Opinion

युवा बेरोजगार, किसान लाचार

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Faisal Anurag

बेरोजगार युवाओं और किसानों के सवालों को भले ही मेनस्ट्रीम इंडिया नजरअंदाज कर दे लेकिन असली भारत में उनकी आवाज लगातार बुलंद होती जा रही है. प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिवस के अवसर पर बेराजगार दिवस का सोशल मीडिया पर नबंर वन के रूप में ट्रेंड करना और एनडीए के सहयोगी दल के एक मंत्री का मोदी सरकार से इस्तीफा उसी आंच का परिणाम है. लगभग दो सप्ताहों से लगतार बेरोजगार देश के विभिन्न हिस्सों में ताली-थाली बजा कर सरकार को आगाह कर रहे हैं. पंजाब और हरियाणा में किसानों का आंदोलन लगतार बढ़ता जा रहा है. न केवल पढ़े लिखे युवा और श्रमिक बल्कि प्रोफेशनल्स भी बेरोजगारों की भीड़ बढ़ा रहे हैं. पिछले तीन महीनों में  इंजीनियर, अकांउटेंट जैसे अनेक सेक्टर के प्रोफेशनलों को रोजगार से बाहर होना पड़ा है. सीएमआइ के ताजा आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या 66 लाख हो चुकी है. यह संख्या यहीं थमती नजर नहीं आ रही है. इसमें और इजाफा होने का अनुमान है. कोविड दौर में मनरेगा को ग्रामीण रोजगार के लिए सराहा गया लेकिन उसकी हकीकत यह है कि देश के दस राज्यों में मनरेगा मजदूरों के 782 करोड़ की मजदूरी का भुगतान ही नहीं हो पाया है.

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देश में रोजगार खोनेवालों की कुल संख्या दो करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. रोजगार के तमाम दरवाजे बंद हैं. बड़ी कंपनियों तक में अवसर की कमी हो गयी है. उत्तर प्रदेश की सरकार ने संविदा रोजगार का नया जुमाला उछाला है. यूपी में बेरोजगार इसका भारी विरोध कर रहे हैं. इलाहाबाद जो कि अब प्रयागराज है इस विरोध का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. बावजूद इसके मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए यह सवाल ही नहीं है. युवाओं के रोष को इस तरह अनसुना शायद ही कभी किया गया हो. विशेषज्ञों ने तो साफ कहा है कि केंद्र सरकार के पास रोजगार पैदा करने की कोई कार्य योजना है ही नहीं. मुनाफा कमानेवाली सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के बेचे जाने के कदम ने हालात को पेचीदा ही बना दिया है. लघु और मध्यम क्षेत्र के उद्योग गतिहीन हैं और बड़ी इंडस्ट्री भी रोजगार पैदा करने में नाकामयाब हैं, उल्टे छंटनी कर रही है.

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किसान केंद्र सरकार के उस विधेयक के खिलाफ हैं जिसे नरेंद्र मोदी कृषि क्षेत्र में बड़ी क्रांति के रूप में देख रहे हैं. यह विधयक संसद में पेश किया जा चुका है. इसके पहले केंद्र ने तीन अध्यादेश जारी किये थे, जिसका बचाव प्रधामंत्री ने किया है. ये तीन अध्यादेश हैं- उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, किसान सशक्तीकरण और संरक्षण अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन). किसान संगठनों ने माना है कि इससे न केवल न्यूतम समर्थन मूल्य से छुटकारा लेगी बल्कि देरसबेर खेती के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों का वर्चस्व होगा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मसले पर ट्वीट किया है- किसान ही हैं जो ख़रीद खुदरा में और अपने उत्पाद की बिक्री थोक के भाव करते हैं. मोदी सरकार के तीन ‘काले’ अध्यादेश किसान-खेतिहर मज़दूर पर घातक प्रहार हैं ताकि न तो उन्हें MSP व हक़ मिले और मजबूरी में किसान अपनी ज़मीन पूंजीपतियों को बेच दें. नरेंद्र मोदी का एक और किसान-विरोधी षड्यंत्र है.

हरियाण में कृषि अध्यादेश को लेकर किसानों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प भी हो चुकी है. भारत का कृषि क्षेत्र लंबे समय से केवल कागजी बहसों में उलट कर संकटग्रस्त होता गया है. कोविड के बाद के दौर में यह संकट और गहरा गया है. भारत के कुल जीडीपी में कृषि क्षेत्र का बड़ा महत्व है. भारतीय राजनीति की त्रासदी यह है कि उसे वोट के लिए किसानों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर निर्भर रहना पड़ता है लेकिन उसकी नीतियां कारपोरेटपस्त होती हैं. कृषि क्षेत्र पर कारपोरेट की लंबे समय से नजर है. नरेंद्र मोदी भले ही कहें कि इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नये-नये अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा. इससे हमारे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे. लेकिन इस पर किसान भरोसा करते नजर नहीं आ रहे हैं.

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