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World Radio Day : मिलिये जंग बहादुर सिंह से, रेडियो सुनने की दीवानगी ऐसी कि गोलपहाड़ी को सात समंदर पार पहुंचा दिया

बीवी के आने पर भी नहीं छूटा बीबीसी का साथ, पिता के रेडियो प्रेम ने बेटी को बनाया रेडियो जॉकी, कहते हैं - रेडियो ने बताया समय का महत्व

Avinash, Jamshedpur : अगर आप रेडियो सुनते हैं तो गोलपहाड़ी जमशेदपुर के जंग बहादुर सिंह का नाम जरूर सुना होगा. सिंह की रेडियो सुनने की दीवानगी ने गोलपहाड़ी को हिन्दुस्तान ही नहीं, सात समंदर पार पहुंचा दिया. विशेष रूप से समाचार और सामयिक विषयों के कार्यक्रम को सुनने वाले जंग बहादुर सिंह को दुनिया की सबसे बड़ी प्रसारण सेवा बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकॉस्टिंग ऑपरेशन) की हिंदी सेवा ने सबसे जागरूक श्रोता का अवार्ड भी दिया है. वे बताते हैं – रेडियो ने उनकी जिंदगी बदल दी. इसकी वजह से वे न केवल अपनी जिंदगी को अनुशासित बना पाये, बल्कि समय प्रबंधन के महत्व को भी जाना. भले ही सूचना प्रौद्योगिकी के चलते आज दूसरे माध्यम हावी हो गये हैं, लेकिन जंग बहादुर सिंह आज भी रेडियो उतने ही चाव से सुनते हैं, जितने 45 साल पहले सुनते थे. नौकरी की तमाम व्यस्तता के बावजूद औसतन ढाई घंटे हर दिन बीबीसी समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रसारणों को देते हैं. बकौल सिंह, आज भी रेडियो सुनने के जज्बे में कोई कमी नहीं आई है. बल्कि और बढ़ गयी है. जब सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई है, वैसे में आज भी बीबीसी की विश्वसनीयता सबसे ज्यादा है. पिछले साल हिंदी सेवा के बंद होने के बाद अब वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम सुनता हूं.

इमरजेंसी के दौरान रेडियो सुनना शुरू किया

बकौल जंग बहादुर सिंह, बहुत कम उम्र में ही रेडियो का सक्रिय श्रोता बन गया. 70 के दशक में परसुडीह में हाट लगता था. हम उस हाट में जाते थे, क्योंकि अफगानिस्तान के बहुरूपिया हाट में खेल दिखाने आते थे. एक दिन यह खेल देखकर शाम को घर लौट रहा था, तभी देखा कि रमा सिंह की आटा चक्की पर 8-10 लोग कान लगाये रेडियो पर कोई प्रोग्राम सुन रहे है. लोगों की यह मुद्रा देखकर जानने की जिज्ञासा हुई. उनके पास जाकर पूछा-तो बताया गया कि बीबीसी का कार्यक्रम चल रहा है. किसी ने बताया कि सबसे सही खबर यहां पर आती है. फिर क्या था-मैं भी अपने रेडियो पर बीबीसी सुनने लगा. अमूमन बीवी आने के बाद लोगों का बीबीसी से नाता छूट जाता है, लेकिन मेरा नाता छूटा नहीं, बल्कि बीवी भी बीबीसी की सक्रिय श्रोता बन गयी. घर में रेडियो का माहौल ऐसा था कि बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई, तो उसने भी बीबीसी में नौकरी करने का अपना गोल बना लिया. यह बात अलग है कि वह बीबीसी नहीं जा सकी. लेकिन आज वह कोलकाता में एक प्राइवेट रेडियो स्टेशन में सफल आरजे हैं. जंग बहादुर सिंह बताते हैं – बेटी का बीबीसी में काम करने का सपना तो साकार नहीं हो पाया, लेकिन सप्ताह भर पहले ही उसने बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो का विजिट किया है.

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जब एक बुजुर्ग धनबाद से मिलने आये…

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जंग बहादुर सिंह की रेडियो जॉकी बेटी स्मृति सिंह बीबीसी दिल्ली कार्यालय में प्रस्तोता मोहन लाल शर्मा के साथ.

जंग बहादुर सिंह ने बताया कि भारत ही नहीं, दुनिया भर के श्रोता उनके पास पत्र भेजते हैं और उनके बारे में जानना चाहते हैं. एक बार वे घर में रेडियो सुन रहे थे, तभी एक बुजुर्ग आदमी दरवाजे पर आये. मैंने दरवाजा खोला तो उन्होंने पूछा-जंग बहादुर सिंह का घर यही है. मैंने उन्हें बताया-जी बिल्कुल, बताइये. उन्होंने कहा-आपसे नहीं, आपके पिताजी जंग बहादुर सिंह से मिलना है. मैंने कहा-मैं ही जंग बहादुर सिंह हूं. वे विश्वास नहीं कर रहे थे, कि इतनी कम उम्र का कोई आदमी पिछले 40 साल से रेडियो सुन रहा है. जब मैंने बताया कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में रेडियो सुनना शुरू कर दिया था, तो फिर उन्हें विश्वास हुआ.

जमशेदपुर में और भी हैं कई श्रोता

जमशेदपुर में रेडियो श्रोताओं की एक लंबी फेहरिस्त है. बाजाब्ता जमशेदपुर श्रोता संघ है, जो समय-समय पर रेडियो को लेकर विभिन्न कार्यक्रम का आयोजन करता रहता है. जमशेदपुर रेडियो श्रोता संघ के अध्यक्ष भारत भूषण दोस्त हैं, जो पिछले 60 साल से रेडियो सुन रहे हैं. रेडियो सिलोन से लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्टेशनों को भी सुनते हैं. कदमा के चिन्मय महतो तो हर साल विश्व रेडियो दिवस पर रेडियो की प्रदर्शनी लगाते हैं. उन्होंने 1974 में अपने रेडियो क्लब की स्थापना की और लगभग 25 देशों के प्रसारण को सुनते हैं.

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