुए सदस्‍य को उम्‍मीदवार बना दिया गया. उसी तरह 2009 विधानसभा चुनाव के दौरान भी माहौल देखने को मिला. पार्टी में सुदेश ही सर्वे सर्वा बन कर रह गये.

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न्‍यूज विंग : पार्टी में परिवारवाद कैसे है ?

ललित महतो : सुदेश महतो के अध्‍यक्ष बनते ही परिवारवाद शुरू हो गया. उनके करीबी रिश्‍तेदार चंद्रप्रकाश चौधरी को पार्टी में हमेशा खास तरजीह दी गयी. सत्‍ता में भी हमेशा चंद्रप्रकाश सरकार के कैबिनेट में रहे हैं. सुदेश महतो की पत्‍नी नेहा महतो तीरंदाज अकादमी की अध्‍यक्ष हैं. अपने ससुर को भी वह फायदा पहुंचा रहे हैं. उन्‍होंने जेपीएससी को नियंत्रण में लेकर अपने भाई को डीएसपी कैसे बनवाया, इससे सभी वाकिफ हैं. पार्टी के जरिये उन्‍होंने अपने परिवार को लाभ पहुंचाया है.

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न्‍यूज विंग : पुराने लोग तो दूर चले गये, अब कौन लोग चला रहे हैं आजसू को ?

ललित महतो : पार्टी में सभी प्रमुख पदों पर परिवार के लोग तो हैं ही. अब इस पार्टी में पूंजीपति और कारोबारी लोग जुट रहे हैं. रांची के न्‍यूक्लियस मॉल के मालिक कहने को विष्‍णु अग्रवाल हैं. लेकिन इसमें सीधे सुदेश महतो और दूसरे नेताओं का पैसा लगा है. विष्‍णु अग्रवाल कुछ साल पहले तक छोटे से ट्रांसपोर्ट व्‍यवसायी थे, जो इंडाल में माल ढुलाई का काम करते थे. झालदा में सब जानते हैं कि विष्‍णु अग्रवाल क्‍या थे. कुछ सालों में उनके पास इतना पैसा कहां से आया और न्‍यूक्लियस मॉल बना लिया. विष्णु अग्रवाल की तरह सुदेश के संपर्क में और भी कई कारोबारी हैं. इस पार्टी में कोई भी पैसा वाला शामिल होकर महत्‍वपूर्ण पद प्राप्‍त कर सकता है. अभी हाल में जमशेदपुर के डॉन अखिलेश सिंह के पिता चंद्रगुप्‍त सिंह भी आजसू में शमिल हुए हैं. पुराने कार्यकर्ताओं की संघर्षगाथा और कुर्बानी से कोई लेना देना नहीं रह गया है.

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