NEWS WING
Ranchi, 28 September: अगर सबकुछ ठीक रहा तो, जिस तरह से पलामू के गरीब पिता करण को अपने बेटे की लाश कंधे पर ढोनी पड़ी थी. वो अब दूसरे किसी गरीब पिता को नहीं करना होगा. एक-के-बाद-एक झारखंड में हाल के महीनों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर ऐस-ऐसी खबरें आयीं. जिसने सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी. राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की काफी भद पिटी. इतना होने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग की नींद खुली है. सरकार एक ऐसी योजना लेकर आने वाली है, जिससे किसी भी गरीब या कहें बीपीएल सदस्य की मौत होती है तो, उसके शव को अस्पताल से घर तक ले जाने के लिए उसे एक वैन मिलेगी. वैन का सारा खर्चा भी सरकार का होगा.
स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से कैबिनेट को चिट्ठी
स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय के मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी ने कैबिनेट को एक चिट्ठी लिखकर योजना की शुरुआत करने को कहा है. योजना के तहत जिले के सभी सरकरी अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों में ऐसे वैन की सुविधा करानी है, जो किसी बीपीएल परिवार के सदस्य के मौत के बाद उसके शव को उसके घर तक पहुंचाने का काम करेगा. इस काम में जितना भी खर्च आएगा सबका वहन विभाग करेगा. वैन के साथ-साथ अलग से वैन चलाने के लिए ड्राइवर और एक और हेल्पर की नियुक्ति की जाएगी. इन्हें भी सैलेरी विभाग के तरफ से दी जाएगी.
हेमंत सोरेन ने की थी पहल, लेकिन नहीं हो सका साकार
2014 में हेमंत सोरेन सरकार ने भी ऐसी योजना की शुरुआत करने की पहल की थी. लेकिन, इसे जमीनी हकीकत नहीं दिया जा सका. योजना का काम आगे बढ़ता कि उससे पहले तख्ता पलट हो गया. अब रघुवर सरकार की तरफ से फिर से योजना शुरू होने की पहल तो हुई है. लेकिन ये साकार हो पाएगा या नहीं, ये कहना अभी जल्दबाजी होगी. मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया के गाइडलाइन के मुताबिक मौत के बाद सरकारी अस्पतालों में शवों को एंबुलेंस या दूसरे वाहन से घर तक पहुंचाना अनिवार्य है. लेकिन झारखंड में ऐसा नहीं होता है. झारखंड में पहले की अपेक्षा एंबुलेंस जरूर दोगुने हुए हैं. लेकिन शवों को ढोने के लिए वाहन की सुविधा नहीं है.
योजना शुरू करने की चुनौती
झारखंड में तीन मेडिकल कॉलेज हैं. जहां सालाना औसतन 9,000 लोगों की मौत होती है. इनमें से कई पड़ोसी राज्य के भी होते हैं. वहीं 24 जिलों में औसतन 6 प्रखंड के मुताबिक बलॉक स्तर पर पूरे प्रदेश में 144 अस्पताल होंगे और 24 सदर अस्पताल. ऐसे में सरकार के सामने इतने वाहन और वाहन के लिए दो लोगों की नियुक्ति के साथ कई तरह की चुनौतियां हैं. यह भी कहा जा रहा है कि कहीं इस योजना का भी हाल 108 एंबुलेंस की तरह ना हो जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि 108 एंबुलेंस के बारे में ये कहा गया था कि 2017 की शुरुआत में ही योजना पूरे प्रदेश में पूरी तरह से लागू हो जाएगी. लेकिन, जमीनी हकीकत और ही कुछ है. शायद ही ये योजना पूरी तरह से 2018 में भी लागू हो पाए.
कैसे खुली सरकार की नींद
इसी साल अगस्त में पलामू में करण नाम के शख्स के बेटे की मौत मलेरिया से हो जाती है. करण एक गरीब परिवार से आता है. उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो किसी गाड़ी को किराए पर कर पाता. अस्पताल प्रबंधन ने उसे एंबुलेंस देने से मना कर दिया था. ऐसे में उसे अपने बेटे की लाश अपने कंधे पर ढो कर ले जानी पड़ी थी. मीडिया में ये खबर काफी जोर-शोर से चली थी. सीएम को अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ एक्शन लेना पड़ा था. वहीं, जुलाई में चतरा के लक्ष्मण उरांव के भाई राजेंद्र की मौत सांप काटने से हो गयी थी. उसकी मौत सरकारी अस्पताल में हो गयी. लक्ष्मण को अस्पताल की तरफ से गाड़ी नहीं मिली. जिसके बाद उसे अपने भाई की लाश अपनी पत्नी के साथ मिलकर ढोना पड़ा था.




