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World Book Day: जानिए बिहार की इस लाइब्रेरी के बारे में जिसने गांव के हजारों युवाओं की जिंदगी बदल दी

Sanjay Prasad
बिहार में एक ऐसी लाइब्रेरी है, जिसने हजारों जिंदगियां बदली है. नाम है विद्या मंदिर पुस्तकालय. बिहार के सीवान जिले के पंजवार गांव में स्थित यह लाइब्रेरी आजादी के पहले की है. गांव के दो युवा मधुसूदन पांडेय और सत्यनारायण मिश्रा ने चंद किताबों की बदौलत इसकी नींव डाली थी. धीरे-धीरे इस पुस्तकालय की लोकप्रियता बढ़ती गई और आसपास के गांव के युवाओं के ज्ञान का केन्द्र बन गया. सत्यनारायण मिश्रा ने इस पुस्तकालय से पढ़ाई कर मैट्रिक परीक्षा में पूरे बिहार में अव्वल रहे. बाद में मिश्रा जी बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के चेयरमैन बने.

शायद यह पुस्तकालय 80 साल का सफर तय नहीं कर पाता, अगर इसे घनश्याम शुक्ला जैसे सुधी पाठक का साथ नहीं मिलता. इस पुस्तकालय ने श्री शुक्ला की जिंदगी बदल दी. उन्होंने पहली बार जाना कि जिंदगी में पुस्तकों का क्या महत्व है. खंडहर हो चुके पुस्तकालय को नया भवन देकर उन्होंने पुस्तकों की समृद्ध विरासत को मेरे जैसे युवाओं तक पहुंचाया. मुझे आज भी याद है कि जब गांव में दूसरे युवा ताश के पत्तों पर अपनी जिंदगी कुर्बान किया करते थे, मैं भरी दोपहरी में इस पुस्तकालय में बैठ देश-दुनिया के लेखकों की किताबें पढ़ता था. इस पुस्तकालय ने न केवल मेरी जिंदगी बदली बल्कि दुनिया को देखने का नजरिया बदल दिया. इसी पुस्तकालय में मैंने फ्रेंच लेखिका सिमोन द बोउआर की मशहूर पुस्तक सेकेंड सेक्स पढ़ी थी, जिसका निचोड़ यह था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है. स्त्री को लेकर भारतीय समाज में जो मान्यताएं हैं, उसे इस पुस्तक ने तोड़ा और महिलाओं को देखने की एक नई दृष्टि दी.

इसी पुस्तकालय में मैंने अमृता प्रीतम की आत्मकथा रसीदी टिकट पढ़ी थी. साहिर और इमरोज के प्रति अमृता के प्रेम ने बताया कि मोहब्बत जिस्मानी न होकर रूहानी ज्यादा होता है. इसी लाइब्रेरी में मैंने धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता पढ़ा था. इस उपन्यास का एक-एक पन्ना मोहब्बत के अहसासों से इस कदर सराबोर था कि आंखों से अनवरत निकलते आंसू और सिसकियां दिल में जज्ब हो जाती थी. इसी पुस्तकालय में प्रेमचंद के अधिकतर उपन्यास पढ़े थे. इन उपन्यासों को पढ़ते हुए इसके ग्रामीण पात्र हमारे आसपास के लगते थे. इसी पुस्तकालय में मैंने भगवती चरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा को पढ़ा था. इस पुस्तक ने बताया कि दुनिया में पाप-पुण्य देखने का नजरिया है. आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि अगर मेरी जिंदगी में यह पुस्तकालय नहीं होता तो मैं पत्रकारिता में नहीं आ पाता.

Sanjeevani

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