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क्‍या राजनीतिक दल आदिवासी इलाकों के जनसवालों को चुनावी मुद्दा बनायेंगे?

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Pravin kumar

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Ranchi : लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को आदिवासियों के जनसवालों से जूझना पड़ सकता है. पिछले पांच सालों में आदिवासियों ने अपनी समस्‍याओं को समय-समय पर उठा कर जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया है. चुनावी समर में आदिवासी इन सवालों को पूछेंगे ही.

आदिवासियों को उनका हक अब तक नहीं मिला. जल, जंगल, जमीन पर हक के अलावे विभिन्न सामाजिक सुरक्षा और संविधान के उन अधिकारों से जुड़ा है. लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी ने इन समस्‍याओं को दूर नहीं किया है. या यूं कहें कि अपने को दूर रखा. कोई भी दल अपने प्रत्याशियों को इन सवालों की कसौटी से गुजरने भी नहीं देना चाहती है.

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प्रत्याशी चाहते हैं कि वे चुप रहे तो बेहतर होगा

क्षेत्रीय दल व झारखंड नामधारी दलों ने जरूर कुछ क्षेत्रीय सवालों को उठाने की कोशिश की, रणनीति बनायी, लेकिन वे भी इस खतरे से वाकिफ है. क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता भी इन सवालों को ले कर घेरे में है. उन्हें यह भी डर है कि उनके सवाल उठाने पर कहीं उन्हे कॉरपरेट घराने चंदे से महरूम न कर दें. इसके कारण नेताओं और प्रत्याशी चाहते हैं कि वे चुप रहे तो बेहतर होगा. तमाम राजनीतिक दलों में यह अंदेशा भी दिख रहा है कि उनके राजनीतिक और गैर-परंपरागत वोट हासिल करने के अभियान पर सामाजिक सवाल हावी न हो जाये.

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झारखंड के आदिवासियों के लिए लोकसभा चुनाव में क्या हैं अहम मुद्दे?

आदिवासी इलाकों की राजनीति मुद्दे देश के अन्य इलाकों से अलग रहते है. राज्य के आदिवासी राज्य में अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. यह समूह के समाने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत और अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखते हुए विकास के मार्ग में अग्रसर होना रहा है. क्या आदिवासीयों के उन मुद्दे को राजनीतिक दल अपना एजेंडा बनयेंगे, जिसके विरोध में पिछले 5 सालों से झारखंड के आदिवासी समूह संघर्ष कर रहा है. जिसमें कई ऐसे विषय भी हैं जो कि संविधान प्रदत है.

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क्या है खास राज्य के आदिवासी समूहों के सवाल

आदिवासियों के लिए जल, जंगल, जमीन पर जन का अधिकार अहम मुद्दा तो है ही. इसके साथ-साथ राज्य के आदिवासियों के सरोकार से जुड़ा विषय लैंड बैंक, भूमि अधिग्रहण कानून, धर्म स्वतंत्र विधायक, आदिवासी धर्म कोड (सरना धर्म कोड की मांग), नगर निकाय, जिला परिषद और नगर निगम क्षेत्र का विस्तार, जमीन रक्षा संबंधी कानून (सीएनटी-एसपीटी एक्ट) रहने के बाद भी आदिवासी भूमी गैर आदिवासियों के द्वारा हथिया लिया जाना. अनुसूचि क्षेत्र में बाहारी आबादी का बढ़ना, आरक्षण, पंचवी अनुसूची, पेसा कानून, वन क्षेत्र से बेदखली(वन अधिकार कानून का सही रूप में लागू न होना) समता जजमेंट, विस्थापन, पलायन, कुपोषण, शिक्षा, छात्रवृति की राशि में कमी, एसटी,एससी एट्रोसिटी में संशोधन का प्रयास, स्थानीय नीति में बदलाव की मांग, आदिवासी भाषा पर संकट जैसे मुद्दे आदिवासी अस्तित्व से जुड़ा हुआ है.

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राज्य में उपरोक्त विषयों को लेकर पिछले 5 सालों में अलग-अलग समय पर प्रतिरोध के स्वर भी उभरे हैं, जिसमें राज्य के राजनीतिक पार्टियों का भी  समर्थन मिला. लेकिन लोकसभा चुनाव में इन मुद्दों को राजनीतिक मुद्दे राजनीतिक दल बनायेंगे, यह चुनाव के दौरान प्रचार में ही सामने आयेगा. क्योंकि जो राष्ट्रीय पार्टी चुनाव लड़ रही हैं उन्‍होंने अब तक चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं किया है. देखना होगा चुनावी घोषणा पत्रों में अन्य मुद्दों की तरह आदिवासी मुद्दे शामिल रहते हैं की नहीं.

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