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स्त्री और सूरज

सूरज के रथ में जुती रहती है स्त्री. 

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स्त्री और सूरज
Neeraj Neer

सूरज के रथ को

नहीं खींचते हैं घोड़े

सूरज घूमता है

भूख की धूरी  पर

और उसके रथ में जुती रहती है स्त्री. 

स्त्री अपनी छाती का दूध पिलाकर

सूरज को बख्शती है रौशनी

और अपने प्रेम से भरती है

उसमें उष्णता. 

स्त्री जब उसे छुपा लेती है

अपनी पलकों के नीचे

सूरज मूँद लेता है अपनी आँखें

और सो जाता है निश्चिंत

जैसे माँ की गोद में सो जाता है

नन्हा बच्चा 

और जब स्त्री 

सूरज को रखती है

अपनी हथेलियों पर

सूरज मुस्कुराता हुआ

खोल देता है अपनी आँखें 

रक्तिम हो उठते हैं उसके नन्हें गाल

जगत भर जाता है

उर्जा और उजास से 

स्त्री के ख़त्म होते ही

सूरज खो देगा

अपनी चमक और गति

सृष्टि  भी अपनी जगह

कायम नहीं रह पायेगी

स्त्री का बचे रहना जरूरी है

ताकि सूरज घूमता रहे

अपनी धूरी पर अनवरत

और बची रह सके सृष्टि…

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