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साइबर क्राइम के गढ़ जामताड़ा की ये अच्छी बात नहीं जानते होंगे आप!

  • – साइबर क्राइम का गढ़, जिस पर वेब सीरीज भी बनी
    – अब काजू की खेती का नया केंद्र है जामताड़ा का करमाटांड़
    – ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बिताये थे यहां जिंदगी के 18-20 साल
  • Praveen Munda

Ranchi : झारखंड का सुदूर क्षेत्र स्थित जिला जामताड़ा. इस इलाके खासकर करमाटांड़ ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सुर्खियां बटोरी. यहां के साइबर अपराधियों ने देश के तकरीबन हर क्षेत्र के लोगों को अपना निशाना बनाया.
पिछले साल यहां से लगभग सौ साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया था. इसके बावजूद यहां साइबर अपराध पर अंकुश नहीं लग सका. यह अपराध यहां ऐसा फला-फूला कि जामताड़ा नाम से वेब सिरीज तक बनी.

यही नहीं, यहां के साइबर अपराध पर झारखंड हाइकोर्ट के निर्देश पर रिसर्च भी कराया गया. ज्यूडिशियल एकेडमी के द्वारा कराया गया रिसर्च अब पूरा हो चुका है. हालांकि अभी उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है. पर साइबर अपराध जामताड़ा का स्याह पक्ष ही उजागर करता है.
इससे इतर, इस इलाके की कई ऐसी खासियतें हैं जिसे लोग नहीं जानते. चाहे वह काजू की खेती हो या फिर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का करमाटांड़ से रिश्ता.

यहां मिलता है देश में सबसे सस्ता काजू

जामताड़ा का नाला इलाका पिछले कुछ सालों में देश के नये काजू उत्पादक क्षेत्र के रूप में भी ऊभरा है. यहां देश में सबसे सस्ता काजू उपलब्ध है. तकरीबन 20-25 रुपये किलो. यह सुनने में हैरानी जरूर होती है मगर इसके पीछे कारण है.
दरअसल यहां पर काजू प्रोसेसिंग का प्लांट नहीं है. बंगाल के व्यापारी यहां पर आकर पहले ही काजू की बोली लगा जाते हैं. पेड़ से उतारे गये कच्चे काजू को वे 20 से 25 रुपये किलो की दर से ले लेते हैं. इसे वे प्रोसेस कर महंगे दामों में बेचते हैं.

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यहां अभी 200 एकड़ क्षेत्र में काजू की खेती की जा रही है. बताया जाता है कि यहां के काजू की क्वालिटी भी काफी अच्छी होती है. लेकिन यहां के काजू उत्पादकों को लाभ नहीं हो पाता है. वैसे भी झारखंड की आबोहवा काजू की खेती के काफी अच्छी बतायी जाती है. अगर यहां काजू की खेती को बढ़ावा मिले तो यह देश के काजू उत्पादकों में अपनी जगह बना सकता है.
स्थानीय प्रशासन की ओर से काजू प्रोसेसिंग के प्लांट लगाने की बात कई बार की गयी पर बात कभी आगे बढ़ी नहीं.

समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने करमाटांड़ में बिताये 18-20 साल

बंगाल के प्रसिद्ध समाजसुधारक, विचारक, दार्शऩिक और लेखक ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपनी जिंदगी के अंतिम 18 से 20 साल करमाटांड़ में संथाल आदिवासियों के बीच बिताये.
उन्होंने संथाल आदिवासियों के कल्याण के लिए काफी काम किया. ईश्वरचंद्र विद्यासागर की वजह से इस क्षेत्र आदिवासियों के जीवन में काफी परिवर्तन भी आया. उन्हीं के नाम पर करमाटांड रेलवे स्टेशन का नाम ईश्वरचंद्र विद्यासागर स्टेशन पड़ा.

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