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#BJP: क्या भीतरघात से बच पायेंगे भाजपा में शामिल हुए विपक्ष के पांचों विधायक, मामला बड़ा नजदीकी है!

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: जाहिर तौर पर दूसरी पार्टी से बीजेपी में आये विधायकों ने टिकट की गारंटी ले ली होगी, तभी उन्होंने अपने दल को राम-राम कहा है. लेकिन जिन विधायकों ने बीजेपी  में एंट्री ली है, उनके लिए आनेवाला चुनाव इतना भी आसान नहीं होनेवाला है.

पहले से क्षेत्र में अच्छी तरह से जमे विधायक की दावेदारी करनेवाले उम्मीदवार इतनी आसानी से अपनी दावेदारी जाने नहीं देंगे.

पहले तो वो टिकट के लिए पार्टी पर दवाब बनायेंगे. अपनी सालों की ईमानदारी की दुहाई देंगे. लेकिन बात नहीं बनने पर भीतरघात न हो इसकी गारंटी काफी कम है.

देखा जाये तो पांचों विधानसभा क्षेत्र में पहले के बीजेपी के उम्मीदवार काफी मजबूत नजर आ रहे थे. जानिए क्यों हो रही है आनेवाले चुनाव में भीतरघात की बात.

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भवनाथपुर: अनंत प्रताप देव क्या इतनी आसानी से हथियार डाल देंगे

भवनाथपुर की बात की जाये तो यहां आनेवाले चुनाव में काफी कुछ देखने को मिल सकता है. हाल ही में भवनाथपुर  के मौजूदा विधायक भानू प्रताप शाही  ने बीजेपी का दामन थामा है.

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लिहाजा चुनाव में बीजेपी से टिकट का वादा जरूर मिला होगा. वहीं दूसरी तरफ यह बात हो रही है कि हो सकता है कि आगामी चुनाव में भानू खुद न खड़े होकर अपनी पत्नी को चुनाव में उतारे.

ऐसा करने के पीछे उन पर चल रहे मुकदमे हो सकते हैं. 2009 चुनाव की बात की जाये तो कांग्रेस में रहते हुए अनंत प्रताप देव ने भानू प्रताप शाही को काफी आसानी से हराया था.

अनंत प्रताप देव को 54690 और भानू प्रताप शाही को 32,522 वोट मिले थे. जीत का अंतर 22,168 वोट था. जो एक विधानसभा चुनाव जीतने के लिए काफी सम्मानजनक माना जाता है.

वहीं 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी से चुनाव लड़ते हुए अनंत प्रताप देव भानू प्रताप शाही से चुनाव हार गये थे. अनंत प्रताप देव को 56,247 और भानू प्रताप शाही को 58,908 वोट मिले थे. लेकिन अंतर महज 2,661 वोटों की ही था.

ऐसे में कहा जा सकता है कि अनंत प्रताप देव कोई कमजोर उम्मीदवार  में से नहीं थे. आनेवाले चुनाव में एक बार फिर से वो क्षेत्र में जीत दर्ज करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं.

देखनेवाली बात होगी कि बीजेपी के टिकट पर भानू प्रताप शाही जीत दर्ज कर पाते हैं या उन्हें भीतरघात का सामना करना पड़ेगा.

लोहरदगाः दो बार लगातार केके भगत ने हराया है सुखदेव भगत को

लोहरदगा में चुनाव दूसरी जगहों से ज्यादा रोचक होनेवाला है. यहां बीजेपी और कांग्रेस की फाइट बाद में होगी. पहले तो बीजेपी को उम्मीदवार उतारने के लिए अपने गठबंधन के दल आदसू से ही दो-दो हाथ करने होंगे.

लोहरदगा आजसू की सीट मानी जाती है. 2009 और 2014 में लगातार दो बार आजसू से चुनाव लड़ते हुए कमल किशोर भगत ने कांग्रेस प्रत्याशी सुखदेव भगत को हराया है.

अगर सीट बीजेपी के खाते में जाती भी है तो आजसू अपनी जमीन इतनी आसानी से जाने नहीं देगा. केके भगत या तो निर्दलीय टक्कर देंगे या फिर कुछ और.

चुनावी आंकड़ों पर गौर फरमाने पर यह फाइट और मजेदार मानी जा रही है. 2009 में आजसू से लड़ते हुए केके भगत ने सुखदेव भगत को सिर्फ 606 वोट से हराया था.

केके भगत को 35,816 आये थे तो सुखदेव भगत को 35210. वहीं 2014 में केके भगत ने सिर्फ 592 वोट की जीत दर्ज की थी.

केके भगत को 56,920 और सुखदेव भगत को 35,210 मिले थे. वहीं केके भगत को सजा होने के बाद सुखदेव भगत ने केके भगत की पत्नी नीरू शांति को 23,288 वोट से हराया था.

नीरू शांति को सिर्फ 7878 वोट मिले थे. लेकिन इस बार केके भगत फिर से सजा काट कर अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं. कहा जा रहा है कि वो अपनी पत्नी नीरू शांति को चुनाव लड़ाना चाहते हैं. और वो अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं करेंगे.

मांडूः पिता की मौत के बाद मिले थे रिकॉर्ड वोट, लेकिन 2014 में जेपी पटेल का जनाधार घटा

बीजेपी में शामिल हुए जेपी पटेल को राजनीति पिता टेकलाल महतो से विरासत में मिली. 2009 के चुनाव में टेकलाल महतो को 37,198 मिले थे.

वहीं कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे कुमार महेश सिंह को 28,636 वोट मिले थे. 2011 में टेकलाल महतो का देहांत हो गया. उपचुनाव हुए.

पिता के बदले जेएमएम  से पहली बार चुनाव लड़ रहे जेपी पटेल को जनता का रिकॉर्ड इमोश्नल वोट मिला. उन्होंने फिर से कांग्रेस से लड़ रहे कुमार महेश सिंह को रिकॉर्ड 23,768 वोटों से हराया.

जेपी पटेल को 52,404 तो महेश सिंह को 28,636 वोट मिले. लेकिन 2014 के चुनाव में जीत का अंतर काफी घट गया.

इस बार बीजेपी से चुनाव लड़ रहे कुमार महेश सिंह को सिर्फ जेपी पटेल सिर्फ 7,012 वोट से ही हरा सके. 2014 में जेएमएम को 78499 वोट मिले तो वहीं बीजेपी को 71,487 वोट मिले थे.

बहरागोड़ाः फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड अब सभी बीजेपी में

बहरागोड़ा  में बीजेपी किसे टिकट देगी. यह अब भी चर्चा का विषय बना हुआ है. क्योंकि 2014 के चुनाव में लगातार फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड आनेवाले तीनों उम्मीदवार अब बीजेपी में हैं.

दिनेशानंद गोस्वामी बीजेपी के पुराने चेहरे हैं, तो कुणाल षाड़ंगी जीते हुए विधायक. वहीं जेवीएम से बीजेपी में शामिल हुए समीर मोहंती भी किसी से कम नहीं हैं.

वो भी इस बार बहरागोड़ा सीट से बीजेपी से लड़ने का मन बना चुके हैं. लेकिन चुनाव कौन लड़ेगा यह अभी तक साफ नहीं है.

2009 और 2014 के चुनावी आंकड़े पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि बीजेपी के तीनों टिकट के दावेदार क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं. लेकिन जीत लगातार दो बार जेएमएम की हुई है.

2009 में विद्युत वरण महतो ने बीजेपी के दिनेशानंद गोस्वामी  को 17,154 वोट से हराया था. जेएमएम को 59,228 और बीजेपी को 42,074 वोट मिले थे.

वहीं 2014 में जेएमएम के कुणाल षाड़ंगी ने जेएमएम से लड़ते हुए बीजेपी को 15,355 वोट से हराया था. जेएमएम को 57,973 बीजेपी को 42618 और जेवीएम के समीर मोहंती को करीब 42000 वोट मिले थे.

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बरहीः उमाशंकर अकेला ने 2009 में तो 2014 में मनोज ने मारी है बाजी

बरही विधानसभा की बात की जाये तो वहां भी चुनावी परीक्षा में फर्स्ट और सेकेंड आनेवाले दोनों उम्मीदवार अब एक ही पार्टी में हैं और कोई किसी से कम नहीं है. बरही से बीजेपी के उम्मीदवार उमाशंकर अकेला ने 2009 में उस वक्त के कांग्रेस के उम्मीदवार मनोज यादव को 8,085 वोट से हराया था.

बीजेपी को 60,044 तो कांग्रेस को 50,733 वोट मिले थे. लेकिन 2014 के चुनावी रण में कांग्रेस के मनोज यादव ने बीजेपी के उमाशंकर अकेला को पटखनी दे दी.

जीत का अंतर 7,085 था. कांग्रेस के मनोज यादव को 57818 तो बीजेपी के उमाशंकर अकेला को 50,733 वोट मिले थे. ऐसे में दोनों चाहेंगे कि बरही हर हाल में उन्हीं के पास रहे.

देखनेवाली बात होगी कि इस बार वहां से जीत कौन दर्ज करता है.

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Mayfair 2-1-2020
SP Jamshedpur 24/01/2020-30/01/2020

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