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कायस्थों ने की भगवान चित्रगुप्त की पूजा अर्चना

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Dhanbad: अखिल भारतीय कायस्थ महासभा चित्रांश परिवार के लोगों ने शुक्रवार को पूरे ब्रह्माड का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त की पूरे विधि-विधान और श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा-अर्चना की. पुरानी स्टेशन नर्मदेश्वर मंदिर के प्रांगण स्थित  चित्रगुप्त मंदिर में स्थापित भगवान की पूजा गणेश पंडित ने करायी. भक्तों ने विधिवत रूप से पूजन-हवन किया. इसके साथ ही कलम और दवात की भी पूजा की गयी. बताया गया कि भगवान चित्रगुप्त सिर्फ कायस्थों के ही पूज्य नहीं हैं, बल्कि हर किसी के आराध्य हैं. पूजा-अर्चना में बैठे भक्तों में उपेंद्र प्रसाद वर्मा, चंद्रभूषण प्रसाद सिन्हा, बृजेंद्र प्रसाद सहाय, अरविंद कुमार, अरविंद कुमार सिन्हा, मनोज कुमार सिन्हा, रौशन कुमार सिन्हा, उपेंद्र प्रसाद सिन्हा, सुधीर कुमार सिन्हा, विजय कुमार सिन्हा, बसंत कुमार लाला, अशोक कुमार श्रीवास्तव, वैद्यनाथ लाल, अमित श्रीवास्तव, शुभम  सिन्हा, मुन्ना कुमार सिन्हा, राजेश कुमार श्रीवास्तव, आदर्श कुमार,  अमलेश कुमार सिन्हा, आर्यन कुमार श्रीवास्तव समेत अन्य लोगों ने हिस्सा लिया.

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क्यों कायस्थ 24 घंटे के लिए नहीं करते कलम का उपयोग

भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण छूट जाने से नाराज भगवान चित्रगुप्त ने कलम रख दी थी. उस समय परेवा काल शुरू हो चुका था. परेवा के दिन कायस्थ समाज कलम का प्रयोग नहीं करते हैं. यानी किसी भी तरह का का हिसाब-किताब नहीं करते हैं. आखिर ऐसा क्यूं है कि पूरी दुनिया में कायस्थ समाज के लोग दीपावली के दिन पूजन के बाद कलम रख देते हैं और फिर  यमद्वितीया के दिन  कलम-दवात पूजन के बाद ही उठाते हैं. इसे लेकर सर्व समाज में कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते हैं. ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिज्ञ कायस्थ युवा पीढ़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है. जब इसकी खोज की गयी तो इससे संबंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ हमें किवदंतियों में मिला.

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कहते हैं जब भगवान राम दशानन रावण का वध कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनकी खड़ाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने  गुरु वशिष्ठ को भगवान राम के राजतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की  व्यवस्था करने को कहा. गुरु वशिष्ठ ने यह काम अपने शिष्यों को सौंप कर राजतिलक की तैयारी शुरू कर दी. ऐसे में जब राजतिलक में सभी देवी देवता आ गये, तब भगवान राम ने अपने अनुज भरत से पूछा, भगवान चित्रगुप्त नहीं दिखाई दे रहे हैं. इस पर जब खोजबीन हुई तो पता चला कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं था जिसके चलते भगवान चित्रगुप्त नहीं आये. इधर, भगवान चित्रगुप्त सब जान  चुके थे और इसे प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे. फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर किनारे रख दिया. सभी देवी-देवता जैसे ही राजतिलक से लौटे तो पाया कि स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे, प्राणियों का  लेखा जोखा न लिखे जाने के चलते यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि किसको कहां भेजें. तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए भगवान राम ने अयोध्या में भगवान विष्णु से स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर का निर्माण कराया. अयोध्या महात्य्म में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है.

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धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिए. अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता है. गुरु वशिष्ठ ने भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गलती के लिए क्षमायाचना की. इसके बाद भगवान राम का आग्रह मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग ४ पहर (२४ घंटे बाद) पुन: कलम दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया. कहते हैं तभी से कायस्थ दिवाली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और यमद्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त और विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते हैं.

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