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JEE एडवांस का सिलेबस जारी होने के साथ ही उम्मीदों का सफर शुरू, मगर क्या आप जानते हैं कितनी खतरनाक है आइआइटियन बनानेवाली कोटा फैक्ट्री – 1

Avinash

Sanjeevani

जेईई एडवांस का सिलेबस जारी होने के साथ ही आईआईटी में दाखिले की दौड़ शुक्रवार से शुरू हो गयी. इसके साथ ही जमशेदपुर, रांची और बोकारो सरीखे देश के दूसरे और तीसरे टियर के शहरों के उन पेरेंट्स की उम्मीदों का सफर भी शुरू हो गया है, जो हर हाल में अपने बच्चों में आइआइटियंस का चेहरा तलाशना शुरू कर देते हैं. लेकिन पढ़ाई के बोझ और माता-पिता की महत्वाकांक्षा तले कई बार बच्चे अपनी जान तक दे देते हैं. हाल ही में कोटा में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का सुसाइड नोट आईआईटीयन बनने की इस अंधी दौड़ के साथ हमारे एजुकेशन सिस्टम पर ही सवाल खड़ा करता है, जिसमें एक परीक्षा ही जिंदगी के लिए जीने-मरने का मकसद बन जाती है. पढ़ें यह रिपोर्ट –

MDLM

Jamshedpur : जेईई एडवांस का  सिलेबस जारी होने के साथ ही आईआईटी में दाखिले की दौड़ शुक्रवार से शुरू हो गयी. इस साल आईआईटी बांबे द्वारा आयोजित हो रही इस परीक्षा के लिए जमशेदपुर, रांची और बोकारो सरीखे देश के दूसरे और तीसरे टियर के शहरों के पेरेंट्स की उम्मीदों का सफर भी शुरू हो गया है, जो हर हाल में अपने बच्चों में आइआइटियंस का चेहरा तलाशना शुरू कर देते हैं. लेकिन पढ़ाई के बोझ के साथ माता-पिता की महत्वाकांक्षा भी इस कदर बढ़ जाती है कि बच्चे कई बार अपनी जान तक दे देते हैं. हाल ही में कोटा में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि वह कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाइड करने से रोकने में सफल हुई, लेकिन खुद को ही ऐसा करने से नहीं रोक सकी. बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की जिसके 90 प्लस मार्क्स हो, वह सुसाइड भी कर सकती है, लेकिन मैं आप लोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में अपने पैरेंट्स के लिए कितनी नफरत भरी है. कृति का यह सुसाइड नोट आइआइटियन बनने की इस अंधी दौड़ के साथ हमारे एजुकेशन सिस्टम पर ही सवाल खड़ा करता है, जिसमें एक परीक्षा ही पूरे परिवार के लिए जीने-मरने का सवाल बन जाती है.

एक परीक्षा हमारी जिंदगी का फैसला नहीं कर सकती  : डॉ  संजय अग्रवाल

डॉ संजय अग्रवाल

टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) के मनोचिकित्सक डॉ.संजय अग्रवाल कहते हैं – कोई एक परीक्षा हमारी जिंदगी का फैसला नहीं कर सकती. जिंदगी सौ मीटर की रेस नहीं, बल्कि मैराथन दौड़ है. एक परीक्षा में सफल नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि हम बेकार हैं और कुछ कर ही नहीं सकते. कभी भी एक परीक्षा को जीने-मरने का मकसद नहीं बनाना चाहिए. पेरेंट्स को चाहिए कि वे अपनी महत्वाकांक्षा बच्चों पर नहीं थोपें. हर स्टूडेंट की क्षमता एक समान नहीं होती. मैं भी चाहता था कि मेरा बेटा आईआईटी से इंजीनियरिंग करे, लेकिन जेईई मेन में उसका रैंक बहुत अच्छा नहीं था. मैंने कोई दबाव नहीं डाला और आज वह देश के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई कर रहा है. बकौल डॉ.अग्रवाल, जेईई एडवांस में सफल होने के बाद आप आईआईटी में पढ़ाई कर सकते हैं. लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आप जिंदगी में बाकी लोग से ज्यादा सफल रहेंगे. आप देखियेगा कि प्राइवेट या एनआईटी के पढ़े स्टूडेंट्स अपने करिअर में आईआईटी से पढ़े स्टूडेंट्स से आगे हैं. टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन ने  एनआईटी से पढ़ाई की है और उनके अंदर सैकड़ों आइआइटीयंस काम कर रहे हैं.

2009 की इंडिया टॉपर ने बाहर से पढ़ाई की

निशि आनंद

2009 में आईसीएसई की इंडिया टॉपर रही कारमेल जूनियर कॉलेज सोनारी की छात्रा निशि आनंद के पिता डॉ बीएन प्रसाद कहते हैं-मैं भी चाहता, तो बेटी को आईआईटी की तैयारी कराता, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. बेटी ने दसवीं बोर्ड के बाद इंटरनेशनल बोर्ड आईबी से बारहवीं की परीक्षा पास की और इसके बाद अमेरिका की जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. भारत और अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में काफी फर्क है. आईआईटी का गोल्ड मेडलिस्ट घर का एक सर्किट ठीक नहीं कर पाता. इस पढ़ाई का क्या फायदा है? यहां की पढ़ाई प्रैक्टिकल नहीं है, जबकि यूएस जैसे देशों की पढ़ाई प्रैक्टिकल है, जो नौकरी में जाने के बाद सहायक होती है. भारत के इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों का नौकरी में जाना हनुमान जीस की कूद के समान होता है, क्योंकि एकेडमिक्स और इंडस्ट्री के बीच तालमेल नहीं होता. आईआईटी बांबे से पढ़ाई कर अमेरिका में एक कसलटेंसी फर्म में काम करने वाले एक युवक ने चार साल पहले दफ्तर में ही आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि इंडस्ट्री के दबाव को वह बर्दाश्त नहीं कर सका.

जेईई के टॉपर ने आईआईटी से पढ़ाई नहीं की

अभिनव कुमार

1998 में आइआइटी के ऑल इंडिया टॉपर रहे लोयोला के छात्र अभिनव कुमार ने आइआइटी में दाखिला लेने की बजाय एमआईटी (मेसाचुसेट्स इंस्ट्यूटीट ऑफ टेक्नोलॉजी) में दाखिला लिया. पिता अरुण कुमार कहते हैं – अमेरिका और भारत के एजुकेशन सिस्टम में काफी फर्क है. अब नयी शिक्षा नीति से उम्मीद की जा रही है कि एकेडमिक्स और इंडस्ट्री के बीच का अंतर कम होगा, लेकिन आज भी बाहर की यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाले स्टूडेन्ट्स की सफलता दर काफी ज्यादा होती है. आइआइटीयंस भी मास्टर और पीएचडी अपने देश में करने की बजाय विदेशी यूनिवर्सिटी से करना पसंद करते हैं.

80 फीसदी भारतीय इंजीनियर नौकरी के लायक नहीं

2019 में एस्पायरिंग माइंड्स ने वार्षिक रोजगार सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा था कि 80 फीसदी भारतीय इंजीनियर, नॉलेज इकोनोमी में किसी भी नौकरी के लिए फिट नहीं हैं और उनमें से केवल 2.5 फीसदी के पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तकनीकी कौशल है जिसकी उद्योग को आवश्यकता है. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले नौ वर्षों में भारतीय इंजीनियरिंग स्नातकों की रोजगार की संभावनाओं में कोई बदलाव नहीं आया है. उनमें से केवल कुछ ही अगली पीढ़ी के तकनीकी कौशल रखते हैं.

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