न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

सखी सहेली समूह कर रहा ग्रामीण महिलाओं को जागरूक

आठ सालों के प्रयास के बाद महिलायें जान रहीं अधिकार  

51

Chhaya

Ranchi :  अवसर परस्त समाज में महिलाओं को खुद को साबित करना और बराबरी का अधिकार पाना कितना मुश्किल है, इस बात को महिलाओं से बेहतर कोई नहीं समझ सकता है. वो भी सुदूर गांव की महिलाओं के लिये अपने अधिकार को समझना तो और भी ज्यादा मुश्किल है. महिला अधिकार और शोषण से मुक्ति पाने के लिये यह जरूरी है कि ग्रामीण महिलाओं को जागरूक किया जाये. महिलाओं के जागरूकता के लिये ही सखी सहेली समूह की लड़कियां काम कर रही है. जो पिछले आठ सालों से आशा एनजीओ के साथ मिलकर गांवों का भ्रमण कर रही हैं और महिलाओं व युवतियों को उनके अधिकार के प्रति जागरूक कर रही हैं. इस एनजीओ की संस्थापक सदस्य शुभा  तिर्की ने जानकारी दी कि, समूह की स्थापना के लिये कई नाम सोचे गये. लेकिन इस नाम को उपर्युक्त समझा गया, क्योंकि यह नाम महिलाओं और युवतियों के बीच काफी प्रचलित रहता है. खूंटी के गांवों में सखी सहेली समूह का अधिक प्रभाव देखा जा रहा है.

इसे भी पढे़ं : आठ नवंबर : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया नोटबंदी का ऐलान

लालखटंगा गांव से हुई शुरूआत:  शुभा ने बताया कि कई बार गांवों में महिलाओं और युवतियों से बात करने पर पता चलता था कि महिलाएं अपने अधिकार के प्रति जागरूक नहीं है. साथ ही बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने की वजह से राजधानी के आसपास की ग्रामीण महिलाओं को भी उनके अधिकार की जानकारी भी नहीं होती थी. ऐसे में कुछ समाज सेवियों के साथ मिलकर सखी सहेली समूह बनाने का निर्णय लिया गया. जिसकी शुरूआत 2011 में 500 युवितयों के साथ रांची से सटे लालखंटगा गांव से की गयी.

इसे भी पढे़ं :  दिल्ली में गुरुवार को हवा की गुणवत्ता खराब श्रेणी में रहने का अनुमान

खेल को बनाया संवाद का जरिया

उन्होंने बताया कि रांची के विभिन्न गांवों में काम करने के बाद खूंटी जिला के कुछ गांवों में सदस्य जोड़ने की कोशिश की गयी. लेकिन उस दौरान युवतियां बात भी नहीं करना चाहती थीं. ऐसे में माताओं को इस पहल से जोड़ा गया, लेकिन माताएं भी महिलाओं से जुड़े मामलों पर खुलकर बात नहीं करना चाहती थीं. ऐसे में देखा गया कि गांव की युवतियां फुटबॉल में ज्यादा रूचि रखती हैं. तो गांवों में युवतियों के बीच खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करके संवाद स्थापित किया गया. तब जाकर माताएं भी खुलकर बात करने लगीं.

इसे भी पढे़ं :  योगी आदित्यनाथ ने कहा – अब फैजाबाद नहीं अयोध्या कहलायेगा जिला, एयरपोर्ट भगवान राम के नाम पर

सामने आये कई मुद्दे

युवतियों से बात करने के दौरान समूह को जानकारी हुई कि तस्करी, बाल विवाह, असुरक्षित प्रवास ही सिर्फ ग्रामीण युवतियों की समस्या नहीं है. बल्कि घर में माता-पिता के बीच संवाद की कमी, घरेलू हिंसा आदि भी कई ऐसे मामले हैं, जो युवतियों को तस्करी जैसे गर्त में धकेल देता है. ऐसे में समूह ने सबसे पहले महिलाओं को घरेलू हिंसा से उबारने और महिला अधिकार की जानकारी देनी शुरू की.

इसे भी पढे़ं : प्रलंयकारी बाढ़ पर आधारित फिल्म ‘केदारनाथ’ पर मचा बवाल, अंतरंग दृश्यों पर आपत्ति

हिंसा को हिंसा नहीं समझती महिलाएं

शुभा ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या है कि वे घरेलू हिंसा को हिंसा नहीं समझतीं. उनका मानना है कि घरेलू हिंसा उनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है. वहीं समझ की कमी की वजह से भी महिलाएं ऐसी समस्याओं पर बात नहीं करना चाहती थीं. उन्होंने कहा कि ऐसे में काफी समझाने के बाद महिलाएं अब अपने अधिकारों को समझ पा रही हैं  और अब खुलकर बात भी कर रही हैं.

इसे भी पढे़ं : 11 महीने से लटकी है टाउन प्लानर की नियुक्ति, सूडा ने 13 दिसंबर 2017 को ही निकाला था विज्ञापन

गांवों में बाल विवाह के कुप्रभाव

इस बारे में एनजीओ के सदस्यों ने जानकारी दी कि घरेलू हिंसा के बाद बाल विवाह भी काफी देखा जाता है. जिसके कई कुप्रभाव बच्चियों और युवतियों में बढ़ते उम्र के साथ देखा गया है. ग्रामीण इसे अपराध नहीं समझते. लोहरदगा की सुमरी कुमारी नाम की एक बच्ची ने जानकारी दी कि उसके गांव में बाल विवाह बुरी तरह फैला हुआ है. अगर वह इस समूह से नहीं जुड़ती, तो उसका भी बाल विवाह कर दिया जाता.

इसे भी पढे़ं :  कौन है शिव शक्ति बख्शी? जिसकी चर्चा से गिरिडीह लोकसभा की टिकट के दावेदारों के होश उड़ रहे हैं 

जुड़ी है 4000 युवतियां

समूह की शुरूआत भले ही पांच सौ युवतियों के साथ की गयी हो. लेकिन वर्तमान में 4000 युवतियों ने इसका दामन थाम लिया है. समूह राज्य के चार जिलों रांची, खूंटी, लोहरदगा, सरायकेला खरसांवा में कार्यरत हैं. समूह से जुड़ने वाली युवतियों की अधिकतम उम्र 24 साल तक है. जबकि अब कुछ युवक भी इस समूह से जुड़कर महिला मामलों के प्रति युवतियों को जागरूक कर रहे हैं. अब तक 200 युवक समूह के सदस्य बन चुके हैं.

इसे भी पढे़ं : मंत्री रणधीर सिंह के साथ गाली-गलौज, लोगों ने कैसे धक्का-मुक्की कर मंच से उतारा देखें वीडियो

तस्करों की पकड़ में नहीं आ रही युवतियां

शुभा ने बताया कि गांवों में तस्करों को पकड़ना काफी मुश्किल होता है. ऐसे में जरूरी है कि ग्रामीणों के साथ मेल-मिलाप भी काफी जरूरी है. ऐसे में काफी मेहनत के बाद सदस्यों ने ग्रामीणों के बीच एक जगह बनायी. अब जिन गांवों में सखी सहेली के सदस्य ज्यादा सक्रिय हैं, वहां ग्रामीण या युवतियां खुद तस्करों को भांप ले रही हैं. साथ ही मजदूरी आदि करने के लिये भी अब युवतियां बाहर नहीं जाना चाहती हैं. उन्होंने बताया कि अब तक लगभग 18 से 20 युवतियों को तस्करी या असुरक्षित प्रवास से बचाया जा चुका है. अब युवतियां खुद ऐसे लोगों के बारे में जानकारी देती हैं.

इसे भी पढे़ं : नोटबंदी : दूसरी सालगिराह पर पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा- तबाही का असर अब स्पष्ट हो चुका है

बच्चियों और युवतियों का प्रशिक्षण

समूह की ओर से युवतियों और बच्चियों को ट्रेनिंग भी दिया जाता है. जिसमें आर्ट क्राफ्ट डिजाइनिंग, सिलाई-कढ़ाई, आचार-पापड़ बनाना आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके साथ ही खुद के भय को दूरकर पंचायत स्तर पर ग्रामीणों के समक्ष बोलने और ग्रामीणों को प्रोत्साहित करने का भी प्रशिक्षण दिया जाता है. जिससे बच्चियां और युवतियां आत्मनिर्भर बन सकें. शुभा ने बताया कि कई गांवों में महिलाएं भी प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं.

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.


हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Open

Close
%d bloggers like this: