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JPSC मामले पर भावुक हुए स्पीकर, क्या दलबदल के सवाल पर भी भावुक होंगे?

तल्ख टिप्पणी ने सरकार को परेशान तो किया ही राज्य की हकीकत हो भी उजागर कर दिया.

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Faisal Anurag

झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष दिनेश उरांव की विधानसभा में की गयी टिप्पणी ने रघुवर दास सरकार के जन सवालों पर बेरहम होने पर चर्चा को तेज कर दिया है. अध्यक्ष ने जेपीएससी के छात्रों के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि यदि जनहित पर निर्णय नहीं ले सकते तो सदन को बंद कर  दें. इस तल्ख टिप्पणी ने सरकार को परेशान तो किया ही राज्य की हकीकत हो भी उजागर कर दिया. अध्यक्ष ने यह टिप्पणी जेपीएससी की परीक्षा को रद्द करने की मांग पर छात्रों के आंदोलन पर विपक्ष के हंगामे के बीच कही. छात्र परीक्षा को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. छात्रों के कई आरोप हैं, लेकिन सरकार ने परीक्षा का आयोजन किया. माना जा रहा है कि आसन्न लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही सरकार अपने रूख पर अड़ी. विपक्ष ने इस सवाल पर जमकर हंगामा किया. इसी क्रम में दिनेश उरांव ने यह टिप्पणी किया. मंत्री सरयू राय ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया और कहा कि अध्यक्ष की उपेक्षा कर सरकार को चलाना मुश्किल है. अध्यक्ष दिनेश उरांव इस सवाल पर भावुक भी हो गए. साफ लग रहा है कि रघुवर दास की सरकार को लेकर अध्यक्ष और सरयू राय का असंतोष प्रकट होता रहा है. राज्य सरकार के कामकाज को लेकर प्रकट की गयी नाराजगी के अपने मायने हैं और इसमें कई राजनीतिक संदेश भी छुपे हुए हैं. भारतीय जनता पार्टी के लिए अध्यक्ष की यह टिप्पणी परेशान करने वाली है और विपक्ष के लिए यह एक चुनावी हथियार की तरह है. विधानसभा के 28 जनवरी की यह घटना मीडिया में सुर्खियां बनी. अध्यक्ष की भावुकता भी चर्चा में है. विधानसभा में उठने वाले सवालों के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता को विपक्ष लंबे समय से उठाता रहा है. पिछले कई अनेक सत्र जनहित के अनेक सवालों पर सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ता रहा है. अध्यक्ष की टिप्पणी विपक्ष के जनहित की सरकार द्वारा की जा रही उपेक्षा को ही हवा देता है.

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अध्यक्ष दिनेश उरांव जी, क्या दलबदल के आरोप के मामले में भी भावुक होंगे? यह सवाल विपक्ष की ओर से उठ रहे हैं. दिनेश उरांव उन छह विधायकों के मामले की सुनवाई भी कर रहे हैं, जिन विधायकों पर दल बदलने का आरोप है. झारखंड विकास मोर्चा के छह विधायकों ने 2015 में ही झाविमो का साथ छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे. उनमें दो राज्य सरकार में मंत्री भी हैं और कई अन्य पदों पर हैं. इन विधायकों ने 2014 का चुनाव झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर लड़ा और भाजपा में चले गये. विधायकों का पक्ष है कि झाविमो का विलय भाजपा में हो गया है. लेकिन झाविमो का अस्तित्व बना हुआ है और वह भाजपा विरोधी पार्टियों का अहम हिस्सा हैं. मामला अध्यक्ष की अदालत में 2015 से ही चल रहा है. सुनवाई पिछले साल ही पूरी हुई है, लेकिन अध्यक्ष ने अब तक फैसला नहीं सुनाया है. भाजपा ने इन विधायकों को पार्टी में शामिल करा कर सदन में बहुमत हासिल किया. 2014 के चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में ही उभरी थी, जब उसके 37 विधायक जीते थे. आजसू उसका चुनावी पार्टनर है, जिसके विधायकों की मदद से भाजपा ने विधानसभा में मामूली बहुमत हासिल किया था. विधायकों के दल बदल के बाद झाविमो के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप लगाया और कानूनी लड़ाई का रास्ता अपनाया. हाईकोर्ट ने मरांडी से कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के बाद ही वह इस मामले पर अपनी राय देगा.

दलबदल का ऐसा ही मामला 2011 में हरियाणा विधानसभा का है, जब जनहित पार्टी के छह विधायकों को हुड्डा की सरकार ने तोड़कर अपने पक्ष में करा लिया था. जनहित कांग्रेस इस सवाल पर हाईकोर्ट गए. कोर्ट ने उन्हें विधानसभा अध्यक्ष के पास भेज दिया. मामले को लंबा होते देख जनहित कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गयी और कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को जल्द कार्रवाई का आदेश दिया अध्यक्ष ने पार्टी से विधायकों के दलबदल को नकार कर उसे पार्टी विलय बता दिया, तब कोर्ट ने सुनवाई की और सभी दल विधायकों की सदस्यता रद्द कर दिया. यह नजीर झारखंड के इस मामले के लिए कारगर बताया जा रहा था, लेकिन दलबदल का यह मामला विधान सभा के अंतिम वर्ष तक लटका हुआ है.

सवाल है कि क्या इंसाफ में देरी लोकतंत्र में मतदाताओं के मताधिकार के लिए घातक नहीं है. यह एक गंभीर सवाल है. लोकतंत्र में दलबदल के लिए किसी भी घटना को कम कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इससे पारदर्शी लोकतंत्र न केवल प्रभावित होता है बल्कि मतदाताओं के मत-विवेक का अपमान है.

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