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विश्व की जनसंख्या 7.6 अरब, 8.3 करोड़ प्रति वर्ष की रफ्तार से हो रहा है आबादी का विस्फोट

United nations : आज 11 जुलाई है. पूरे विश्व में हर साल 11 जुलाई को जनसंख्या दिवस मनाया जाता है. बता दें कि 2017 में यूएन के आर्थिक और सामाजिक मामले विभाग के जनसंख्या प्रकोष्ठ ने अपनी रिपोर्ट में विश्व के 233 देशों की आबादी के बारे में जानकारी दी गयी है. यूएन ने विश्व की बढ़ती आबादी और मृत्यु दर के आधार पर रिपोर्ट जारी की थी, उसके अनुसार वर्तमान में विश्व की जनसंख्या 7.6 अरब से ज्यादा है. जनसंख्या 2030 तक बढ़कर 8.6 अरब और वर्ष 2050 तक 9.8 अरब होने की उम्मीद जताई गयी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर जनसंख्या इसी गति से बढ़ती रही तो सदी के अंत तक विश्व की जनसंख्या 11.2 अरब हो जायेगी. इस समय विश्व की आबादी 8.3 करोड़ प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रही है.

11 जुलाई 1989 को भारत में बढ़ती जनसंख्या को लेकर मंथन शुरू हुआ था

बता दें कि आज के दिन ही 1989 में भारत में बढ़ती जनसंख्या को लेकर मंथन शुरू हुआ था. उसके बाद से हर 10 साल में देश की आबादी की गणना की जाती है. इसी जनगणना के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाएं बनाती हैं. जनसंख्या दिवस मनाने का उद्देश्य लोगों को बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणामों से सचेत करना और उन्हें परिवार नियोजन के बारे में सही जानकारी देना है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी एक अरब 21 करोड़ है, जो चीन से महज 10 करोड़ ही कम है.

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विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी

एक आकलन के अनुसार अगले छह सालों में हम आबादी के मामले में चीन को पीछे देंगे. विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है, जबकि हमारे पास दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी ही जमीन है. यही कारण है कि आज करोड़ों भारतीय बुनियादी सुविधाओं से मरहूम हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या चिंताजनक है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इसी तरह देश की आबादी बढ़ती रही तो साल 2025 तक चीन की जनसंख्या से भारत आगे निकल जायेगा. देश के राज्य उत्त्तर प्रदेश की बात करें, तो इसकी आबादी करीब 21 करोड़ है, जो ब्राजील की आबादी के बराबर है.

भारत में 22 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 22 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, देश की 15 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, इनमें बच्चों की संख्या 40 फीसदी है. 65 फीसदी आबादी के पास शौचालय नहीं है, जबकि 26 फीसदी आबादी अभी भी निरक्षर है. हर साल एक करोड़ से अधिक नये लोग रोजगार की तलाश में बाजार आते हैं. इन सबका कारण बढ़ती जनसंख्या है. अस्पतालों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं. बेहतर शिक्षा के इंतजाम नहीं हैं. संसाधनों की कमी है.

ट्रेनों के टिकट महीनों पहले बुक हो जाते है. डॉक्टर्स के मरीजों की संख्या इतनी होती है कि वह सभी मरीजों को देख नहीं पाते हैं. संसाधनों के अभाव में मरीज बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं. अगर स्थिति नियंत्रित नहीं हुई तो हालात और भी मुश्किल ही होंगे. ऐसा नहीं है कि बढ़ती आबादी पर सरकार ने नीतियां नहीं बनाई या मंथन नहीं किया. बदलते वक्त में हालात काफी सुधरे भी हैं. लेकिन ये नाकाफी हैं. भले ही शहरों (जन्म दर 1.8) में गांवों (2.5) की अपेक्षा जन्म दर में कमी आयी है, लेकिन बढ़ती आबादी चिंता का सबब है.

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