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पोस्टर विवाद पर योगी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटकाः अदालत ने कहा- ये कानूनन सही नहीं

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New Delhi: लखनऊ में सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. दरअसल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लगाए गए वसूली के पोस्टर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हटाने के आदेश यूपी सरकार को दिये हैं. जिसे योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

उच्चतम न्य़ायालय में सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दलील पेश कर रहे हैं. वहीं सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानूनी तौर पर सही नहीं है.

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यह कानूनन सही नहीं- सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण मामला है. न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा कि क्या उसके पास ऐसे पोस्टर लगाने की शक्ति है. लखनऊ में सीएए विरोधी प्रदर्शकारियों के पोस्टरों पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो आपकी इस कार्रवाई का समर्थन करता हो.

सरकार की ओर से दलील रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 95 लोगों की शुरुआती तौर पर पहचान हुई है. उनकी तस्वीरें होर्डिंग पर लगाई गईं. इनमें से 57 लोगों पर लगे आरोप के सबूत भी हैं, और विरोध के दौरान बंदूक चलाने वाला व्यक्ति और हिंसा में कथित रूप से शामिल, गोपनीयता के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है. लेकिन आरोपियों ने अब निजता के अधिकार का हवाला देते हुए हाई कोर्ट में होर्डिंग को चुनौती दी.

आम आदमी की तस्वीर लगाने के पीछे क्या तर्क है?

सॉलिसिटर की दलील पर जस्टिस ललित ने कहा कि अगर सांप्रदायिक हिंसा या लोक संपत्ति नष्ट करने में किसी खास संगठन के लोग सामने दिखते हैं तो कार्रवाई अलग मसला है, लेकिन किसी आम आदमी की तस्वीर लगाने के पीछे क्या तर्क है?

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इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमने पहले चेतावनी दी, फिर सूचना देने के बाद ये होर्डिंग लगाये गये. प्रेस मीडिया में भी इसके बारे में बताया गया.

कानून के तहत चलने के लिए सरकार पाबंद

सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने कहा कि जनता और सरकार में यही फर्क होता है. जनता कई बार कानून तोड़ते हुए भी कुछ कर बैठती है, लेकिन सरकार पर कानून के मुताबिक चलने और काम करने की पाबंदी होती है.

वहीं, जस्टिस ललित ने कहा कि फिलहाल तो कोई कानून आपको सपोर्ट नहीं कर रहा. अगर कोई कानून है तो आप बताइए.

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