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क्या इस्तीफा देकर राजनीतिक नैतिकता सिद्ध करेंगे सरयू राय?

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Faisal Anurag

सरकार में रहने पर शर्मिंदगी संबंधी बयान के बाद यह सवाल राजनैतिक नैतिकता से जुड़ गया है, क्योंकि सरयू राय ने रघुवर दास सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं. और सरकार में रहने पर शर्मिंदगी महसूस करने की बात की है. एक ओर उनका बयान रघुवर दास की सरकार और मुख्यमंत्री के लिए बड़ी परेशानी का सबब है और साथ ही इस्तीफे में हो रही देरी भी सरयू राय को संदेह के दायरे में खड़ा करती है. सरयू राय मंत्री बनने के कुछ समय के बाद से ही राज्य सरकार पर हमला करते रहे हैं. वह इस्तीफा देने में जितना ही विलंब करेंगे, अपनी खुद की निर्मित छवि को प्रभावित करेंगे और साथ ही राजनैतिक नैतिकता के मानदंड पर उनका नकारात्मक मूल्यांकन बढ़ेगा.

सरयू राय ने भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह से मिलने और फिर इस्तीफा देने की बात कही है. वे दिल्ली गए भी हैं. सवाल है कि जिस सरकार को वे शर्मिंदगी का बायस बता रहे हैं, आखिर उसके सदस्य अब तक क्यों बने हुए हैं? सरयू राय ने यह भी कहा है कि 2017 में प्रधानमंत्री से मिल वह कह चुके हैं कि सरकार में बने रहने में उन्हें शर्म आती है. फिर अब तक सरकार में बने रहने का कारण भी उन्हें सपष्ट करना चाहिए. रघुवर दास और उनकी सरकार पर एक मंत्री का यह हमला बेहद संगीन है. लेकिन इस पर भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी रहस्यमयी है. भाजपा के किसी पदाधिकारी ने सरयू राय के बयान पर प्रतिक्रिया नहीं दी है.

आमतौर पर हर सवाल पर बोलने वाले भाजपा के प्रवक्ता भी आखिर किस दबाव में हैं. बेहद गंभीर आरोप पर भाजपा की चुप्पी उसके जीरो टॉलरेंस की कथित नीति को भी उजागर कर देती है. यह पूरा मामला सरयू राय की राजनैतिक नैतिकता से जुड़ा है.

सरकार की प्रतिक्रिया की अपेक्षा तो बेमानी ही है, क्योंकि भाजपा के लिए केवल विपक्ष के नेता और पार्टियां ही भ्रष्टाचार करती हैं. वह दौर भाजपा में खत्म हो चुका है जब हवाला मामले में आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था. वह भी एक आरोप ही था. अब तो भाजपा में देखा जा रहा है कि ना तो आरोप लगाने वाला ही संजीदा है और ना ही पार्टी उसके खिलाफ कार्रवाई कर पा रही है.

मुकुल राय, हेमंत विश्वशर्मा और येदियुरप्पा को पार्टी जिस तरह महत्व देती है, वह भाजपा के भ्रष्टाचार विरोधी रूख को बेपर्द कर दे रही है. इंद्र कुमार गुजराल जब प्रधानमंत्री थे ,तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि भाजपा के राजनैतिक मानदंड अन्य दलों से भिन्न है. आडवाणी और बिहार विधान सभा से इस्तीफा देकर यशवंत सिन्हा ने उदाहरण पेश किया है. वाजपेयी ने तब यह भी कहा था कि उच्च पदों पर बैठे लोगों को आरोपों की रोशनी में अपन को पाकसाफ होने तक पद से स्वतः हट जाना चाहिए.

स्व. वाजपेयी ने जिस राजनैतिक नैतिकता और मानदंड की बात की थी, वह भाजपा के भीतर भी खत्म हो चुकी है. यदि भाजपा सरयू राय के आरापों को गंभीरता से नहीं लेती है तो उनका पद पर बने रहना न केवल अनैतिक है, बल्कि एक दिन की देरी भी सरयू राय पर संदेह बढ़ा देगी. सरयू राय स्वयं इस्तीफा देकर राजनैतिक मानदंड और नैतिकता को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला सकते हैं. यह उनके सामने बड़ा अवसर है.

राजनीति में कदम आगे बढ़ा कर पीछे खींच लेने का हमेशा गलत अर्थ लगाया जाता है. सरयू राय लक्ष्मण रेखा पार कर चुके हैं. या तो रघुवर सरकार में रहने पर जिन कारणों से उन्हें शर्मिंदगी होती है, उसे कानून के दायरे में लाएं या फिर इस्तीफा देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के अगुवा बनें.

सरयू राय जयप्रकाश आंदोलन में रहे हैं और इस आंदोलन से जो लोकतांत्रिक और राजनैतिक नैतिकता उन्होंने सीखी है, उसका तकाजा है वे त्वरित गति से अपना अगला कदम उठाएं. भाजपा की रहस्यमयी चुप्पी और उनके आरोप को नजरअंदाज करने की प्रवृति साफ बताती है कि भाजपा ने उनके आरोप को हाशिए पर धकेलने का ही रूख अपनाया है.

सरयू राय ने भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक लड़ाइयां लड़ी हैं और उनकी लड़ाइयों का नतीजा है कि प्रभावशील राजनीतिक नेताओं को कानूनी सजा मिली है. साथ ही सजा के कारण कई नेता चुनाव लड़ने की अहर्ता खो चुके हैं. उन संघर्षो की तुलना में उनका ताजा हमला अपने ही घर के प्रभावशाली मुख्यमंत्री और सरकार पर है, जो बेदाग होने का दावा करती है. सरयू राय के आरापे उसे दागदार बता रहे हैं. सरयू राय का ताजा बयान पहले के बयानों और पत्रों से इस अर्थ में भिन्न है कि उन्होंने अंतिम हथियार इस्तेमाल कर लिया है.

राजनैतिक तौर पर कहा जा सकता है कि हालात वहां पहुंच चुके हैं कि भाजपा या तो रघुवर दास को मुख्यमंत्री पद से हटाए या फिर सरयू राय को मुख्यमंत्री बर्खास्त करें. ताजा बयान के बाद बीच का कोई भी रास्ता नहीं है.

क्या सरयू राय इस्तीफा देकर झारखंड में राजनैतिक नैतिकता स्थापित करने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तेज करेंगे, जैसा कि जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ किया था. सरयू राय अपने को जयप्रकाश नारायण का शिष्य बताते रहे हैं. या फिर वे मंत्री परिषद में बने रहकर अपने ही राजनीतिक मूल्यों से समझौता करने का संदेश देंगे.

लेखक वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं

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