सुरजीत सिंह
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने धर्म परिवर्तन के सन्दर्भ में गांधी जी के उस विचार की सच्चाई सामने ला दी है, जिसे तोड़-मरोड़कर झारखण्ड सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया था. वर्ष 1935 में हरिजन पत्रिका में धर्मांतरण को लेकर महात्मा गांधी के वक्तव्य छपे थे. उसमें गांधी जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा था, जैसा कि झारखंड सरकार द्वारा 11 अगस्त को अधिकतर हिंदी अखबारो में छपे विज्ञापन में गांधी जी के हवाले से लिखा गया. विज्ञापन सरकार ने जारी किया था और उस पर होने वाले खर्च का भुगतान भी सरकारी खजाने से किया जायेगा.
13 अगस्त को एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री व सामाजिक कार्यकर्ता ज्या द्रेंज ने जब इसी सवाल को उठाया तो भाजपा के नेता अक्रोशित हो गये. ज्यां द्रेज़ से बदसलूकी करने में मुख्य भूमिका झारखण्ड के मंत्री रंधीर सिंह की रही. ज्ञात हो कि ये वही नेता हैं जिनका अतीत विवादस्पद रहा है. रंधीर सिंह मंत्री बनने से पूर्व एक आतंकी घटना के गवाह थे. वर्ष 2015 में मंत्री बनने के बाद गवाही से मुकर गये थे. रंधीर सिंह ने ज्यां द्रेज को ना सिर्फ बुरा-भला कहा बल्कि अंगुली दिखाते हुए धमकी भी दी.
इसके बाद केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह ने माईक संभाला. पहले अपनी पार्टी के नेताओं को शांत कराया. फिर विज्ञापन में गांधी जी के हवाले से कही गयी बातों को सच बाताया. हरिजन पत्रिका में छपी गांधी जी के वक्तव्य का ज्ञान सबको दिया. 14 अगस्त को ‘दवायरहिंदी.काम’ ने दिल्ली विवि के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख प्रकाशित किया, जिसमें हरिजन पत्रिका में 1935 में प्रकाशित गांधी जी का पूरा साक्षात्कार भी शामिल है.
अब सवाल यह उठता है कि अखिर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह ने झूठ क्यों कहा कि “1935 में लिया गया साक्षात्कार, जो 1942 में हरिजन पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, उसमें गांधी जी ने जो बातें कही थी, झारखंड सरकार ने विज्ञापन में वही प्रकाशित किया है.”
इस प्रकरण को लेकर वायरल वीडियो में यह दिखता है कि राधा मोहन सिंह ये बातें एक कागज को देख कर कह रहें हैं. मतलब यह कि या तो वह पहले से लिख कर लाये थे या किसी ने तत्काल उन्हें लिख कर दिया था. कुल मिलाकर मंत्री राधा मोहन सिंह ने झूठा संदर्भ देकर झारखंड सरकार और ज्यां द्रेज के साथ दुर्व्यवहार करनेवाले स्थानीय भाजपा नेता और मंत्री का बचाव किया.
राधामोहन एक गंभीर राजनेता माने जाते हैं. उनकी एक अलग पहचान है. उन पर भ्रष्टाचार के अारोप लगने की सार्वजनिक सूचना नहीं है. इस प्रकरण से भले ही कार्यक्रम में मौजूद भाजपा के समर्थकों की तालियां मिली, लेकिन असल में उनका कद छोटा ही हुआ है. जिन लोगों ने कार्यक्रम में उन्हें सुना या दूसरे दिन अखबारों में उनका यह बयान पढ़ा, वह भी अब हर जगह यही झूठा तर्क पेश करेंगे. कुछ लोग चिल्लाकर, शोर मचाकर बोलेंगे और सामने वाले को इसे ही सच मानने के लिए विवश करेंगे. जैसा कि 13 अगस्त को भी हुआ.
सवाल यह उठता है कि झारखंड सरकार ने विज्ञापन जारी कर यह झूठ क्यों फैलाया ? फिर राधा मोहन सिंह जैसे राजनेता ने झारखंड सरकार की गलती के पक्ष में क्यों झूठा संदर्भ दिया. क्या यह राजनीति का नया चेहरा है, जो झूठ बोलकर अपनी मन की करेगा या सिर्फ इसलिए झूठा तथ्य परोसेगा, क्योंकि वह सत्ताधारी दल का नेता है. क्या ऐसे मौकों पर सच बोल कर या चुप रहना अब राजनेताओं को गंवारा नहीं है.
कार्यक्रम में मौजूद एक अन्य केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी बोल दें. उन्होंने ठीक ही कहा. पर क्या यह सिर्फ सामने वाले व्यक्ति या दल पर लागू होता है. क्या बोलने की आजादी का यह मतलब है कि कोई भी कुछ भी झूठ बोल दे. एक गलत तथ्य को सही ठहराने के लिए दूसरा झूठा संदर्भ सामने रख दे.




