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क्या आप कब्रों के बीच बैठ कर करना चाहेंगे कैंडल लाइट डिनर, तो आइये इस शहर में

मशहूर चित्रकार मक़बूल फिदा हुसैन को भी यहां की चाय खूब पसंद है

Ahmadabad : अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन है और भूत प्रेतों पर यकीन नहीं करते हैं या उनसे डरते नहीं हैं तो ये खबर आपके लिए खास है. गुजरात के अहमदाबाद शहर के बीचों-बीच या स्थानीय लोगों की जुबां में कहें तो दिल में स्थित ‘लकी’ बाहर से किसी आम रेस्टोरेंट जैसा ही दिखता है.

लेकिन अंदर कदम रखते ही, टेबल-कुर्सियों की बराबर में बनी कब्रें किसी को भी है चौंका सकती हैं. यहां कुल 25 कब्रें हैं जिनकी वजह से लकी, रेस्टोरेंट कम और छोटा कब्रिस्तान ज्यादा लगता है.

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बताया जाता है कि तकरीबन पांच सौ साल पुरानी ये कब्रें सूफी संत शाह वजीहिउद्दीन (1504-1589) के एक रिश्तेदार हजरत सैयद कबीरुद्दीन और उनके परिवार की हैं.

बरसों से यहां आने वाले लोग बताते हैं कि करीब छह दशक पहले यहां पान और चाय का छोटा सा गल्ला हुआ करता था. पास ही मौजूद दरगाह में जो लोग सुबह-शाम इबादत करने आते, पतीले में खौलती चाय की महक उन्हें खींच लेती.

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प्रतिदिन इतनी होती है बिक्री

वक्त के साथ दूसरे राहगीर भी चाय की उन प्यालियों से जुड़ते गए और इस छोटे गल्ले ने रेस्टोरेंट की शक्ल ले ली. चूंकि इस गल्ले ने अपने मालिक की किस्मत को थोड़े वक़्त में ही बदलकर रख दिया था इसलिए इसका नाम लकी रखा गया. मौजूदा समय की बात करें तो इस रेस्टोरेंट की रोज की अंदाजन कमाई डेढ़ लाख रुपये बताई जाती है .

स्थानीय लोगों का माना है कि छह सौ साल पहले बसे अहमदाबाद की विरासत को लकी रेस्टोरेंट बखूबी सहेजे हुए है . सड़क के उस पार दिखती सीदी सैय्यद मस्ज़िद मानों फ़दीर सैय्यद की हां में हां मिलाती है. कुछ साल पहले अहमदाबाद आए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इस मस्ज़िद में कुछ वक़्त गुज़ारा था.

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हर वर्ग और उम्र के लोग आते हैं

सुबह तकरीबन छह बजे से लेकर रात बारह बजे तक खुले रहने वाले लकी रेस्टोरेंट को जो बात सबसे खास बनाती है वह यह कि यहां न सिर्फ हर उम्र बल्कि समाज के हर तबके और मजहब से जुड़े लोग बिना किसी भेद के साथ बैठे मिल जाते हैं .

इनमें हिंदू और मुसलमानों के अलावा अन्य तमाम समुदायों से भी ताल्लुक रखने वाले लोग होते हैं. टैक्सी ड्राइवर से लेकर विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, छोटे-बड़े व्यवसायी और शहर के नामी सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर पत्रकार और बड़े राजनीतिकार तक सब इनमें शामिल हैं.

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एमएफ हुसैन ने रेस्टोरेंट को पेंटिंग तोहफे में दी थी

मशहूर चित्रकार मक़बूल फिदा हुसैन को भी यहां की चाय बेइंतहा पंसद थी. बताया जाता है कि वे यहां तब से आते थे जब यह जगह गल्ला हुआ करती थी. रेस्टोरेंट के काउंटर पर बैठे एक बुजुर्ग कर्मचारी के मुताबिक जब भी हुसैन साहब अहमदाबाद आते, लकी की चाय पीना न भूलते.

यहां की चाय के लिए हुसैन साहब की दीवानगी इस बात से समझी जा सकती है कि करीब 15 साल पहले उन्होंने इस रेस्टोरेंट को अपनी एक पेंटिंग तोहफे के तौर पर दी थी.

जानकारों के मुताबिक उस समय कई लोगों और आर्ट गैलरियों ने इस पेंटिंग की कीमत पूरे रेस्टोरेंट से ज्यादा तय की थी. लेकिन लकी के मालिकों ने इसे बेचना मुनासिब नहीं समझा. आज भी यह पेंटिंग लकी की शान बढ़ा रही है.

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कब्रों का रखा जाता है विशेष ख्याल

लकी रेस्टोरेंट में मौजूद कब्रों की हिफ़ाजत बहुत ही इख्लास (श्रद्धा) से की जाती है. इन कब्रों को चारों तरफ से रेलिंग के जरिए महफूज किया गया है ताकि जाने-अनजाने कोई ग्राहक इन्हें छू न सकें.

यहां के कर्मचारियों का कहना है कि वे इन कब्रों को हर सुबह साफ कर यहां सुगंधित अगरबत्तियां जलाने के साथ फूल सजाते हैं. लेकिन कुछ मौलाना-मौलवियों को इस तरह कब्रिस्तान में जूते-चप्पल पहनकर आने-जाने और खाने-पीने से सख़्त एतराज़ है.

उनके मुताबिक इस्लाम इस तरह की पाक़ जगह पर यह सब करने की इज़ाजत नहीं देता. हालांकि लकी के चाहने वालों को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता.

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