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 क्या शिक्षकों की सुध लेंगे सीएम ? आंदोलन के बाद से अब तक लगभग 46 पारा शिक्षकों की हो चुकी है  मौत

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Ranchi :  राज्य में पारा शिक्षकों को सरकार ने हाशिये पर रख दिया है.  शिक्षा विभाग से लेकर राज्य सरकार इनके प्रति उदासीन है. पारा शिक्षकों की मौत राज्य में होती जा रही है. लेकिन सरकार के पास इतना समय नहीं है कि पारा शिक्षकों से बात कर उनकी समस्या सुने. एक बेहतर जीवन स्तर की कल्पना भी अब पारा शिक्षक नहीं कर पा रहे,  क्योंकि अपनी स्थिति से वाकिफ हैं  पारा शिक्षक. मूलभूत आवश्यकताओं को छोड़ ये अपनी इच्छाओं पर ध्यान नहीं देते.

आंदोलन के बाद से अब तक लगभग 46 पारा शिक्षकों की मौत हो चुकी है: शनिवार को पाकुड़ के पारा शिक्षक महेंद्र भगत की मौत एक माह बीमार रहने के बाद हुई.  नवंबर 2018 से पारा शिक्षकों ने हड़ताल की शुरुआत की थी. जनवरी 19 को आंदोलन खत्म हुआ. ठंड का समय था. दिन रात टेंट के सहारे बैठे रहते थे पारा शिक्षक. लगभग तीन माह आंदोलन चला. कई पारा शिक्षकों ने तो अपने घरों का धान तक बेच कर आंदोलन के लिए पैसे दियें.

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खैर सरकार ने मानदेय में दो हजार से पचीस सौ तक वृद्धि की. लेकिन इन तीन महीनें में लगभग 26 पारा शिक्षकों की राज्य भर में मौत हुई. प्रशासन से लेकर सरकार तक ने इनकी सुध नहीं ली. मानदेय अक्टूबर से पहले ही बंद था. जनवरी में एक माह का मिला. फिर फरवरी से मानदेय बंद. तीन जून को अप्रैल माह का मिला.  लेकिन अन्य माह का बकाया भुगतान अब भी शेष है. इन पांच महीनों में लगभग 20 पारा शिक्षकों की मौत हो गयी.

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  आत्महत्या करने की कोशिश

पाकुड़ के महेंद्र भगत की मौत हो गयी इलाज के अभाव में. पहले भी कई पारा शिक्षक इलाज के अभाव में गुजर गये. कुछ ने तो आत्महत्या करने की कोशिश तक की. विगत दिनों धनबाद के जिला मुख्यालय के समक्ष एक पारा शिक्षक ने आत्महत्या की कोशिश की. हालांकि पुलिस ने उक्त पारा शिक्षक को रोक लिया. ऐसी घटनाएं राज्य के अलग अलग हिस्सों में और भी हुई है. इससे जानकारी होती है कि  पारा शिक्षक किस हद तक तनाव में जी रहे हैं. आर्थिक तंगी ने इनकी मानसिक क्षमता को प्रभावित किया है.

दुख की बात है कि  राज्य में पारा शिक्षकों की मौत की खबरें रुक नहीं रहीं. इनके आश्रितों पर क्या गुजरती होगी,  इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. लोग पारा शिक्षकों की गुणवत्ता की बात करते हैं,  लेकिन यह नहीं देखते कि किन सुदूर क्षेत्रों में ये पारा शिक्षक स्कूल खोलते है और चाक, डस्टर संभालते है. आज भी राज्य के कई ऐसे सुदूर क्षेत्र हैं जहां स्कूलों में एक भी सरकारी शिक्षक नहीं मिलते. तो ऐसे में इन शिक्षकों के प्रति राज्य सरकार उदासीन क्यों है.

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सरकार जल्द से जल्द बकाया भुगतान करे, नियमित मानदेय दे

पारा शिक्षकों का कहना है कि सरकार पारा शिक्षकों का  जल्द से जल्द बकाया भुगतान करे, नियमित मानदेय दे.  जीवन स्तर में सुधार के लिए केंद्र की ओर से निर्धारित न्यूनतम वेतन 18,000 तय किया जाये.  जरूरत हो तो इन्हें आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाये. पारा शिक्षक स्कूल से संबधित कार्यों के लिए सुदूर गांवों से ब्लाक कार्यालय आते हैं. इनके अपने पैसे आने-जाने में लगते हैं. ऐसे में सरकार इनके मानदेय के साथ ही आवागमन के लिए अतिरिक्त राशि प्रदान करे. मीड डे मील की जानकारी देने के लिए शिक्षकों को मोबाइल फोन रखना है, लेकिन इसका अतिरिक्त खर्च सरकार वहन नहीं करती.  सरकार इस खर्च को वहन करे.

उज्जवला योजना की स्थिति पारा शिक्षकों के घरों में

मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि 30 सितंबर तक 14 लाख महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिलेंगे.  मुख्यमंत्री के अनुसार अब तक 29 लाख महिलाओं को उज्जवला योजना से जोड़ा गया है. कई पारा शिक्षकों के घरों में भी इस योजना के तहत सिलेंडर मिले है. लेकिन वे इस स्थिति में नहीं हैं कि  सिलेंडर भरा सकें. वे अभी भी चूल्हा ही फूंक रहे है. अ

मूमन इन शिक्षकों के घरों में गैस सिलेंडर घर के किसी कोने में मिल जायेंगे. तब भी सरकार अपनी उपलब्धियां ही गिना रही है . पारा शिक्षकों  सुदूर गांवों में पढ़ाते हैं. वहां लकड़ियां मिल जाती हैं. जिसे वे जलाते हैं.  पारा शिक्षकों के अनुसार सरकारी गैस चूल्हे के भरोसे रहेंगे, तो मानदेय वाली हालत हो जायेगी.

राज्य की राजधानी रांची से  देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की शुरुआत पिछले साल 23 सितंबर को प्रधानमंत्री ने की थी. लेकिन यहीं के  शिक्षक, जो समाज के लिए सम्मानजनक हैसियत रखते हैं,  इलाज के अभाव में मर रहे हैं. क्या इनके लिए योजना सार्थक होगी.  न भी हो तो क्या सरकार का दायित्व नहीं कि इनकी स्थिति में सुधार करते हुए सकारात्मक पहल करे.

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