हाशिये पर है बाघों से आंखें मिलाने वाली मुसहर जाति
अपने देश में कई ऐसी जातियों का समूह है जो वर्त्तमान समाज के मुख्यधारा से बिल्कुल कट चुके हैं. एक तरफ हम चांद-तारे पर पहुंचकर और इससे उपर जाने की तैयारी कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हमारे ही समाज में कई ऐसे लोग, जाति समूह हैं जो दो जून की नमक रोटीयों के लिए कडी मस्कत कर रहें हैं. इसके बाद भी उन्हें ज्यादातर समय भुखे ही रहना पडता है. ऐसे ही जातियों में एक मुसहर समुदाय भी हैं. बिहार के उत्तरी और मध्य भाग के मुसहर समुदाय की स्तर शुन्य से उपर है मगर दक्षिण बिहार में मुसहर जाति के लोगों की स्थिति आज भी शुन्य पर ही है. आज भी इस समुदाय के लोग भीख मांग कर जीवन यापन करते हैं. इनके बच्चे महिलाएं पुरूष सभी भीख मांगने के पेशे से जुडे हैं. दक्षिण बिहार में एक सर्वेक्षण के बाद यह पता चला है कि एक भी ऐसा मुसहर नही जो कम से कम नाम लिखना जानता हो. मुसहर जाति अनुसूचित जाति के श्रेणी में शामिल है. लेकिन अनुसूचित जाति के मिलने वाली सरकारी सुविधा से पूरी तरह वंचित है. इस जाति के लोग स्वभाव से प्रकृतिक प्रेमी हैं. इनका जीवन पूरी तरह से घुमक्कड है. कबीलायी जीवन व्यवस्था इनके जीवन का एक हिस्सा है. जमीन, संपती से सरोकार अभी तक नहीं है. मुसहर जाति पूरे परिवार के साथ आज भी आकाश के नीचे जीवन गूजारता है. ये लोग पेड के छाव में या पत्ती डंठल, लकडी के टहनियों के छोटे से झोपडी बना कर रहते हैं. यह समूदाय शरीर ढकने के लिए पुराने फटे वस्त्र से गुजारा करता है. इनके बच्चे नंगे या फटे पुराने चिथडो में लिपटे दिखायी देते हैं. इस जाति के बच्चे एवं औरतें झूण्ड में शामील होकर भीक्षाटन करते हैं. और घर-घर जाकर अनाज, पैसा संग्रह करते हैं. मुसहर समूदाय अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए जंगलों में विचरण कर जंगली जानवरों व चूहों को पकडने, जडी-बूटी के निकाल कर दवा बना कर बेचने का काम भी करते हैं. सांप, कछुआ, गोह, तोता पकडना वनों से मधु संग्रह करना गोंद का संग्रह कर बाजारों में बेचकर जीवन यापन करते हैं. सिमित साधनों में अपने परिवारों के साथ गुजारा करना इनके जीवन का एक हिस्सा है. स्थायी रूप से एक स्थान पर वर्षों तक अभी तक नहीं बस पाये हैं. स्वभाव से अपने आप को जंगल निवासी मानते हैं. यहां तक कहते हैं कि मुसहरों का पुर्वज बाघों से आंख मिलाकर जीवन जीने में विश्वास करते हैं.
भूमिहीन गरीब समुदायों में शामिल मुसहर जाति सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास से बिल्कूल कटे हुये हैं. सरकार के पास इनके विकास के लिए कई कार्यक्रम हैं. लेकिन सरकार की गलत नीतियों के कारण इनकों समाज के मुख्य धारा में शामिल नहीं कराया जा सका है. बदलते समाजिक परिवेश में ये पूरी तरह से वंचित हैं. मुसहर समुदायों से बातचीत के क्रम में पता चला कि एक लडका नाम लिखने जानता था मगर उसकी भी अकाल मृत्यु हो गई है. वर्त्तमान में इनके समुदाय में एक भी व्यक्ति पढा-लिखा नहीं है. इन समुदायों के पास न ही जमीन है, न हीं घर और कोई स्थायी रोजगार. सरकार के खाते में इन मुसहर जातियों का नाम कहीं नहीं है न मतदाता सूची में न हीं लालकार्ड में. ये बिल्कूल भूमिहीन हैं. सरकारी खाते के अनुसार इनकी भारतीय होने का पहचान तक नहीं है. मगर समाजिक पहचान भी अब धीरे-धीरे मिटती जा रही है. इनकी आबादी दिनों दिन कम होती जा रही है. आज इनके सामने भुखमरी की भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है.
- संवाद मंथन (गणेश रवि)
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